नेपाल मे हिन्दि
गीता कुमारी

नेपाल और भारत राजनैतिक रूप से दो सम्प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र हैं, लेकिन धर्म, दर्शन, भाषा और संस्कृति के स्तर पर दोनों ही राष्ट्र में समरूपता है। नेपाल और भारत के बीच एक और विशेषता है कि दोनों ही राष्ट्रों की अन्तर्रर्ाा्रीय सीमा खुली हर्ुइ है, जिसके कारण दोनों ओर नागरिकों का अबाध आवागमन होता है। शिक्षा, चिकित्सा, धार्मिक यात्राएँ, व्यापार एवं व्यवसाय, पर्यटन आदि दृष्टियों से दोनों ही राष्ट्र अविछिन्न रूप से एक दूसरे से जुडÞे हैं। इसलिए भाषायी रूप में भी इन दोनों राष्ट्रों में गहरा अन्तरसम्बन्ध है। भारतीय संविधान की अष्टम अनुसूची में नेपाली को सम्मानजनक स्थान प्राप्त है। यह सच है कि हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा और राजभाषा है। इसके बावजूद दूसरा सच यह भी है कि दोनों राष्ट्रों की लम्बी सीमा हिन्दीभाषी क्षेत्र के अर्न्तर्गत आती है। एसलिए नेपाल की तर्राई क्षेत्र को भाषिक भूगोल के आधार पर हिन्दी भाषी क्षेत्र के अर्न्तर्गत माना गया है। यद्यपि इन क्षेत्रों में अनेक स्थानीय भाषाएँ प्रचलित हैं। इसके बावजूद हिन्दी एक ऐसी भाषा के रूप में इस क्षेत्र में प्रचलित है जिसे बिना किसी औपचारिक ज्ञान के समझा और बोला जा सकता है। नेपाल के सर्न्दर्भ में यह हिन्दी की शक्ति, समृद्धि और लोकप्रियता का मानदण्ड है कि हिन्दी बिना किसी सरकारी संरक्षण के पूरब से पश्चिम के विभिन्न भाषा प्रदेशों को जोडÞती है और उत्तर दक्षिण के बीच भी कडÞी का काम करती है।
नेपाल में हिन्दी लेखन की सुदर्ीघ परम्परा है। लगभग एक हजार वर्षपर्ूव सिद्धों और नाथों ने अपभ्रंश में जो रचनाएँ प्रस्तुत कीं वे आज भी काठमाण्डू में ‘चर्या गीत’ के रूप में प्रसिद्ध हैं। दाङ जिले के पाटेश्वरी मन्दिर में ग्यारह सौ वर्षपुराना अभिलेख और रतनपुर के चौघरा स्थित सिद्ध रत्ननाथ मन्दिर में छः सौ वर्षप्राचीन रत्ननाथ की कृति ‘रत्नबोध’ प्राप्त होता है। प्राचीन काल में यहाँ शिक्षा और संस्कृति की भाषा के रूप में संस्कृत स्वीकार्य थी। मध्ययुग में काठमाण्डू में नेवारी के साथ-साथ मैथिली, ब्रजभाषा, हिन्दी आदि का प्रयोग होता था और उपत्यका के बाहर के राजागण भी इन भाषाओं के साथ-साथ भोजपुरी का प्रयोग करते थे। सन् १७६८ में पृथ्वीनारायण शाह द्वारा नेपाल के एकीकरण के बाद प्रशासनिक कार्य हिन्दी में सम्पादित होते थे। शाहवंशी पुराने राजाओं के समय हिन्दी और नेपाली दोनों साथ-साथ प्रचलित थीं। मध्यकाल में काठमाण्डू उपत्यका के साथ-साथ उपत्यका से बाहर भी अनेक लेखक और कवि थे जिन्होंने अपनी लेखनी के द्वारा हिन्दी भाषा के विकास में योगदान दिया। आधुनिक काल में भी अनेक साहित्यकारों, यथा(मोतीराम भट्ट, लेखनाथ पौडेल, लक्ष्मी प्रसाद देवकोटा, वी. पी. कोइराला, भवानी भिक्षु, केदारमान व्यथित, धुस्वाँ सायमी, उत्तम नेपाली जैसे प्रतिभाशाली साहित्यकारों ने हिन्दी भाषा के विकास में अपना योगदान दिया।
