नेपाल सरकार मधेशियों को न जीने देगी न मरने, अगर वे खामोश रहे तो …: कैलाश महतो

कैलाश महतो,परासी, ९ जुन |

२०७३–७४ के राष्ट्रिय बजट को जरा गौर से देखें । यह बजेट मधेश को लुटकर नेपाल को पालने का बजट है । विकास के सारी योजनाएँ कास्की, नुवाकोट, इलाम, काठमाण्डौ, गोरखा आदि पहाडी इलाकों के लिए बनाए गए हैं । बजट में मधेशियों को एक चेतावनी जरुर दी गयी है कि उन्हें २५,०००/-रुपयों की जुर्माना भुगतने पडेंगे अगर जमीं की किसी भागको उब्जाया नहीं गया तो ।

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एक तरफ सरकार जमीं को उब्जाहीन नहीं छोडने को चेतावनी दे रक्खी है तो दुसरी तरफ मधेश के कृषि जनशक्ति मधेशी युवाओं को योजनाबद्ध रुप से विदेश भेजने के अपने गन्दे रणनीतियों को दिन व दिन मजबूत करती जा रही है । वह एक तीर से कई शिकार करना चाहती है ।

नेपाल सरकार ने मधेशी किसानों को उनके कृषि उत्पादनों के लिए चाहिए जाने बाले सारे उपायों को लगभग बन्द ही कर डाली है । कृषि के समय किसानों को सरकार पानी, मल खाद, इंधन, बीज, उपकरण, विधी आदियों से कोशों दूर रखती है । किसानों के नाम पर व्यापार कर रहे कृषि विकास बैंकों की काम सिर्फ सडक किनारे के खेतों को ही ऋण उपलब्ध करने कराने की दलिलें है । उस ऋण के लिए भी मधेशी किसानों को महीनों बैंकों मे दौड लगानी पडती है । नेताओं की गुलामी करनी पडती है । नेता और बैंक के अधिकारियों की आन्तरिक तालमेल मिल जाने के बाद किसानों से कमिशन की बात तय होती है और फिर तब जाकर ऋण स्वीकृत होती है । खेती के समय बनावटी रुप से डिजेल की अभाव की जाती है । नेपाल को प्राप्त मल खाद पहाडी इलाकों के किसानों को मात्र उपलब्ध करायी जाती है । मधेशी किसानों को मल की आपूर्ति के लिए भारतीय बाजारों के सहारे छोड दी जाती है और किसी तरह मधेशी किसान भारतीय बाजारों से ले भी आए तो सीमाओं पर तैनात किए गए सशस्त्र गुण्डे जवानों से परेशान करायी जाती है, गालियाँ दिलवाया जाता है, डण्डे चलवाए जाते हैं और अक्सर मल को जब्त कर नेपालियों के अड्डा रहे भंसार कार्यालय मे चलान कर दिया जाता है ।

मधेश के गरीब, असहाय तथा बुढे तथा महिला किसान किसी तरह गिर मरकर खेती कर भी लें तो उनके उत्पादों को कौडी के भावों में खरीदा जाता है । साल बितते बितते वे किसान बेहाल हो जाते हैं । महगाई, आर्थिक तंगी और बैंक तथा साहुओं के कर्ज तथा व्याजों तले ऐसे दब जाते हैं कि अन्त मे वे खेती करना छोड देते हैं । कर्ज, ऋण तथा खेत बारी बेचकर सुन्दर सपनों के साथ पढाये अपने जवान लडकों को फिर वही कर्ज या खेत बारी बेचकर मलेशिया, दुबई, कतार, सउदी, इजरायल आदि देशों मे श्रम करने के लिए भेज देते हैं । वहाँ से हुए कमाई को भी नेपाली शासकों ने लुटने का बहुत सुन्दर रास्ते बनाए हुए हंै ।

