न्यायाधीश नियुक्ति में राजनैतिक नौटंकी

राजनीतिक दलों के कोटे से आने वाले न्यायाधीश क्या निष्पक्ष न्याय दे पाएंगे –
लीलानाथ गौतम:
अदालत का कार्यसम्पादन अच्छा नहीं है ।
पीडिÞत व्यक्ति समय में न्याय नहीं पाते हैं ।
जिस के पास सत्ता और शक्ति होती है, अदालत उसी की ओर झुक जाती है ।
नेपाल की अदालत वर्गीय तथा जातीय विभेद के आधार में फैसला करती है ।
सर्वोच्च अदालत तथा उस के अधीन अन्य अदालत के प्रति इस तरह के आरोप बार-बार सुनने में आते हैं । इस आरोप को कोई स्वीकारते हैं तो कोई नकार देते हैं । लेकिन सर्वोच्च अदालत, इस तरह के अनेक विवादों में बहुत बार फँस चुकी है । वि.संं. २०४७ से पहले एकछत्र पञ्चायती शैली में सञ्चालित अदालत, उस के बाद सत्ता में रहने वाले राजनीतिक दलों के इशारे पर चल रही है, ऐसा बहुतों का कहना है ।Choledra Samser Debendra Gopal Shrestha Dipak Raj Joshi
ऐसे अनेक आरोप-प्रत्यारोप के बावजूद सर्वोच्च अदालत कभी-कभार ऐसे फैसले करती है, जो तत्कालीन शासक तथा राजनीतिक दलों के लिए हस्तक्षेपकारी महसूस होता है । उदाहरण के लिए पहले संविधानसभा की समयावधि बढÞाने के विरोध में सर्वोच्च ने जो फैसला किया, वह राजनीतिक दल के ऊपर एक बडÞा हस्तक्षेप था । संविधान में स्पष्ट उल्लेख न होने के बावजूद भी संविधान की भावना, जनचाहना और राष्ट्रहित के लिए सर्वोच्च द्वारा किये गये इस तरह के निर्ण्र्ााें की सूची लम्बी हो सकती है । पिछले उदाहरण के लिए २६ सभासद् मनोनित करते वक्त राजनीतिक बंटवारा नहीं होना चाहिए कहते हुए सर्वोच्च द्वारा किए गए फैसले को भी लिया जा सकता है, जो राजनीतिक दलों के लिए एक बडÞा ही झटका था ।
इस तरह के अदालती निर्ण्र्ााजनपक्षीय होते हुए भी तत्कालीन सत्ता तथा राजनीतिक दलों को लिए अप्रिय हो सकते हैं । इसीलिए जो दल सत्ता और शक्ति में रहता है, वह अदालत को अपनी पकडÞ में रखना चाहता है, जो स्वतन्त्र न्यायपालिका के सिद्धान्त के विल्कुल विपरीत है । कानूनी भाषा में व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और व्यावहारिक भाषा में ‘राजनीतिक हस्तक्षेप’ से न्यायालय को दूर रखना चाहिए, यह विश्वव्यापी मान्यता है । लेकिन राजनीतिक स्वार्थ के कारण ही अदालत विवाद में आती रहती है । इस बार पुनः ऐसा ही हुआ है ।
सत्ता का नेतृत्व कर रहे दल नेपाली कांग्रेस तथा एमाले ने योग्य और सक्षम व्यक्ति के बदले विवादित व्यक्ति को सर्वोच्च का स्थायी न्यायाधीश बनाने के लिए जो अनैतिक प्रयास किया, उसके कारण पिछले एक महीने से न्यायिक जगत सर्ुर्खियो में रहा । सर्वोच्च अदालत में रिक्त १० न्यायाधीश पद के लिए न्याय परिषद् द्वारा ऐसे व्यक्तियों की सिफारिस हर्ुइ, जो सर्वोच्च के द्वारा ही कानूनी कारवाही के लिए आदेशित थे । इसी तरह कार्यसम्पादन में अयोग्य साबित होकर विभागीय कारवाही भुगतने वाले तथा भ्रष्टाचार, बलात्कार आदि मामलांे में विवादित व्यक्ति का नाम भी सिफारिस होने के कारण ऐसी अवस्था आई है । विगत एक महीने में सर्वोच्च अदालत तथा उस में नियुक्त न्यायाधीश के बारे में जैसे-जैसे समाचार र्सार्वजनिक हुए हंै, उससे लगता है कि अब र्सवसाधारण जनता को निष्पक्ष न्याय मिलना मुश्किल है ।