यह सच है कि नेपाल में हिन्दी के विकास की उर्वरा भूमि थी और हर युग में लोगों ने इसके विकास में अपना योगदान दिया। नेपाल में संवत २०१८ तक हिन्दी शिशु कक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालय तक शिक्षा का माध्यम थी। लेकिन एक भाषा और एक वेश की नीति को कार्यान्वित करने के क्रम में धीरे -धीरे सब कुछ बन्द कर दिया गया। स्कूलों से हिन्दी हटा दी गई। सिर्फनौवीं और दसवीं कक्षा में वैकल्पिक विषय के रूप में इसे रखा गया और एक तरह से न केवल हिन्दी वरन अन्य स्थानीय भाषाओं की जडÞें काटने की कोशिश की गई। आज शिक्षा का सम्बन्ध सीधा रोजगार से जुडÞा है। हिन्दी में रोजगार के अवसर देश में उपलब्ध नहीं, इसलिए हिन्दी भाषा के प्रति तीव्र आकर्षा भी छात्रों में नहीं। वर्तमान समय में हिन्दी की जडÞें नेपाल में सूखती सी प्रतीत होती है।
अगर ऐतिहासिक सर्न्दर्भ में देखा जाए तो हिन्दी की दृष्टि से राणा शासनकाल तक कोई भाषिक समस्या नहीं थी। हिन्दी शिक्षा का माध्यम थी और प्रशासनिक काम काज की भाषा भी। वि.सं. २००७ के बाद शिक्षा के क्षेत्र में तीव्र प्रगति हर्ुइ। लेकिन प्रजातंत्र के आगमन पर राष्ट्रभाषा-राजभाषा सम्बन्धी विवाद पैदा हुआ। न केवल नेपाली राजनीति बल्कि भाषा और शिक्षा सम्बन्धी नीतियों पर भी पश्चिमी देशों का हस्तक्षेप प्रारम्भ हुआ। उन्होंने यह व्याख्या की कि हिन्दी नेपाल के लिए विदेशी भाषा है और संस्कृत मृतभाषा। इस भाषा विवाद को समाप्त करने के लिए प्रजातांत्रिक नेपाल के प्रथम प्रधानमंत्री मातृका प्रसाद से लेकर पंचायती व्यवस्था के प्रथम प्रधानमंत्री तुलसी गिरि तक ने स्वीकार किया कि हिन्दी नेपाल के लिए विदेशी भाषा नहीं है। लेकिन इस विवाद में अन्ततः पराजय हिन्दी की हर्ुइ। ‘हाम्रो भाषा, हाम्रो भेष’ की परिधि में राष्ट्रीयता की परिभाषा दिये जाने के कारण क्रमशः हिन्दी के प्रति नकारात्मक वातावरण तैयार होने लगा और लोग औपचारिक रूप में हिन्दी बोलने से भी डरने लगे।
नेपाल में हिन्दी विरोधियों के भाषायी मनोविज्ञान को स्पष्ट करते हुए डाँ. र्सर्ूयनाथ गोप ने अपने एक शोध-पत्र में कहा है कि नेपाल में हिन्दी बोलनेवालों की विस्तृत तर्राईभूमि और उसकी विशाल जनसंख्या ही नेपाली र्समर्थकों और प्रशासकों के मन में भय पैदा करती है। नेपाल की भाषिक स्थिति में नेपाली के मार्ग में दो भाषाएँ बडÞी चुनौती उत्पन्न करती रही हंै-एक दक्षिणी प्रदेश यानी तर्राई जैसे व्यापक क्षेत्र की भाषा हिन्दी और पहाडÞी प्रदेश के ठीक मध्य स्थित राजधानी की भाषा(नेवारी। नेपाली भाषा के र्समर्थक प्रशासन और नेपाली को ही एकमात्र राष्ट्रीय