पडोसि घूर रहे हैं

अगस्त का महीना। गर्मी अपने शबाब पर है। तमिलनाडू का भेलोर, सिएमसी -क्रिश्चियन मेडिकल काँलेज) में मरीज्ाांे वाली भीडÞ। सब अपनी-अपनी समस्याओं में उलझे हुए। रोगियों का मार्चपास। रोग और रोगी की भेराइटी देखनी हो तो सिएमसी अस्पताल एक आदर्श जगह हो सकती है।
ऐसे माहौल में एक गोरा चिट्टा युवक, जो करिब २३-२४ साल का होगा, स्वयंसेवक की भूमिका बडÞे प्रेम से निर्वाह कर रहा था। उसकी सेवा भावना देख कर मुझे सुखद आर्श्चर्य हुआ। रेगिस्तान मे जैसे फूल खिला हो।
मैंने युवक से पूछा, यार ! तुम कहाँ से आए हो – बडÞी सेवा कर रहो हो, रोगियों की !
युवक चहका- मैं बांग्लादेश से आया हूँ। मैं एक आदर्श स्काउट बनने का प्रयास कर रहा हूँ। मैंने बीबीएस तक पढर्Þाई की है।
मुझे अचरज हुआ, पूछा बैठा- भैया ! यह तो बडÞे अचरज की बात है। आज के युग में आप जैसे समाजसेवी युवक कहाँ मिलते हैं ! हम तो नेपाल से आए हैं।
यह सुनते ही, युवक के चेहेर की चमक और भी बढÞ गई। नेपाल के बारे में वह नवयुवक बहुत कुछ जानना चाहता था। मैने उसकी प्यास कुछ-कुछ बुझाई। नेपाल की रानैतिक अवस्था जानकर युवक ने कहा- नेपाल विश्व का एक मात्र हिन्दू राष्ट्र है। यह जान कर हम हिन्दूओं को बडÞी खुशी होती है। चलो, इतनी बडÞी दुनिया में कोई तो ऐसी एक जगह है, जिसे हम हिन्दू अपनी भूमि मान सकते हैं।
लेकिन मैंने उसे सुधारा- देखिए, अब तो नेपाल भी भारत की तरह धर्म निरपेक्ष हो गया है।
यह सुनकर बेचारे को बडÞी निराशा हर्ुइ। वह बोला- अब जो चुनाव होने जा रहा है, उस में सभी हिन्दू मिलकर देश को फिर से हिन्दू राष्ट्र नहीं बनाया जा सकता – बांग्लादेश में हम हिन्दुओं को बडÞी तकलीफ है। भगवान नेपाल का भला करे। ऐसा कह कर वह युवा किसी रोगी की मदद के लिए लपकने लगा।
जाते-जाते उसने बताया- मेरा नाम दिगन्त नाग है। गाँव सरोताली, वार्ड-८ पोष्ट सरोता कील, पुलिस स्टेशन बोलाखाली, जिला चिटगांव।
बांग्लादेश के ही दूसरे सज्जन मिले। पुरे के पूरे अध्यात्मवादी। मुँह अंधरे उठ कर बांग्ला भाषा में गीता पाठ करने वाले सज्जन। श्रीसाधन कुमार ‘श्याम’, चन्द्रसाथ धाम। मध्य मिदनापुर, सिताकुंड, जिला चिटगांव, बांग्लादेश।
सच कहूँ ये अधेडÞ उमर के सज्जन विचित्र भाषा बोलते थे। जाति से कायस्थ। मैथिल भाषी बांग्लादेशी होने से मैथिली में बांग्ला भाषा मिल गई। फिर भारत में आने पर उन्हों ने उस में हिन्दी का तडÞका लगाया। इस तरह मैथिली±बांग्ला±हिन्दी Öअजीबो गरीब भाषा बन गई। खैर, किसी जमाने में इस नाचीज ने भी भाषाशास्त्र का ‘कखगघ’ पढÞा था। उसी के बलबूते पर थोडÞा बहुत अर्थ उनकी भाषा का मैं निकाल लेता था।
वे कहते, मैं नेपाल तो कभी नहीं जा पाया हूँ। फिर भी मैंने सुना है, नेपाल एक छोटा सा सुन्दर देश है। वहँा की राजनीति के बारे में मैं विशेष कुछ तो नहीं जानता। मगर मेरी कामना है, वहाँ कभी भी अशान्ति न हो। छोटा सा देश तो है, बांग्लादेश की तरह। नेता गण सच्चे हृदय से चाहें तो इसे सुन्दर और समृद्ध बना सकते है। संसार में छोटे-छोटे बहुत सारे देश हैं, जिन्हों ने समृद्धि के नए-नए आयाम प्राप्त किए हैं। भगवान करें, नेपाल भी उन्ही देशों की तरह विश्व में अपना नाम रोशन करे। इतना प्रवचन करने के बाद वे फिर मधुर मुस्कान की छटा बिखेरते हुए बांग्ला लिपि में छपी श्रीमद्भागवत गीता का पाठ करने लगे। अपनी पारिवारिक समस्या के बारे में बताकर वे मुझे बोर करना नहीं चाहते थे। वे खुद का इलाज कराने वहाँ आए थे। खैर !
