पत्रकारिता या जूताकारिता : बिम्मी शर्मा

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बिम्मी शर्मा, बीरगंज , १२ दिसिम्बर | हमारे देश में जूते खाने और खिलाने का एक नया रिवाज शुरु हो गया है । जब खुद जूता खाते हैं किसी से तो यह बात इस तरह से छुपाते हैं जैसे बिल्ली अपना पैखाना मिट्टी के अंदर छुपाती है । पर दूसरा कोई जूता खाए या कोई मारने की कोशिश करे तो उसको इस तरह से उछालते हैं जैसे कोई एटम बम फट गया हो । देश में इतने जूते और चप्पल की फैक्ट्री है तो कोई जूता चप्पल बनाएगा, कोई मारेगा और कोई खाएगा । इस में ताज्जुब की बात क्या है ? जैसी करनी वैसी भरनी ।

पर ताज्जुब तब होता है जब पत्रकार अपनी पत्रकारिता और इसकी मर्यादा भूल कर जूताकारिता करने लगते हैं । वह सपने में देखे हुए दृश्य को भी सच मान कर समाचार लिख देते हैं । कोई जूता उतारे अपनी मर्जी से पर यह तिल का ताड़ बना कर जूताकारिता करने से बाज नहीं आते । इसे ही कहते हैं जुत्तम पैजार । दूसरे को जूता मारते देख कर खुश होना या ताली बजाना बीमार मानसिकता का घोतक है । उस समय यह भूल जाते हैं कि कोई अदृश्य या सदृश्य जूता कभी उनके अपने सिर में भी पड़ सकता है । तब क्या करेंगे ? अपनी कल्पना शक्ति का गलत प्रयोग करके अपना ही सत्यानाश कर रहे हैं पत्रकारिता से जूताकारिता कर रहे मीडिया के लोग ।

गत बिहीबार को पोखरा में नयां शक्ति पार्टी के संयोजक डा. बाबुराम भट्टराई को किसी ने मंच पर जूता प्रहार किया, इस समाचार से सनसनी मचाई गई । सोशल मीडिया में हड़कंप मच गया । चारों तरफ अफरातफरी मच गई । सोशल मीडिया पर दिवाली या होली के त्यौहार जैसा माहौल था । लोग ऐसे खुश हो रहे थे जैसे उन्हें लाटरी लग गई हो । किसी और पर जूता प्रहार होना शर्मिन्दगी की बात नहीं राष्ट्रिय गौरव की तरह पेश किया जा रहा था सोशल मीडिया में । और अनलाईन मीडिया और पत्रकार ऐसे दनादन डा. भट्टराई को पेल रहे थे जैसे इन लोगों के हाथ में कोई तोप आ गया हो ।

तब पत्रकार माओवादी द्वन्द्ध के समय का बखिया भी उधेड़ने लगे । जैसे १० वर्षीय माओवादी द्वन्द्ध में जो १७ हजार देश के नागरिक मारे गए उन सबका ठिकरा अकेले बाबुराम भट्टराई के मत्थे फोड़ा जाने लगा । भारु राम के नाम से तो वह ट्विटर में ऐसे ही बदनाम है । सोशल मीडिया को एक और शगुफा मिल गया बाबुराम के विरुद्ध जहर उगलने के लिए । पत्रुकार और कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियाें को लगता है कि इस देश का कबाडा करने में सिर्फ डा. भट्टराई का ही हाथ है । पर उस समय राजधानी की चौड़ी सड़क किसके बदौलत चौड़ी हुई यह सब भूल जाते है । उस चौड़ी सड़क पर संकुचित विचार वाले यह तथाकथित बुद्धिजीवी कैसे चल पाते होेंगे ? उन्हें शर्म नहीं आती होगी ?

