पंचायती राष्ट्रवाद का अवशेष–कलैया घटना

ramesh jha‘हरियो वन नेपालको धन’ जैसी उक्ति को पूर्णत ः निष्फल बनाते हुए मधेसी जनता की उन्नति एवं आर्थिक सम्पन्नता को पूर्णतः विध्वंश करने के उद्येश्य से हुलाकी मार्ग बनाने के बदले राजा महेन्द्र ने पूर्व से पश्चिम के तराई प्रदेश को जोडने वाली पूर्व–पश्चिम महेन्द्र राजमार्ग की परिकल्पना करते हुए मधेशी जनता के साथ सौतेला व्यवहार स्वरूप डिजाइन किया, जिससे नेपाल का वन प्रदेश नष्ट हो जाय । उसी समय से मधेसी जनता और मधेश के साथ सौतेलेपन का व्यवहार राज्य की ओर से किया जा रहा है । इसी धारणा के जनक राजा महेन्द्र और उसकी कुत्सित मनोवृत्ति को ही आज की लोकतान्त्रिक सरकार भी पुष्टि करने में अपनी भूमिका प्रबल रूप में निर्वाह करने में लगी है । मधेशी जनता और मधेस प्रति राजा महेन्द्र का अदूरदर्शी व्यवहार और कलुषित मनोवृत्ति को पुष्ट करने में लोकतान्त्रिक वर्तमान सरकार की भी सुषुप्त मनोवृत्ति विगत कुछ वर्षों से महोत्तरी जिला के सदरमुकाम जलेश्वर स्थित कार्यालयों की शाखाएं बर्दिवास में लाने का निर्णय के विरोध स्वरूप जलेश्वर आन्दोलन की घटना कुछ महीने पहले सिम्रौनगढ में सड़क मरम्मत की माग स्वरूप युवा विद्यार्थी द्वारा चलाए गए आन्दोलन के क्रम में प्रहरी दमन स्वरूप एक प्रदर्शनकारी युवा की मृत्यु की घटना तथा विगत कुछ ही दिन पहले वारा जिला के सदरमुकाम कलैया आन्दोलन की घटनाओं से उजागर होती हुई पहाडी–मधेसी बीच स्थापित अन्तसंघर्ष को हवा देने में पूर्णतः सफल होती दिखाई देती है ।
समय–समय में मधेश में जलेश्वर, सिम्रौनगढ तथा वारा में आम जनता को दमन करके सरकार चलानेवाले नेपाली कांग्रेस एवं नेकपा एमाले के नेतागण यह दिखाने में पूर्ण सफल दिखाई देते हैं कि वर्तमान लोकतान्त्रिक सरकार भी राजा महेन्द्र के कलुषित, अदूरदर्शी कार्यक्रमों को क्रिायान्वित कर प्रतिक्रिया और दमन करने में सबल–सक्षम हैं । वर्तमान सरकार की अविचारित एवं क्रियान्वित कार्यक्रमों के आधार पर कतिपय आलोचक द्वारा आरोप लगाया जा रहा है कि नेपाली कांग्रेस तथा नेकपा एमाले के नेता लोग निरीह और निकम्मे हैं । वर्तमान सरकार के प्रधानमन्त्री से लेकर गृहमन्त्री समेत ने कलैयावासी जनता पर अश्रुगैस तथा गोली द्वारा दमन करके अपने निकम्मेपन को सिद्ध किया है । इतना ही नही बारा जिला में ही कुछ महीने पहले युवा विद्यार्थियों द्वारा ऐतिहासिक बाजार सिम्रौनगढ़ में जीर्ण–शीर्ण रास्ते को बनाने की मांग करते हुए आन्दोलनकारी विद्यार्थी(जनता) की हत्या करके यह सरकार अपनी वीरता पहले भी दिखा चुकी है । पिछले कुछ समय में एक सप्ताह तक बारा के कलैया बाजार को तनाव पूर्ण बनाकर, वहां की जनता को उत्तेजित कर, उनके भीतर सुषुप्त अन्तर्संघषको उजागर कर मधेसी जनता को यह बोध कराने मे यह सरकार सफल रही है कि राज्य शासन गलत नीति लागू करने तथा मधेसी जनता को दमन करने में कभी पीछे नहीं रहेगी ।
बारा के मालपोत और नापी कार्यालय की शाखा विस्तार करने वाली वर्तमान सरकार की नीति निर्णय एवं प्रतिक्रिया को देखकर जो कोई भी टिप्पणी कर सकता है कि कलैया की घटना सरकार की सोची समझी रणनीति के तहत हुई है । सुविचारित और सुनियोजित रूप में घटाई  गई घटना है । स्थानीय जनदबाब के कारण ही सरकार अपनी पुरानी योजना और निर्णय को लागू करने से पीछे हटने को बाध्य हुई है । २०७१ आश्विन ३० गते सरकार ने बारा के सिमरा में मालपोत और नापी कार्यालय स्थापना करने का निर्णय करके बारावासी जनता की नाड़ी के टटोलने का काम किया था । सरकारी निर्णय में षड्यन्त्र की बू आने का अनुभव करने वाली कलैया वासी जनता के हृदय में उत्पन्न क्रोधाग्नि को देखकर सरकार पीछे हटी अर्थात् मधेश में बारा सरकार को आन्दोलन पश्चात् अपने निर्णय से पीछे हटना पड़ रहा है फिर भी सरकार सम्वेदन शून्यता की स्थिति में काम करती जा रही है । जिस से सरकार पर निकम्मेपन और निरीह होने का आरोप स्वाभाविक लगता है ।