राजनीतिक साया
एमाओवादी पार्टर्ीीी सैद्धान्तिक नीति है- व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका के नियन्त्रण में न्यायपालिका को रहना चाहिए, यह हम सभी जानते हैं । इस अर्थ में एमाओवादी के द्वारा अगर न्यायालय के भीतर राजनीति होती है तो कोई भी आर्श्चर्य की बात नहीं । लेकिन अभी देश में अपने को सच्चा प्रजातन्त्रवादी कहने वाली पार्टर्ीीेपाली कांग्रेस की सरकार है । वही सरकार अगर न्यायाधीश नियुक्ति में राजनीति करती है तो र्सवसाधारण जनता कैसे विश्वास करेगी कि अब न्यायालय स्वतन्त्र है और हम वहाँ से निष्पक्ष न्याय पा सकते हैं – अभी हाल का ज्वलन्त प्रश्न यही है । राजनीतिक वृत्त में खुलेआम चर्चा हो रही है कि सर्वोच्च में नियुक्त आठ न्यायाधीश, अधिकांश कांग्रेस और एमाले कोटे में से हैं । जब ऐसी बात सामने आई तो कांग्रेस-एमाले ने कहा- बाँकी न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए अन्य दलों को अवसर मिलेगा । इस तरह विधि, प्रक्रिया और नैतिकता को तिलाञ्जलि देकर राजनीतिक दलों की कोटे में नियुक्त न्यायाधीश कैसे निष्पक्ष कार्य सम्पादन कर सकते हैं – और स्वतन्त्र न्यायापालिका कह कर वकलात करते आ रहे न्यायिक जगत कैसे अब अपने को स्वतन्त्र कहेंगे – क्योंकि ऐसा कहने के लिए न्यायपालिका के पास कोई नैतिक आधार बचा नहीं है ।
अदालत तथा न्यायिक क्षेत्र में ऐसी अवस्था आना अच्छा संकेत नहीं है । न्याय के लिए आम जनता की आशा का अन्तिम केन्द्रविन्दु न्यायालय में अगर राजनीतिक बंटवारा हो जाता है तो निश्चित ही न्यायिक अंग क्षतविक्षत होता है, इस में दो मत नहीं है । इसके अलावा नियुक्ति पाने वाले न्यायाधिशों की कार्य क्षमता, दक्षता और नैतिकता में भी प्रश्न उठाया जा रहा है । विवादरहित और योग्य व्यक्ति चयन के लिए व्यवस्थापिका संसद द्वारा गठित संसदीय विशेष सुनवाई समिति द्वारा इस तरह के विवादित व्यक्ति को रोकना चाहिए था । लेकिन समिति भी राजनीतिक नेतृत्व के बंटवारे के बमोजिम उसी विवादित व्यक्ति को योग्य ठहराती है तो ‘सुनवाई समिति’ अपने पक्ष के न्यायाधीश का चयन करने वाली ‘छनौट समिति’ में रूपान्तरण हो जाती है ।
बडेÞ राजनीतिक घराने से प्रत्यक्ष पारिवारिक सम्बन्ध रहने वाले और कार्य सम्पादन में विवाद में आए हुए न्यायाधीश नियुक्त कर न्यायालय को स्वतन्त्र और निष्पक्ष रखते हैं, ऐसा कहना गलत है । हम सब जानते हैं कि जो व्यक्ति सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश के लिए नियुक्त हुए हैं, उनमें से अधिकांश ने अपने को न्यायाधीश बना देने के लिए नेताओं के दरवाजे खटखटाये थे । ऐसे व्यक्ति अपने मालिक -राजनीतिक दल तथा उनके नेता) के विरुद्ध में जा कर कैसे निष्पक्ष न्यायसम्पादन कर सकते हैं –
