नेपाल में हिन्दी के अस्तित्व को कोई नकार नहीं सकता : डा.श्वेता दीप्ति

जनकपुर,१२ जून |
जनकपुर में आयोजित पन्द्रहवाँ नेपाल रष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन के अवसर पर त्रि वि वि हिदी विभागाध्यक्ष तथा  हिमालिनी की सम्पादक डा.श्वेता दीप्ति ने कहा कि नेपाल के सन्दर्भ में हिन्दी के अस्तित्व और महत्ता को तो कोई नकार ही नहीं सकता । हाँ नकारेगा वही, जिसे इसका इतिहास पता नहीं है । उन्होंने कहा कि विश्व की दूसरी सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी अपना स्थान कायम कर चुकी है |
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डा.श्वेता दीप्ति ने कहा कि नेपाल में हिन्दी का प्रयोग कोई ६०० वर्ष से भी अधिक समय से होता आया है । प्राचीन शिलालेखों और साहित्य रचना से लेकर संगीत, नाट्यमंच, औषधि विज्ञान, शिक्षा आदि क्षेत्रों में हिन्दी का अनवरत प्रभाव आज तक दीख रहा है । वस्तुतः देखा जाय तो हिन्दी से नेपाल का लगाव बिल्कुल प्राकृतिक और सहज रूप में बना हुआ है । यही कारण है कि नेपाली जनमानस और पवित्र भूमि नेपाल हिन्दी प्रयोग की बहुमुखी धाराओं से सिंचित होती आई है ।
 
उन्होंने आगे कहा किभारत में हिन्दू संस्कृति की संवाहिका के रूप में जब हिन्दी भाषा को व्यापक प्रतिनिधित्व का अधिकार मिला तो स्वाभाविक रूप से समान सांस्कृतिक धारा में बह रहे नेपाल ने तथा वहाँ के जनमानस ने भी हिन्दी को उसी सहजता के साथ अपना लिया ।

नेपाल की राष्ट्रभाषा नेपाली की भी हिन्दी के समान देवनागरी लिपि, समान भाषिक स्वभाव साहित्यिक प्रवृतियों ने भी नेपाल के बीच सहज रूप से हिन्दी के लिए सामाजिक और सांस्कृतिक मनोभूमि तैयार की । नेपाल और भारत के बीच प्राचीन काल से ही व्यापारिक सम्बन्ध रहा है । अविकसित अवस्था से लेकर आज की अल्पविकसित अवस्था तक की दौर में नेपाल भारती पूँजी और व्यापारियों का एक अच्छा बाजार रहा है ।१९६०से ६५ तक भारत और नेपाल के बीच अवाध रूप से व्यापार चलता था । परन्तु अभी सीमा शुल्क लगाए जाने के कारण थोडी शिथिलता आ गई है । नेपाली व्यापारी और आम उपभोक्ताओं का भारत आना जाना रहता है इसलिए भी इनकी भाषा हिन्दी हो गई है ।

डा. दीप्ति गणतंत्रीय नेपाल और हिन्दी विषय पर अपना कार्यपत्र प्रस्तुत कर रहीं थी | कार्यपत्र का सम्पूर्ण विवरण निचे दिया जा रहा है

 

डा,श्वेता दीप्ति, खुशीलाल मंडल, डा.शिवशंकर यादव तथा राजेश्वर नेपाली

डा,श्वेता दीप्ति, खुशीलाल मंडल, डा.शिवशंकर यादव तथा राजेश्वर नेपाली

 

 

 