मर्यादा का आधार मानने वाले लोग इन दोनों ही भाषाओं से सशंकित रहे हैं। यूँ उनकी शंका अन्य सभी र्समर्थ भाषाओं के प्रति भी व्यक्त होती रही है, जिन्हें वे नेपाली से अधिक विकसित पाते हैं। यहाँ तक कि संस्कृत जो नेपाली धर्म एवं संस्कृति का ही प्रमुख अंग नहीं रही, वरन हिन्दी सहित स्वयं नेपाली भाषा का जन्म जिस संस्कृत से हुआ है, आज के कुछ शर्ीष्ास्थ नेपाली भाषा के विद्वान उसके लिए भी ऐसी बातें बोलने लगे हैं कि नेपाली भाषा संस्कृत से शोषित हो रही है। संस्कृत के अतिरिक्त अंग्रेजी के प्रति यह भय और भी मुखर रहा है , हिन्दी के प्रति तो है ही। वास्तव में अंग्रेजी के प्रति आज की युवा पीढÞी का जो आकर्षा देखा जा रहा है, उसके प्रति भाषायी प्रेम नहीं बल्कि रोजगार का दबाब अधिक है।
न्ोपाल में हिन्दी का विवाद का दूसरा नाम है। हिन्दी भाषा को लेकर हमारे देश में द्वन्द्व की स्थिति है। हिन्दी को विदेशी भाषा के रूप में चिन्हित कर दिया गया है और मातृभाषा के नाम पर पूरा हिन्दीभाषी क्षेत्र विभाजित है। हिन्दी विरोधी प्रशासनतंत्र के लिए यह सहज है कि हिन्दीभाषी क्षेत्र में ही हिन्दी का विरोध हो और इस लक्ष्य को प्राप्त करने में वे आज सफल भी हैं। विडम्बना यह है कि हिन्दी को विदेशी भाषा कहकर उसे मान्यता देने से मुँह मोडÞा जा रहा है जबकि उर्दूर् के प्रति उन्हीं लोगों का सहानुभूतिपर्ूण्ा नजरिया है। सवाल यह है कि अगर उर्दू भारत की भाषा नहीं है तो कहाँ की है – तर्राई क्षेत्र में प्रयोग की जानेवाली मैथिली, भोजपुरी, अवधी क्या नेपाल मात्र की भाषा है – वास्तव में हिन्दी नेपाल में न केवल पूरब-पश्चिम बल्कि उत्तर और दक्षिण को भी जोडÞने वाली भाषा है, इसलिए इसका विरोध प्रायोजित और तर्कहीन माना जा सकता है।
यह सच है कि नेपाल में हिन्दी के विरोध की व्यापक जमीन है। इसके बावजूद यह भी उतना ही सच है कि दिनानुदिन इसके प्रयोगकर्ता बढÞ रहे हैं और यह भी माना जा सकता है कि जब तक भारत और नेपाल की सीमाएँ खुली है, उसका आकाश खुला है, तब तक हिन्दी की बाढÞ को नेपाल में नहीं रोका जा सकता। हिन्दी अघोषित रूप में नेपाल की सर्ंपर्क भाषा बन चुकी है। अगर कोई व्यक्ति हिन्दी के सिवा कोई भाषा नहीं भी जानता हो तो भी वह कुशलतापर्ूवक सारा काम निबटाकर राजधानी से लौट सकता है। इस पृष्ठभूमि में कहा जा सकता है कि नेपाल में हिन्दी का प्रयोग तो हो ही रहा है लेकिन सुन्दर हिन्दी का प्रयोग हो यह भी सम्बद्ध पक्ष द्वारा सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसके लिए हिन्दी के पठन-पाठन की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए। नीति कहती है कि किसी को मान दे देने से अपना मान कम नहीं हो जाता। यह सच है कि नेपाली के विद्वान और साहित्यकार भी हिन्दी के संवेदनशील पाठक और श्रोता