सरकारी और संवैधानिक अंग के पदाधिकारी नियुक्ति में तो राजनीतिकरण बहुत पहले ही हो गया था । लेकिन न्यायिक जगत में इस तरह विवादित व्यक्ति को मतदान द्वारा पहली बार चयन किया गया है । यहाँ सवाल सिर्फसर्वोच्च अदालत का ही नहीं है । कुछ समय पहले पुनरावेदन के न्यायाधीश नियुक्ति के सवाल में भी राजनीतिक विवाद और बंटवारा हुआ था । अदालती क्षेत्र में कार्यरत लोग बताते हैं कि २६ जेठ ०७० में जिला और पुनरावेदन तह में हुए १ सय ६९ न्यायाधीश नियुक्ति में सभी राजनीतिक दल, न्यायपरिषद् अध्यक्ष और सदस्यों के बीच स्पष्ट बंटवारा हुआ था । जो इस तरह न्यायाधीश हुए थे, वह सभी शपथ के बाद पार्टर्ीीुख्यालय और नेताओं के घर आशर्ीवाद लेने के लिए पहुँचे थे । इसीलिए न्यायिक निकाय राजनीतिक दल के भ्रातृसंगठन तथा अखाडÞे में रूपान्तरण होकर जनविश्वास गंवा रहे हैं ।
दूसरी तरफ न्यायिक क्षेत्र में होने वाले भ्रष्टाचार तथा न्याय सम्पादन के क्रम में न्यायाधीश के द्वारा होने वाले गैरकानूनी आर्थिक घोटाला सम्बन्धी मुद्दा भी आज के लिए बहुत गम्भीर बनता जा रहा है । सर्वोच्च अदालत में ही कार्यरत कुछ न्यायाधीश न्याय सम्पादन के क्रम में आर्थिक प्रलोभन में पडÞे हैं, ऐसा समाचार तो बार-बार र्सार्वजनिक हो चुका है । और ऐसे ही आरोपित व्यक्ति को कारवाही के बदले पुरस्कृत किया जाता है । उदाहरण के लिए हाल ही में सिफारिस और संसदीय विशेष समिति द्वारा अनुमोदित न्यायाधिशों को भी लिया जा सकता है ।
कांग्रेस-एमाले की सेटिङ !
सर्वोच्च अदालत में स्थायी न्यायाधीश में नियुक्त व्यक्तियों में से अधिकांश नेपाली कांग्रेस और कुछ नेकपा एमाले निकट हैं, ऐसा बताया जाता है । इसीलिए नेपाली कांग्रेस ने खुल कर ही अपने न्यायाधिशों के पक्ष में बयानबाजी किया । अदालत में हुए इस तरह के राजनीतिक हस्तक्षेप के सम्बन्ध में यहाँ वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमिरे का कथन बहुत ही सान्दर्भिक रहेगा । उन्होंने अपने लेख में लिखा है- ‘न्यायाधीश नियुक्ति अब दलीय स्वार्थ और एजेण्डा बन चुका है ।’ पत्रकार घिमिरे आगे कहते हैं- ‘०६२/०६३ के बाद न्यायक्षेत्र में खुला हस्तक्षेप होने लगा है । राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण न्यायपालिका को सत्तारुढÞ दलों के विस्तारित इकाई के रूप में स्थापित करने का खतरा बढÞ रहा है । न्यायाधीश चयन सम्बन्ध में हुए प्रक्रिया और प्रस्तावित नाम अनुमोदित होने के बाद र्सवाेच्च अदालत में कांगे्रसी नेतृत्व कुछ वर्षके लिए स्थापित होने वाला है, ऐसी आशंका लोग व्यक्त करते हैं ।’
इसीलिए इससे पहले सर्वोच्च में ही अस्थायी रूप में कार्यरत योग्य बहुत न्यायाधिशों को हटा कर विवादित नये न्यायाधीश नियुक्त करना सिर्फसंयोग ही नहीं है । इस में न्यायिक वृत्त में अभी चर्चा में रहे ‘सर्वोच्च में कांग्रेस का दस वषर्ीय सेटिङ’ में सत्यता भी हो सकती है । कानून व्यवसायियों के अनुसार न्यायपरिषद् की पिछली सिफारिस के बमोजिम दामोदरप्रसाद शर्मा के बाद रामकुमारप्रसाद साह, कल्याण श्रेष्ठ और सुशीला कार्की क्रमशः प्रधान न्यायाधीश होने वाले हैं । ०७४ जेठ में कार्की जब अवकाश लेंगे, उसके बाद हाल स्थायी नियुक्ति में सिफारिस प्राप्त गोपाल पराजुली प्रधान न्यायाधीश हो जाएंगे । पराजुली के बाद क्रमशः दीपकराज जोशी २ वर्ष३ महिना और चोलेन्द्रशमशेर राणा ३ वर्ष४ महिना प्रधान न्यायाधीश बन जाएंगे, जो नेपाली कांग्रेस निकट माने जाते हैं । इन तीनों को प्रधान न्यायाधीश बनाने के लिए ही इससे पहले अस्थायी न्यायाधीश के रूप में कार्यरत प्रकाश वस्ती को हटाया गया है, यह बात न्यायिक जगत में चर्चित है । यह सभी काम वर्तमान न्यायपरिषद् के नेतृत्व में हुआ है । इस में कांग्रेस नेता तथा कानून मन्त्री नरहरि आचार्य और वर्तमान प्रधानन्यायाधीश दामोदरप्रसाद शर्मा की भूमिका उल्लेखनीय रही है । ‘कम से कम दस वर्षके लिए योजना बना कर यह सेटिङ किया गया है’ कांग्रेस इतर के कानून व्यावसियों का ऐसा कहना है । लेकिन उल्लेखित सभी व्यक्ति प्रधान न्यायाधीश होंगे, इसकी कोई ग्यारेन्टी नहीं है । क्योंकि राजनीतिक समीकरण बदलने के बाद परिवर्तन होने वाले न्यायपरिषद्, संसदीय सुनवाई विशेष समिति आदि के कारण प्रधान न्यायाधीश कोई दूसरा भी हो सकता है ।
राजनीतिक नौटंकी
सिफारिस किए गए विवादित व्यक्तियों को किसी भी हालत में सर्वोच्च में नियुक्त नहीं करना चाहिए, ऐसा कह कर बहुत नेतागण द्वारा र्सार्वजनिक भाषणबाजी हर्ुइ थी । नेपाली कांग्रेस के अलावा अन्य सभी दलों ने इस सिफारिस का खुल कर विरोध किया था । कांग्रेस के ही कतिपय नेतागण भी सिफारिस में रहे विवादित न्यायाधिशों के विपक्ष में बहस कर रहे थे । र्सार्वजनिक बहस इस तरह आगे बढÞ रही थी कि सिफारिस में रहे न्यायाधिशों के लिए सर्वोच्च में नियुक्त होने का नैतिक आधार ही समाप्त हो रहा था । संसदीय सुनवाई के क्रम में भी राजनीतिक नेतागण द्वारा प्रस्तावित न्यायाधिशों को अपमानित करते हुए प्रश्न पूछा जा रहा था । क्योंकि प्रस्तावित व्यक्तियों के ऊपर जो आरोप लगा था, उसको सभी नेता पहले से ही जानते थे । कुछ आरोपों की तो स्वयं र्सवाेच्च अदालत और संसदीय सुनवाई विशेष समिति द्वारा पुष्टि की गई थी । लेकिन अन्तिम चरण में आकर मतदान प्रक्रिया के द्वारा उन सभी विवादित व्यक्ति को न्यायाधीश के लिए सिफारिस किया गया । इससे ज्यादा राजनीतिक नौटंकी और क्या हो सकती है – प्रस्तावित न्यायाधीश को ही नियुक्त करना था तो इतना लम्बा-चौडÞा नाटक करने की कोई जरूरत नहीं थी । इस प्रक्रिया में न्यायाधिशों का मानमदर्न भी हुआ, जो अवांछित था । इस तरह अपमानित करने के बाद नियुक्त करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता ।
किस पर कैसा आरोप –
न्यायपरिषद् द्वारा र्सवाेच्च अदालत में स्थायी न्यायाधीश के लिए सिफारिस किए आठ न्यायाधिशों में वैद्यनाथ उपाध्याय और ओमप्रकाश मिश्र को छोडÞ कर सभी ६ व्यक्ति के ऊपर गम्भीर आरोप लगे थे । इसीलिए उपाध्याय और मिश्र नियुक्ति के लिए र्सवसम्मति से चयनित हुए हैं । और बाकी ६ चोलेन्द्र शमशेर राणा, देवेन्द्र गोपाल श्रेष्ठ, दीपकराज जोशी, गोपाल पराजुली, जगदीश शर्मा पौडेल, गोविन्दप्रसाद उपाध्याय के लिए सुनवाई समिति में मतदान हुआ था । विवादित ६ न्यायाधिशों के विरुद्ध भ्रष्टाचार, बलात्कार, नैतिक आचारहीन तथा कार्य सम्पादन में असक्षमता सम्बन्धी विषयों के मुद्दे में पक्षपात का आरोप लगा है ।

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