गणतंत्रीय नेपाल और हिन्दी

डा.श्वेता दीप्ति

तराई की समतल भूमि जनक नन्दिनी सीता की जन्म स्थली जनकपुर धाम, शान्ति के अग्रदूत बुद्ध की जन्मस्थली लुम्बिनी के कपिलस्तु जैसे पावन नगरी का देश है नेपाल । विश्व के सर्वोच्च हिमशिखर ८८४८ मीटर ऊँचे सगरमाथा जैसे अलौकिक सम्पदा से परिपूर्ण विलक्षण सौन्दर्य से भरे देश का नाम है नेपाल । अनगिनत नदियों और पहाड़ों के सौन्दर्य को अपने आप में समेटे, हिमाल से लेकर तराई और मेची से महाकाली तक एक अपूर्व सौन्दर्य का नाम है नेपाल । यहाँ की प्राकृतिक अकूत सम्पदा ही इसका परिचय है । कई भाषाओं और संस्कृतियों की भूमि है नेपाल । इस धरती पर जब भी हिन्दी की बात चलती है तो कहीं विरोध और कहीं समर्थन की आवाज बाहर आती है । जबकि भाषा का सवाल किसी भी पूर्वाग्रह से वंचित होनी चाहिए यहश मेरा मानना है । नेपाल के सन्दर्भ में तो हिन्दी के अस्तित्व और महत्ता को तो कोई नकार ही नहीं सकता । हाँ नकारेगा वही, जिसे इसका इतिहास पता नहीं ।

हिन्दी अपने भौगोलिक विस्तार, ऐतिहासिक प्राचीनता तथा साहित्यिक महत्व इन तीनों गुणों के कारण आज विश्व की एक महत्वपूर्ण भाषा है । विश्व परिदृश्य में हिन्दी के महत्वपूर्ण अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है । विश्व की दूसरी सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी अपना स्थान कायम कर चुकी है । हिन्दी एक सहज सरल और सरस भाषा है यह सर्वविदित है । हिन्दी भाषा साहित्य ऐतिहासिक दृष्टि से संसार की सबसे महत्वपूर्ण भाषा साहित्य, संस्कृत की प्रतिनिधि है । जब संस्कृत सामान्य जन के ल्एि कठिन होती गई तो आर्यावत्र्त में हिन्दी का प्रचार बढ़ता गया । हिन्दी संस्कृत पालि या प्राकृत की तरह केवल ब्राह्मणों, बौद्धों और जैनों के धार्मिक साहित्य का माध्यम नहीं बनी । हिन्दी भाषा के माध्यम एक ऐसी सामाजिक संस्कृति का प्रसार किया गया जिसके निर्माता कबीर, रैदास, सूर और तुलसी जैसे विभिन्न सम्प्रदाय के साहित्यकार थे ।

नेपाल के इतिहास में भी हिन्दी अपनी पूर्ण प्रतिष्ठा के साथ स्थापित थी । नेपाल में शिक्षा के विकास तथा प्रजातान्त्रिक पुनर्जागरण में हिन्दी भाषा साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान है । पुरानी पीढ़ी के नेपाली नेताओं तथा विद्वानों के लिए आधुनिक शिक्षा के प्रमुख श्रोत हिन्दी क्षेत्र में वाराणसी, पटना, लाहौर और कलकत्ता के विश्वविद्यालय रहे हैं । भारत के नेपाल मित्र हिन्दी विद्वान तथा कवियों ने नेपाल में नव जागरण लाने में अद्वितीय योगदान दिया । इनमें महापंडित राहुल सांकृत्यायन तथा फणीश्वरनाथ रेणु का नाम अविस्मरणीय है ।

यों तो हर भाषा की अपनी महत्ता होती है इसलिए किसी भी भाषा के प्रति दुराग्रह की भावना नहीं होनी चाहिए । भाषा वह सरिता है जिसमें व्यक्ति जितनी डुबकी लगाता है उसकी गहराई से उतनी ही मोती खोज निकालता है । नेपाल में हिन्दी के अस्तित्व का अगर सवाल है तो भारत के बाद नेपाल ही विश्व का एक मात्र देश है जहाँ हिन्दी पढ़ने, लिखने एवं बोलने वालों की सर्वाधिक संख्या है । नेपाल में हिन्दी का एक हजार वर्षों से अधिक का इतिहास है और आज भी इसकी महत्ता कायम है । हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा अवश्य है, किन्तु वह नेपाल की प्राचीन भाषा भी है । “सन् ८४० ई. में कपिलवस्तु में जन्में कुक्कुरीपा और साढ़े छः सौ वर्ष पूर्व दांग में हुए राजा रतन, जो पीछे रत्ननाथ के नाम से प्रसिद्ध हुए और साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व जनकपुर धाम जानकी मंदिर के संस्थापक रहे महात्मा सूरकिशोर दास जी से आज तक का क्रमबद्ध इतिहास है । ” ( नेपाल में हिन्दी की अवस्था, राजेश्वर नेपाली )