हैं लेकिन जब कभी हिन्दी को सम्मान जनक स्थान देने की बात होती है तो वे भी इसके विरोध में मुखर हो जाते हैं। महामहिम उपराष्ट्रपति के हिन्दी में शपथ-ग्रहण के बाद उत्पन्न विवादों को इसी सर्न्दर्भ में देखा और समझा जा सकता है। वस्तुतः यहाँ पर तो किसी ब्यक्ति बिशेष को नीचा दिखाने की कोशिश नहीं की गयी। हिन्दी भाषा का सवाल भी यहाँ गौण है। वास्तव में इसके माध्यम से किसी समाज को नीचा दिखाने का प्रयास किया गया। लेकिन इस सम्पर्ूण्ा प्रकरण में मधेश आधारित राजनैतिक दलों की जो भूमिका देखी गई, उससे स्पष्ट होता है कि भाषा सम्बन्धी इनकी प्रतिबद्धताएँ स्पष्ट नहीं।
नेपाल में हिन्दी की लोकप्रियता इस बात से भी आँकी जा सकती है कि न केवल तर्राई में बल्कि राजधानी में भी हिन्दी अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं के पाठकों की संख्या काफी  है। यह सिद्ध करता है कि नेपाल में हिन्दी संचारतंत्र के विकास की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। जिस किसी शहर में हिन्दी भाषा में अखबार और पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हर्ुइं हैं उसे पाठकों ने गंभीरता से लिया है। लेकिन हिन्दी संचार माध्यमों को दो तरह की समस्याओं का सामना करना पडÞता है( एक तो हिन्दी लेखकों की और दूसरी विज्ञापनदाताओं के सौतेले व्यवहार की। एक बात तो निश्चित हैं कि तर्राई आन्दोलन के बाद देश में दो पृथक जीवनमूल्य, पृथक राजनैतिक चिंतन और प्रतिबद्धताएँ उभर कर सामने आयी हैं। तर्राई मधेश के पक्ष को राष्ट्र के समक्ष रखने के लिए भी यहाँ हिन्दी पत्रकारिता और संचार माध्यम के विकास की पर्याप्त संभावना है।
किसी भी देश में दूसरे देश की भाषा के अध्ययन को इसलिए प्रोत्साहित किया जाता है कि इसके माध्यम से दो देशों के मध्य सांस्कृतिक पहचान बढÞती है और दोनों का अर्न्तर्सम्बन्ध गहरा होता है। नेपाल और भारत के सर्न्दर्भ में अगर देखें तो भाषा के जरिए दोनों देशों के सम्बन्ध गहरे हुए हैं। नेपाल और भारत के बीच संस्कृति, दर्शन, धर्म आदि की गहरी समानता है। नेपाली और हिन्दी दोनों ही भाषाएँ संस्कृत से निःसृत हैं जो एक ही लिपि देवनागरी का प्रयोग करती है। दोनों के शब्द-भंडार में गहरी समानता है। कारण साफ है कि नेपाल और भारत का सांस्कृतिक परिवेश समान है। इसलिए कहा जा सकता है कि दोनों ही भाषाएँ सहचरी बनकर समृद्ध हो सकती है। मगर राजनीति है, पर्ूवाग्रह भरा मन है जो दोनों को सौत बनाने पर तुली है। लेकिन भाषा का काम जोडÞना है, विचारों के आदान-प्रदान से लोगों के करीब लाना है। आशा की जा सकती है कि आज नहीं तो कल धुँध समाप्त होगी और दानों ही भाषाएँ सहचरी बनकर अपने धर्म, दर्शन और संस्कृति का उद्घोष विश्व में करेगी।
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