पंचायत काल से लेकर आज के गणतान्त्रिक सरकार के समय तक कभी भी मधेश प्रदेश के साथ मानसिक रूप में राज्य शासन कभी अविभाज्य अंग के रूप व्यवहार करता नहीं दिखता है । मधेस समस्या सम्बन्धी लेखक, विचारक फेडरिक एज गेज के विचारानुसार तराई की प्रादेशिकता की समस्या इस प्रदेश की बढ़ती आर्थिक हैसियत और यथास्थितिवादी राजनीतिक हस्तियों के बीच असमान रूप में आगे बढीÞ है । फेडरिक ने अपनी पुस्तक नेपाल में क्षेत्रीयता और राष्ट्रीय एकता में विविध समस्याओं को रेखांकित करते हुआ कहा है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व में पहाडियों को वर्चस्व ६०–७० के दशक में जो था आज की २१ वी शताब्दी में भी कोई खास फर्क नहीं पडा है । यहां की समस्याओं का प्रशासनिक और भौगोलिक तरीके से समाधान करते समय नेपाल करण नाम के पहाडी राष्ट्रवाद मधेश में लादने का काम सर्वोपरि रहा, फलस्वरूप समस्या समाधान करने के बदले विविध प्रकार से व्यवधान मात्र समय–समय में थोपा जाता रहा ।
तराई के सभी जिले में जनघनत्व का भार दक्षिणी भाग में विद्यमान है पर यातायात की सुविधा, विद्युत सुविधा, उत्तर भेग अर्थात पूर्व–पश्चिम राजमार्ग के इर्दगिर्द केन्द्रित रखा गया है । शहरीकरण का विस्तार भी इसी क्षेत्र में किया गया है तो प्रशासनिक केन्द्र के निर्माण को भी इसी क्षेत्र में व्यापकता दी गई है । वर्तमान समय में दक्षिणी सदरमुकाम में स्थित सेवा प्रदायी कार्यालयों को विस्तार करने के बजाय“छाया” सदरमुकाम निर्माण करने की ओर अभिरुचि दिखाई जा रही है जो महती चिन्ता का विषय है । मधेस केन्द्रित जिलों के दक्षिणी या अन्य स्थानों में सेवा केन्द्र विस्तार करने का सरकारी प्रयास नगण्य रूप में हुआ है ऐसी अनुभूति आम मधेसी जनता के साथ–साथ अन्य समीक्षक भी करते आ रहे हैं । ऐतिहासिक स्थल सिम्रौनगढ में यातायात से लेकर सेवा केन्द्र के विस्तार करने में सरकार एवं राज्य प्रशासन की अरुचि के प्रतिक्रियास्वरूप मार्गनिर्माण की मांग के क्रम में संघर्ष हुआ जिस में आश्विन २५ गते जयनारायण पटेल की मृत्यु सशस्त्र प्रहरी की गोली से हुई थी और उन्ही की गोली से घायल एक व्यक्ति शाह मोहम्मद हवारी अभी भी पीड़ा झेल रहा है ।
इस प्रकार मधेशी जनता सरकार नौकरशाही और पहाड़िया राष्ट्रवाद अनुरूप निर्मित नीति का शिकार होते आ रही है । मधेश प्रति विभेदपूर्ण राजनीति जवतक चलती रहेगी तवतक सरकार के प्रति प्रतिरोध पूर्ण कार्यक्रम निरन्तर चलता रहेगा । दुष्परिणामस्वरूप सरकार और मधेशी जनता के बीच उत्पन्न अराजक स्थिति का जिम्मेवार सरकार का दोहरा मापदण्ड है । सरकार और मधेसी जनता के बीच सरकार नौकरशाही द्वारा आरोपित द्वन्द्व कौन सा उग्र रूप लेगा कहा नही जा सकता । इसी घटना के प्रतिक्रियास्वरूप अखवार जलाने का कार्य, सत्तासीन पार्टियों के कार्यालयों में आगजनी जैसी घटना हिंसात्मक होने का संकेत देती है । अतः राज्य प्रशासन की नीति निर्धारक के रूप में लम्बे समय से कायम पंचायती राष्ट्रबाद द्वारा सृजित असन्तुलन मधेसी–पहाडी बीच उत्पन्न अन्तर्संघर्ष, आक्रोश को महेन्द्र राजमार्ग के इर्द–गिर्द छाया सदरमुकाम बनाने की सरकारी योजना मधेसियों को उत्तेजित कर रही है जो राजनीतिक अदूरदर्शिता तथा वैचारिक विभेद का परिचायक है जिसे सहन नहीं किया जा सकता है । समग्र मेंं सरकार नौकरशाहों तथा सत्तासीन पार्टियों को सोचने का समय आ गया है कि किसी खास जाति समूह क्षेत्रगत नीति निर्माण अपनाने पर कलैया में विद्रोह की आग भड़क सकती है । तसर्थ मधेश के दक्षिणी भेग में भन्सार और प्रहरी चौकी मात्र स्थापित कर शासन करने वाले निकायों का विस्तार पर सेवा प्रदान करने वाले निकायों का विस्तार उत्तरी भेग में स्थापित करने की सोच को छोड़ मधेश के बारे में मधेसियों को फैसला लेने का अधिकार देना चाहिये । अन्तर्विरोध करने जैसे काम में सरकार को हाथ नही डालना चाहिए ।

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