हिन्दी के लिए गोपाल सिंह नेपाली ने कहा था, “हिन्दी है जन–जन की बोली इसे अपने आप पनपने दो ।” हिन्दी का नेपाल में चाहे जितना भी विरोध होता हो पर यह किसी न किसी रूप में, चाहे वह साहित्यिक हो या टी. वी., सिनेमा अथवा संगीत हो आज भी जन–जन के हृदय में अपना स्थान बनाए हुए है । आधुनिक नेपाल के राष्ट्र निर्माता पृथ्वीनारायण शाह स्वयं हिन्दी भाषा के कवि थे । इतना ही नहीं रणबहादुरशााह, उपेन्द्रविक्रम, सुरमाया, शशिधर, जगतमंगल, दलजीतमंगल, अभयानन्द आदि ने भी हिन्दी भाषा को अपनाया और लिखा । सन् १७६८ में पृथ्वीनारायणशाह के राजवंश स्थापना के पूर्व भक्तपुर के राजा सुमति जयजितमित मल्ल, रामचन्द्र एवं वीरनारायण, योगेन्द्रमल्ल आदि ने अनेक हिन्दी नाटक की रचना की ।

नेपाल को प्रमुख भाषाओं की दृष्टि से अगर क्षेत्रों में बाँटा जाय तो उसके तीन क्षेत्र होते हैं —पहाड़ी क्षेत्र जहाँ नेपाली और उसकी बोलियाँ बोली जाती हैं, काठमान्डू उपत्यका अन्य क्षेत्र जहाँ प्रमुख रूप से नेवारी या उसकी उपबोलियाँ बोली जाती हैं और तराई मधेश तथा भीतरी तराई मधेश क्षेत्र जहाँ प्रमुख रूप से मैथिली, भोजपूरी, अवधी या हिन्दी या बोली जाती हैं ।

नेपाल में हिन्दी का प्रयोग कोई ६०० वर्ष से भी अधिक समय से होता आया है । प्राचीन शिलालेखों और साहित्य रचना से लेकर संगीत, नाट्यमंच, औषधि विज्ञान, शिक्षा आदि क्षेत्रों में हिन्दी का अनवरत प्रभाव आज तक दीख रहा है । वस्तुतः देखा जाय तो हिन्दी से नेपाल का लगाव बिल्कुल प्राकृतिक और सहज रूप में बना हुआ है । यही कारण है कि नेपाली जनमानस और पवित्र भूमि नेपाल हिन्दी प्रयोग की बहुमुखी धाराओं से सिंचित होती आई है ।

सामान्यतया शिलालेख, ताम्रपत्र आदि में संस्कृत भाषा का प्रयोग होता है पर नेपाल में कई ऐसे प्राचीन शिलालेख और ताम्रपत्र मिलते हैं जिन पर हिन्दी भाषा में संदेश अंकित हैं । नेपाल की साहित्य रचनाओं में भी हिन्दी का प्रयोग मिलता है । यह प्रभाव दो तरह से प्राप्त होता है । पहला शुद्ध हिन्दी भाषा का प्रयोग और दूसरा रचनाओं में कहीं कहीं हिन्दी शब्दों का प्रयोग । नेपाल में हिन्दी पत्रिका का प्रकाशन सर्वप्रथम वि. सं. २००८ में हुआ था, जिसका नाम तरंग था । उसके बाद तो कई पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ ।