नेपाली राज्य यह वखुबी जानती है कि मधेशी युवा अपने उन विदेशी मजदुरियों से घर बनायेंगे, गाडी खरीदेंगे और कुछ पैसे बैकों मे रखेंगे । तो मधेश से ही सटे भारतीय बाजारों में जो सामग्रियाँ १०० रुपये मे मिलते हैं, वही सामग्री नेपाली साम्राज्य मे दोगुनों से ज्यादा महँगे मिलते हैं । जो मोटरसाइकिल भारत मे रु.८०,०००÷–नेपाली मे मिल जाता हैं, वही बाइक नेपाली साम्राज्य मे डेढ लाख से ज्यादा मे बेचा जाता है । बैंकों से उनहें कम व्याज मिलते हैं । इस तरह मधेशियों का विदेशी श्रम से मिले पैसों को भी देखते ही देखते लुट ली जाती है और बेचारे मधेशी को भनक तक नहीं लग पाता है ।

मधेशी युवा अपने पारिवारिक पे्रमाभावों को तिलाञ्जली देकर अपनी सारी जवानी विदेशों के चिलचिलाती घामों मे बिता रहे हैं । बुढापे को लेकर अपने बच्चों के सहारे उनके साथ जी भी नहीं पाने की नौवत आ गयी है । क्यूँकि जीवन गुजारने के लिए फिर से वे अपने बच्चों को उन्हीं विदेशी भूमियों पर श्रम करने को भेज देते हैं । मधेश एक तरफ सिर्फ बुढ्ढों का बास स्थान बनते जा रहा है, वहीं दुसरे तरफ मधेश के बाँकी रहे भूमियों पर नेपालियों का कब्जा बढता जा रहा है ।

मधेश मे मधेश आन्दोलन मे इजाफा होने के साथ ही नये ढंग से मधेश के खेतीयोग्य जमीन समेत को नेपाली और कुछ विदेशी कम्पनियाँ तथा उद्योगकर्मी प्रवेश करने लगे हैं । विदेशी कम्पनियों का उद्देश्य जो भी हो, मगर नेपाली कम्पनी तथा उसके संचालकों का सिर्फ एक ही उद्देश्य है कि उन कम्पनियों के मार्फत मधेश में नेपालियों का प्रवेश और मधेश के भूमियों को कब्जा करना । ज्ञात हो कि नेपाल सरकार से सम्झौता करके मधेश मे आए विदेशी कम्पयिाँ भी नेपाली लोगों को ही नौकरी देना तय है जिसका विरोध मधेशी लोग कर नहीं पायेंगे । क्यूँकि पढेलिखे समझदार औसतन बेराजगार मधेशी युवा अभी विदेश के भूमियों पर है । इसी समय को नेपालियों ने सदुपयोग करना चाहा है ता कि उन फैक्ट्री तथा कम्पनियों मे काम करने बाले नेपाली लोग आते ही मधेश मे बसोबास के लिए जमीन खरीदें, नौकरी करें तथा नौकरी से अवकाशप्राप्त होकर समाज सेवा के नाम पर राजनीति करें, सैकडों संस्थायें खोलें, सरकारी, गैरसरकारी लगायत के सारे जगहों को कब्जा करें, पैसे और पद सब उनके पास रहें और मधेशी उनके गुलामी करें ।

आज जैसे मधेशी कुछ भूमि बेचुवा दलाल जिस तरह अपने व्यतिmगत फायदे के लिए मधेश को सौदाबाजी करने मे लगे हैं, अगर मधेशी युवा, विद्यार्थी, समाजसेवी, बुद्धिजिवी, किसान, मजदुर, व्यापारी, शिक्षक, प्राध्यापक आदि लोग वतm रहते सचेत नहीं हुए तो नेपाल सरकार मधेशियों को न जिने देगी, न मरने । उन्हें गुलामों की आवश्यकता है और रहेगी जिसकी आपूर्ति कल्ह भी वही मधेशी दलाल करने को बाध्य होंगे जो आज उनके जाल में पडकर कुछ फायदे और कमिशन के लोभ मे अपनी धरती माँ को नेपाली दरिन्दों के हाथों बेच और बेचवा रहे हैं ।

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