नेपाल सरकार की साम्प्रदायिक आंसू : मुकेश झा

मुकेश झा, जनकपुर,23 जून ।
नेपाल की राजनीति और सामाजिक अवस्था मानवता के सामान्य स्तर से भी विल्कुल नीचे गिरती जा रही है। इसका गिरावट इतनी तेज है कि अगर समय रहते संभाला न जाए तो देश एक बड़ी अंतर्द्वंद की शिकार हो सकता है और अगर ऐसा हुवा तो इसकी जिम्मेदारी राज्य पक्ष को लेनी होगी।

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बीते हुए कुछ दिनों से हम यह देख रहें हैं कि नेपाल सरकार, सत्ता, मिडिया और उसके सारे संयन्त्र काबुल घटना को बड़ी तदारुक्ता से ले रही है। हम मानते हैं की यह दुःखद घड़ी है और सबको शोक संतप्त होना चाहिए, यही मानवीय लक्षण हैं परंतु अगर यह लक्षण सिर्फ एक समुदाय के प्रति सिमटकर रह जाए तो सरकार के ऊपर सांप्रदायिक होने का दोष लगाना अन्यायोचित नही होगा। हमारा कहना यह नहीं है कि सरकार को काबुल घटना पर कोई कदम नही उठाना चाहिए या मृतकों के लाश को नहीं लाना चाहिए या ऐसा कर नेपाल सरकार ने गलती किया परन्तु हम यह कहना चाहते हैं कि सरकार उस समय क्यों मौन हो जाती है जब कोई घटना अपने ही देश में मधेसिओं के ऊपर घटती है? कुछ उदाहरणे अभी ज्यादा पुराना नही हुवा जिसपर नेपाल सरकार ने मौनता साधी। सप्तरी के अग्निकाण्ड, सिरहा अग्निकाण्ड, मधेस आंदोलन में नेपाल प्रहरी द्वारा की गई नृशंस हत्याएं, जनकपुर में पाए गये दर्जनों लावारिस लाशें आदि घटनाओ पर आज तक न तो नेपाल सरकार को सोचने का फुरसत मिला और न ही किसीको दो शब्द बोलने का।

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मधेस के घटना और सवाल पर मौन रहने वाली सत्ता काबुल म हुए घटना पर इतनी तदारुक्ता के साथ प्रस्तुत होने की एक ही वजह है “सम्प्रदायिकता”। नही तो काबुल घटना में मारे गए नेपाली के लाश को ५५ घण्टे में “एयर लिफ्ट” करके नेपाल लाया जाना और मधेस आंदोलन में हत्या की गई लाश को हप्ते भर तक कोठरी में बन्द कर के रखने की जरूरत क्या? स्पष्ट है जो लोग काबुल में मारे गए उनको नेपाली सत्ता अपना समझते हैं और जो लावारिश लाशें जनकपुर में मिलीं थी उनको बेगाना। अब नेपाल सरकार खुद ही सोचे, उनके बुद्धिजीवी सोचे क्या देश के नागरिकों के साथ ऐसा द्वैध रवैया सही है?

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