जिस बाबुराम भट्टराई के अर्थ मंत्री और प्रधान मंत्रित्व काल में सब से ज्यादा राजस्व राजकोश में जमा हुआ यह भी पत्रुकारिता करने वाले भूल गए ? उनके सामने तो सिर्फ जूता ही दिख रहा था । पार्टी और नेता का तलवा चाट्ते और जूता खाते खाते पत्रकार अब जूताकारिता ही करने लग गए हैं । जो जैसा है वह दूसरे को भी उसी नजर से न देखेगा ? पागल को हर ईंसान पागल ही नजर आता है । अब जिसने जिसको जूता प्रहार किया होगा उसके पास देने के लिए और कुछ था ही नहीं तो क्या करता ? उसे किसी को मुस्कुरा कर फूल उपहार देने के लिए न घर से न स्कूल से ही सिखाया गया था । जो जिस संस्कार में पल, बढ़ कर आया है वह वही तो प्रदर्शन करेगा न ? महात्मा बुद्ध ने भी कहा है कि जिसके पास जो होता है वह उसी का प्रदर्शन करता है । फिर चाहे वह धन हो, क्रोध हो या जूता । वह कितना त्यागी ईंसान होगा जिसने ठिठुरते ठंड में भी अपना जूता खोल कर मारा ।

फूल या अन्य उपहार लोग अपने साथ हर जगह ले कर तो नहीं चलते न ? अब बाथरुम, किचन से ले कर आपके साथ हर जगह मौजुद रहने वाली एक ही चीज तो है वह है आपके पैरों की शान जूता या चप्पल । अगर कोई ईसान हंसमुख होता या खुश होता तो जरुर दूसरों के ऊपर मुस्कान बरसाता । पर वह तो खुद दुखी और गुस्से में था तो उसने किसी को जूता मारा या उपहार दिया । जिसकी जैसी मनोवृति होती है, दिमाग और सोच से वह जितना परिपक्व होता है उसी हिसाब से न दूसरे को एटिट्यूड दिखाएगा या व्यवहार करेगा ? नगें नहाने वाले के पास नहाने के बाद निचोड्ने के लिए कुछ नहीं बचता । यही बात यहां की मीडिया और तथाकथित बुद्धिजीवियों पर भी लागू होती है ।

बाबुराम को जुत्ता फेंकना लोगों के उस सोच पर जूता पड़ा है जो हमेशा दूसरों का बुरा ही सोचते हैं । कोई अच्छा करने का प्रयास करे तो भी उसमें मीनमेख निकाल कर टांग अड़ाते हैं या खींचते हैं । क्योंकि वह सिर में तो किसी का धावा बोल नहीं सकते तो उनकी नजर ही किसी के पैर पर रहती है । जब गर्ज पड़ी तो पैर पकड़ कर माईबाप का रोना रोते हुए माफी मांग लिया । और जब अपना काम निकल गया तो उसी आदमी को लताड़ने या पैर से पटकनी दे कर अपनी कमजोरी को तुष्ट करते हैं ।

नेपाली मीडिया को अगर कोई कहे कि कौवा कान छीन कर ले गया तो वह अपना कान नहीं देखेंगे बस कौए के पीछे दौड़ पडेंगे कि उसके पास कान है की नहीं । यही बात डा. बाबुराम भट्टराई के जूता प्रहार वाले समाचार पर भी लागू होता है । खुद डा. भट्टराई के सुरक्षा गार्ड ने यह बात कही है कि उस दिन किसी ने उन पर जूता प्रहार नहीं किया था । वह आदमी पोखरा के पृथ्वी नारायण क्याम्पस पर काला झंडा दिखाते हुए डा. भट्टराई का विरोध कर रहा था । इतने में सुरक्षा कर्मियों ने उसे वहां से हट्ने या जाने के लिए कहा । दोनों के बीच रस्साकसी या भिडंत में उस विरोध करने के लिए आए हुए आदमी का आनन फानन में जूता खुल गया । और वहां पर आग की तरह यह बात फैल गई कि डा. भट्टराई पर जूता प्रहार किया गया । और यह शर्मनाक और झूठी बात पर कसीदे पढ़ने के लिए सोशल मीडिया पर तथाकथित बुद्धिजीवी हाजिर थे । उनके हाथ में खुजली जो नहीं हो रही थी । लिखने और गाली देने के लिए एक नयां टापिक जो मिल गया । तो देखा आपने जूताकारिता का यह नयां कारनामा यह कमाल ? देश जूते के रंग मे रंग गया है । आप भी इसी रंग मे रंग जाइए जनाब । (व्यग्ंय)

 

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