पश्चिम बंगाल, भारत के एक रोगी जो जिला पर्ूव मेदिनीपुर, गाँव कुडी से अपने उपचार के लिए आए थे, बहुत ही बातूनी और किसी प्रान्तीय पार्टर्ीीे सक्रिय सदस्य थे। लेफ्टपं|mट से सम्बन्धित वे दुवले पतले चिडÞीमार से दिखने वाले सज्जन का रोना था- भेलोर सिएमसी में इलाज कराने में बहुत समय लग जाता है। गरीब मरीज के लिए यह एक बहुत बडÞी समस्या बन जाती है। – ऐसा कह कर वे अपना ही उदाहरण पेश करते थे।
फिर भी इस मरियल सी जानवाले ३८ वषर्ीय गोराचन्द दास में राजनीतिक समझ कूट-कूट कर भरी थी। नेपाल की अवस्था के बारे में वे भलीभांती परिचित थे। वे बोले, नेता लोग भ्रष्ट होने से नेपाल में ऐसी विकट समस्या आन पडÞी है। नेपाल जैसे छोटे देश में दो-तीन पार्टर्ीीाफी हैं। मैने तो सुना है- वहाँ सौ से ज्यादा पार्टियाँ देश को लूट खसोट रही हैं। यह तो बुहत बुरी बात है। एक रूलिङ पार्टर्ीीौर एक अपोजिशन पार्टर्ीीो तो भी काम चल सकता है। नेपाल में संविधानसभा का निर्वाचन तो किसी भी हालत में होना ही चाहिए। संविधान के बिना देश कैसे चलेगा – जो अभी संविधान सभा का विरोध कर रहे हैं, वे सब के सब अराजकतावादी हैं। जनता को चाहिए कि वे वैसे नेताओं का साथ न दें। हो सके तो वैसे छद्म नेताओं को जनता की ओर से अच्छी सबक सिखाई जाए।
इसी क्रम में एक युवा से मुलाकात हर्ुइ। मोटरसाइकल दर्ुघटना में घायल हो कर वे वहाँ पधारे थे। उनका नाम था- जमशेद खान। उन्होंने अपना पता ऐसा बताया- ४०/२ एम-एस पी.सी., फस्ट लाइन। पीक्टर। हावडÞा- ७१११०१, शिक्षा-मार्केटिङ एमबीए। बहर हाल किसी कंपनी मंे प्रबन्धक है।
नेपाल की राजनीति के बारे में बात चली तो वे बोले- किसी भी हालत में संविधान तो बनना ही चाहिए। संविधान न हो तो देश का शासन कैसे चेलेगा। और हाँ, संविधान बनाते वक्त इतना तो खयाल रखना ही होगा कि हर कौम के लोग अपने को महफूज महसूस कर सके।
नेपाल ने शुरु में ही अपने आप को सेक्युलर स्टेट घोषित किया है। यह तो बहुत ही अच्छी बात है। सभी धर्मो के लोग वहाँ मिलजुल कर रहें, यह कितनी अच्छी बात होगी। एक पडÞोसी के नाते हम लोग तो चाहेंगे कि नेपाल फले-फूले, तरक्की करे। तरक्की की बुलंदियों को हासिल करे।
मि. खान से कुछ व्यक्तिगत बातें भी हर्ुइ। बडेÞ दिलचस्प शख्स, कुछ-कुछ जज्बाती भी लगे खान साहब। बातचीत के दौरान उन्होंने फरमाया, आजकल अक्सर बुजर्ुग लोग फरमाते हैं- शादी के बाद बेटा हाथ से निकल जाता है। या तो वह जोरू का गुलाम बन जाता है, नहीं तो ससुराल का चेहेता ! लेकिन मैं इस बात को नहीं मानता। खुदा बुजर्ुग को सौ, दो सौ साल की उमर बख्शंे और वे देखें कि यह जमशेद खान अपने अब्बू और अम्मी से कितनी मुहब्बत करता है, उन्हें कैसे पलकों पर बिठा कर रखता है।