किसी भी राष्ट्र की उन्नति वहाँ की जनता और शिक्षा पर निर्भर करती है । शैक्षिक विकास के क्रम में नेपाल के इतिहास में हिन्दी भाषा के योगदान को तो चाहकर भी नकारा नहीं जा सकता है । भारत की स्वतन्त्रता के साथ ही उसका प्रभाव नेपाल में भी पड़ा । विक्रम सं. २००७ में विगत १०४ वर्ष से चले आ रहे राणा शासन का अन्त हुआ । इसके बाद ही देश में विकास हेतु कुछ कदम परिचालन हुए, इसी के तहत वि. सं. २००९ में शिक्षा समिति का गठन किया गया । सरदार रुद्रराज की अध्यक्षता में ४६ सदस्यों का एक आयोग गठन किया गया और यह तय हुआ कि पाँच वर्षों के भीतर देश में एक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की जाएगी । राजा त्रिभुवन की यह हार्दिक इच्छा थी कि ऐसा हो पर विभिन्न कारणवश यह परिकल्पना मूत्र्त रूप नहीं ले पाई । उनके इस स्वप्न को साकार करने हेतु बडा महारानी कान्तिराज लक्ष्मी देवी ने वि. सं. २०१२, चैत्र महीने के १८ गते को त्रिभुवन विश्वविद्यालय योजना आयोग की घोषणा की जिसमें ८ सदस्य शामिल थे । इस आयोग ने त्रिभुवन विश्वविद्यालय सम्बन्धी पहले चरण का कार्य राजा त्रिभुवन के १२वें जन्मोत्सव पर शुरु किया । तत्पश्चात् ५३वें जन्मोत्सव पर स्नातकोत्तर की पढ़ाई शुरु हुई । विश्वविद्यालय की स्थापना से पहले एस. एल. सी बोर्ड और स्नातक तह की परीक्षा बिहार के पटना बोर्ड से संचालित होती थी । काठमान्डू स्थित त्रिचन्द कालेज भी पटना विश्वविद्यालय से ही सम्बन्धन प्राप्त था । प्रायः सभी शिक्षक भी भारतीय मूल के ही थे । तराई के सभी विद्यालयों में अध्ययन का माध्यम हिन्दी ही थी । नेपाल में शुरुआत से ही शिक्षा के क्षेत्र में हिन्दी का प्रयोग होता आया है । बाल शिक्षा से लेकर विद्यालय और महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालयों में हिन्दी का अस्तित्व रहा है । शिक्षा के साथ ही संगीत के क्षेत्र में भी हिन्दी का प्रभाव रहा है । भारत के संगीतज्ञों के द्वारा संगीत की शिक्षा की व्यवस्था के कारण हिन्दी का प्रभाव देखने को मिलता है ।

नेपाल और भारत के बीच सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षिक और कदाचित राजनैतिक निकटता के कारण यहाँ हिन्दी का अस्तित्व हमेशा से रहा है । भारत और नेपाल के बीच पाँच सौ मील की खुली सीमा है । नेपाल की तराई को भारत के उत्तर प्रदेश एवं बिहार से केवल कुछ हाथों की चौडाई वाली एक सीमारेखा अलग करती है । जिसे यहाँ दसगजा कहते हैं । यहाँ कई गाँव ऐसे हैं जिनके आधे नागरिक नेपाली हैं और आधे भारतीय इस स्थिति में दोनों देशों का एक दूसरे पर प्रभाव पडना स्वाभाविक ही है ।

भारत में हिन्दू संस्कृति की संवाहिका के रूप में जब हिन्दी भाषा को व्यापक प्रतिनिधित्व का अधिकार मिला तो स्वाभाविक रूप से समान सांस्कृतिक धारा में बह रहे नेपाल ने तथा वहाँ के जनमानस ने भी हिन्दी को उसी सहजता के साथ अपना लिया । इसप्रकार दोनों देशों की सामाजिक संरचना एक सी होने के कारण नेपाल में हिन्दी के प्रति कोई अजनबीपन की भावना नहीं थी । वास्तव में भाषा और संस्कृति का सम्बन्ध ही अनूठा होता है । ग्रीनबर्ग ने संस्कृति के लिए भाषा को आवश्यक शर्त ही नहींवरन भाषा को संस्कृति का आवश्यक अंग माना है । इसलिए नेपाल में हिन्दी को स्थान मिलना कोई आश्चर्य की बात नहीं है ।

