Wed. Sep 19th, 2018

‘नो वोट’ अधिकार के विरुद्ध प्रमुख राजनीतिक दल

काठमांडू, १७ भाद्र ।
अगर उम्मीदवार अपनी पसन्द का नहीं है तो चुनाव में ‘नो वोट’ का अधिकार होना चाहिए, यह माग और बहस कुछ सालों से चल रहा है । लेकिन इस प्रावधान को समावेश किए बिना ही दो चरण का स्थानीय चुनाव सम्पन्न हो चुका है और तीसरे चरण का चुनाव भी होने जा रहा है । लेकिन इस प्रावधान के पक्ष में रहने वालों ने आशा किया था कि आगामी प्रदेशसभा और प्रतिनिधिसभा निर्वाचन में इस प्रावधान को समेटा जाएगा । लेकिन कानून पारित करने के लिए संसद के प्रमुख राजनीतिक दल ही इसके विरुद्ध में दिखाई पड़े हैं । जिसके चलते इस प्रावधान लागू होगा या नहीं, इस में आशंका होने लगी है ।
संसद की राज्य व्यवस्था समिति के बैठक में प्रमुख राजनीतिक दल के सांसदों ने ‘नो वोट’ प्रावधान के विरुद्ध अपनी मत जाहिर किया है । विरोधियों का कहना है कि वर्तमान सन्दर्भ में ‘नो वोट’ सान्दर्भिक नहीं हो सकता । प्रतिनिधि सभा और केन्द्र सभा निर्वाचन संबंधी विधेयक के ऊपर विचार–विमश करते हुए उन लोगों ने इस प्रवाधान के विरुद्ध अपनी मत जाहिर किया है । बैठक में बोलते हुए माओवादी केन्द्र की सांसद रेखा शर्मा ने कहा है– ‘नो वोट प्रावधान लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए अच्छी प्रावधान है । लेकिन तत्काल के लिए यह सान्दर्भिक नहीं हो सकता । क्योंकि इस प्रावधान के कारण वोट बहिष्कार करनेवालों की संख्या ज्यादा हो जाता है तो हम क्या करेंगे ? इसीलिए इसको तत्काल लागू नहीं करना चाहिए ।’
इसीतरह नेकपा एमाले के सांसद गौरीकुमार ओली का भी कहना है कि ‘नो वोट’ सम्बन्धि प्रावधान में विचार–विमर्श करना भी आवश्यक नहीं है । ओली ने कहा– ‘मुलुक की परिस्थित, जनता की अवस्था और मनस्थिति देख कर इस प्रावधान को लागू करना चाहिए, अभी यह लागू नहीं हो सकता ।’ इसी तरह सांसद मानप्रसाद खत्री का भी कहना है कि इस प्रावधान को खारीज ही करना चाहिए ।
लेकिन कुछ छोटे दलों के नेताओं ने कहा है कि ‘नो वोट’ जनता की अधिकार है, इस को लागू करना चाहिए । राष्ट्रीय जनमोर्चा के सांसद चित्रबहादुर केसी ने कहा है– ‘पञ्चायत काल में हम लोगों ने किसी को वोट नहीं दिया । उस समय में भी मत बहिष्कार करने का अधिकार था, अब तो हम गणतन्त्र की बात कर रहे हैं, इसीलिए नो वाट का अधिकार होना चाहिए, क्यों इससे हम लोग डरते हैं ? नेता केसी का कहना है कि कांग्रेस, एमाले माओवादी के प्रति जनता में वितृष्णा है, इसलिए वे लोग ‘नो वोट’ अधिकार से जनता को वञ्चित करना चाहते हैं । यही धारणा है, नेपाल मजदुर किसान पार्टी के सांसद प्रेम सुवाल का भी ।
स्मरणीय है– वि.सं. २०७० पुस २१ गते सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश कल्याण श्रेष्ठ और प्रकाश वस्ती की संयुक्त इजलास ने मतपत्र में ‘नो वोट’ का प्रावधान रखने के लिए फैसला किया है ।

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

avatar
  Subscribe  
Notify of