ऐसी बात सुन कर मुझे बडÞी खुशी हर्ुइ। मुझे लगा, रेगिस्तान में भी कभी कभार सुन्दर फूल खिल जाते हैं। आज के उद्दण्ड बेटों के बीच ऐसे मातृ-पितृभक्त बेटे भी मिल जाते हैं। खैर, जमशेद जी से मिल कर बडÞी खुशी हर्ुइ। उनकी एक बात निहायत ही गौरतबल थी। उनका कहना था, संविधान के बगैर किसी देश की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसलिए नेपाल में इस वक्त की सब से बडÞी जरूरत है- संविधान, जिसे देश चलाने का सब से बडÞा कानून माना जाता है।
खान साहब ने नेपाली भाषा का एक छोटा सा वाक्य भी सुनाया। वह वाक्य कुछ ऐसा था- ‘त्रि्रो कस्तो हालचाल छ -‘
यह वाक्य खान साहब ने अपने एक मित्र, जो नेपाली भाषी दार्जिलिङ निवासी थे, उनसे सीखा था।
मैंने उनसे इस वाक्य का अर्थ पूछा। वे नहीं बता सके तो मैंने उन्हें समझाया, उस वाक्य का क्या अर्थ होता है। फिर भी नेपाल और नेपाली भाषा के एक वाक्य के प्रति उनका लगाव देख कर दिल खुश हो गया। मैंने उनका शुक्रिया अदा किया।
लगभग दो हफ्ता हम लोग भेलुर में रहे। एक बडÞे ही सज्जन, भद्र इन्सान से ताल्लुकात हुआ। वे जनाब हैं- एस असफाक अली। हंसमुख और मिलनसार। मैं तीन बार भेलौर हो आया। हर बार इनसे मिलना हुआ और हर बार जनाब ने हमारी मदद की। मैं दिल से इनका शुक्रगÞुजार हूँ। इन का पता है- ३५६/३ए मेन बाजार रोड। सेढापेट, भेलोर।
नेपाल के बारे में इन्हें बहुत कुछ पता है और नेपाल को ये महोदय बेहद प्यार करते हैं। इनका कहना था, नेपाल को तो जन्नत से भी बेहतर और खूबसूरत बनाया जा सकता है। देश छोटा है तो क्या हुआ, खुदा ने नेपाल की झोली में बहुत कुछ डाल दिया है। पहाडÞ, जंगल, नदियाँ, प्राकृतिक सौर्न्दर्य, पानी का अक्षय भण्डार, सब कुछ तो है नेपाल के पास। जनता भी परिश्रमी है। सिर्फनेता लोग तहे दिल से मादरे-वतन की खिदमत में खुद को लगा दें। बस काम हो गया। और सबसे बडÞी बात, वहाँ सभी धर्म के लोग मिल जुल कर रहते हैं।
जनाब आशफाक अली की बात से कौन सहमत नहीं होगा। मगर सब से बडेÞ मुद्दे की बात है- क्या हमारे नेता दिल से देशसेवा करते हैं – यहीं पर आकर गाडÞी रुक जाती है।
एक दूसरे सज्जन एन अप्पा राव अधेडÞ उम्र के हैं, उनसे बातचीत हर्ुइ । दक्षिण भारत में हिन्दी क्या दशा है, यह उनकी बातचीत से पता चला । वे सिर्फस्थानीय भाषा बोलना जानते थे । हिन्दी और अंग्रेजी दोनों वे नहीं समझते थे । मैंने हिन्दी में उन्हें समझाने का प्रयास किया और नेपाल के बारे में कुछ जानकारी ली । उनकी प्रतिक्रिया थी- बहुत अच्छा, बहुत अच्छा । शायद वे हिन्दी में इतना ही बोलना जानते थे । ५८ वषर्ीय यह महोदय विशाखा पत्तनम स्टील प्लान्ट आध्र प्रदेश में ओसीएम के पद पर कार्यरत हैं ।
मुझे भी तसल्ली हर्ुइ। चलो यार, इतनी दूर आकर अपनी ‘हिमालिनी’ की डुगडुगी तो मैंने बजाई और एक तमाशा तो दिखाया ! िि
प्रिस्तुतिः मुकुन्द आचार्य

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