नेपाल की राष्ट्रभाषा नेपाली की भी हिन्दी के समान देवनागरी लिपि, समान भाषिक स्वभाव साहित्यिक प्रवृतियों ने भी नेपाल के बीच सहज रूप से हिन्दी के लिए सामाजिक और सांस्कृतिक मनोभूमि तैयार की ।

नेपाल और भारत के बीच प्राचीन काल से ही व्यापारिक सम्बन्ध रहा है । अविकसित अवस्था से लेकर आज की अल्पविकसित अवस्था तक की दौर में नेपाल भारती पूँजी और व्यापारियों का एक अच्छा बाजार रहा है ।

१९६०से ६५ तक भारत और नेपाल के बीच अवाध रूप से व्यापार चलता था । परन्तु अभी सीमा शुल्क लगाए जाने के कारण थोडी शिथिलता आ गई है । नेपाली व्यापारी और आम उपभोक्ताओं का भारत आना जाना रहता है इसलिए भी इनकी भाषा हिन्दी हो गई है ।

नेपालियों का भारतीय सेना में भर्ती होना भी हिन्दी के प्रभाव को दर्शाता है । प्रायः नेपाली सीमा के समीपस्थ भारतीय शहरों कस्बों में यहाँ के राजनीतिज्ञों का आना जाना रहता था इसलिए नेपाल की राजनीति पर भी भारत और हिन्दी का प्रभाव हमेशा से रहा है ।

नेपाल में हिन्दी की फिल्मों और हिन्दी गानों का अच्छा बाजार है । यहाँ की जनता इसे भरपूर प्यार देती है और आजकल तो छोटे पर्दो नें हर घर में अपना स्थान बना लिया है । जिसके कारण हिन्दी बोलना और समझना और भी आसान हो गया है । हिन्दी गीत संगीत और फिल्मों ने इसे और भी महत्वपूर्ण बना दिया है ।

इस सभी तथ्यों के बावजूद विडम्बना है कि आज तक नेपाल में हिन्दी को उचित और सम्मानित स्थान प्राप्त नहीं हो पाया है । हम सब जानते हैं कि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में नेपाली भाषा को मान्यता प्राप्त है किन्तु हम नेपाल के संविधान में ना तो हिन्दी को स्थान दिला पाए और ना ही भारत से आई बेटियों के अधिकार को सुनिश्चित करवा पाए जिसका परिणाम विगत के दिनों में स्पष्ट दिख रहा है कि जिस रोटी और बेटी का नारा देकर दो देशों के सम्बन्धों की मजबूती की बात हम किया करते थे उसमें कमी आ रही है और धीरे धीरे ये सिर्फ एक नारा बन कर रह जाएगा इसके आसार नजर आ रहे हैं । जहाँ मधेशी दूसरे दर्जे के नागरिक हैं वहीं भारत से आई हुई बेटियाँ तो तीसरे दर्जे की कतार में खड़ी हैं । न तो उन्हें सम्मान मिला और न ही उनकी भाषा को । उनकी शिक्षा यहाँ आकर अधूरी रह जाती है । इन सभी वस्तुस्थिति पर ध्यान देना आवश्यक है और हमारी युवा पीढी को आगे आने की आवश्यकता है । यह कभी मत सोचें कि हिन्दी आगे बढती है तो किसी और भाषा को बाधित करेगी । आप माने या ना माने किन्तु हिन्दी ही वो मंच रही जिसने विश्वपटल पर कई भाषाओं को परिचित कराया । अपनी सोच को बृहत करें, एक खुला आकाश दें । संकीर्णता विकास की राह में बाधक बनती है यह हम आप सभी जानते हैं फिर एक सहज और विश्वस्तरीय भाषा से विलगाव क्यों ?

विभागीय प्रमुख

केन्द्रीय हिन्दी विभाग

त्रिभुवन विश्वविद्यालय कीर्तिपुर

काठमान्डौ

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