पत्रकारों का नोटतंत्र

पत्रकार बनने के लिए पत्रकारिता की एबीससीडी आनी जरूरी नहीं है बस नेता और दल की चापलुसी करनी जरूर आनी चाहिए ।


महासंघ का भवन बनता है विभिन्न उद्योगी और व्यवसायियों के आर्थिक सहयोग से । पर अन्य पत्रकारों को जताया ऐसे जाता है जैसे कि अध्यक्ष ने अपने घर के पैसों से वह भवन बनाया हो ।money

इस देश में वोट चलता है, या तो नोट चलता और दौडता है । बिना वोट और नोट का लोकतंत्र या गणतंत्र सांस भी नहीं ले पाता है । नोट है इसीलिए तो लूटतंत्र जिंदा है । इसकी ताजी मिसाल है पत्रकार महासंघ पर्सा का चुनाव । जहां नोट को पानी की तरह बहा कर वोट की खरीद फरोख्त की गयी । जब किसी दल विशेष से जुड़े हुए पत्रकारों के संगठन में इतने घपले होते हंै तो स्थानीय निकाय या संसद के निर्वाचन में और कितना घपला होता होगा ? शराब नदी की तरह बहेगी और नोट को मांस की तरह बांटा जाएगा । यह हाल है हमारे लोकतंत्र का सॉरी

पत्रकारिता की हद तो तब हो जाती है जब कोई मांस का व्यापारी भी पत्रकार का परिचय पत्र बना कर चलता है और महासंघ का सदस्य भी बन जाता है और मजे की बात तो यह है कि महासंघ के अधिवेशन और निर्वाचन में झोला, झोला भर कर मांस अपने मीट शप से लेकर आता है और सबको खिलाता है ।
नोटतंत्र का ।
पत्रकार बनने के लिए पत्रकारिता की एबीससीडी आनी जरूरी नहीं है बस नेता और दल की चापलुसी करनी जरूर आनी चाहिए । एक प्याराग्राफ न्यूज या एक पेज का कोई भी लेख शुद्ध ढंग से नहीं लिखने आता पर चले है पत्रकारों का नेता बनने । यदि सच में योग्यता है तो निर्वाचन नहीं सभी के सामने यह तथाकथित पत्रकार किसी विषय पर लंबा लिख कर दिखलाएं । जो शुद्ध तरीके से लिख सकेगा वही नेतृत्व दे सकने में कामयाब होगा । पर नहीं यहां तो किसी दल, नेता या विचार के प्रति झुकाव रखने वाला ही योग्य पत्रकार माना जाता है । उसको समाचार लिखने कि जरूरत क्या है । समाचार जाए भांड में । इस के लिए उसकी वानर सेना है ही । और कॉपी, पेष्ट और चोरी कब काम आएगी ?
पत्रकारिता या संचार क्षेत्र को किसी भी देश का चौथा अंग माना जाता है । पर यह अब चुतिया अंग बन चुका है जिसमें ईमान और नैतिकता रत्तिभर भी नहीं है । जो किसी के अपहरण में सलग्न है, जो नकली नोट के कारोवार में सलंग्न है उसी को श्रेष्ठ पत्रकार मान कर वोट देते हैं निर्वाचन मे जिताते हैं । महासंघ का भवन बनता है विभिन्न उद्योगी और व्यवसायियों के आर्थिक सहयोग से । पर अन्य पत्रकारों को जताया ऐसे जाता है जैसे कि अध्यक्ष ने अपने घर के पैसों से वह भवन बनाया हो । किसी को पुरस्कार मिलता या दिया जाता है उसकी योग्यता और योगदान के कारण । पर पत्रकार महासंघ के अध्यक्ष यह बात ऐसे बताते और जताते हैं कि उसको वह पुरस्कार दे कर कोई एहसान किया गया हो । खुद ही पुरस्कार चयन समीति में बैठ कर खुद को ही पुरस्कार के लायक मानना और लेना पत्रकारिता के दिवालियापन का एक निकृष्ट उदाहरण है ।

जिसकी आंखो में काजल, गालों में लाली और होठों में लिपिस्टिक जितनी गाढी हो उसको वोट भी उतनी ही गाढी मिलने की उम्मीद रहती है । वोट जीतने के लिए बस आखों के हाव भाव और कटाक्ष ही काफी है । लिखना, पढ्ना गया चूल्हे में
पत्रकारिता की हद तो तब हो जाती है जब कोई मांस का व्यापारी भी पत्रकार का परिचय पत्र बना कर चलता है और महासंघ का सदस्य भी बन जाता है और मजे की बात तो यह है कि महासंघ के अधिवेशन और निर्वाचन में झोला, झोला भर कर मांस अपने मीट शप से लेकर आता है और सबको खिलाता है । इतना ही नहीं यह शहर के गणमान्य वरिष्ठ पत्रकारों के घर में मांस उपहार के रूप में दे आता है । तो देखा आपने यहां पत्रकारिता पार्टीकारिता और मांसकारिता में कैसे मजे से बदल जाती है । और यही पत्रकार दुसरों को ईडिंयन एबेंसी का दलाल कह कर गरियाते हंै और समाचार लिखते हैं । उस समय उनका ईमान और जमान कहां चला जाता है । क्यों अपने गिरेबान में झांक कर यह पत्रकार नहीं देखते ? रात के अधेंरो मे यही व्यापारियों के घर में चुपके से जाते है और माल हड़पते हैं ।
जो व्यापारी इन को दान दक्षिणा नहीं देता उसको सरकार को राजस्व कम देने के बारे में समाचार लिखने कि धमकी देते है । बेचारा व्यापारी मरता क्या नहीं करता वाले अंदाज में उस पत्रकार के सामने सिर झुका देता है । कई बार तो बेचारा इतना परेशान हो जाता है कि उस पत्रकार के फोन करके पैसा मागंने पर आफिस में होते हुए भी तवियत खराब होने का बहाना कर के घर में आराम करने की बात बताता है । और इसी टाईप के पत्रकार महासंघ का नेतृत्व करने में सक्षम माना जाता है । वाह रे प्रभुजी की लीला । जो जितना खराब और करप्ट है उसको उतना ही योग्य मान कर मूर्ख पत्रकार वोट देते है और जिताते हैं । आखिर सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे जो हैं ।
जिसकी आंखो में काजल, गालों में लाली और होठों में लिपिस्टिक जितनी गाढी हो उसको वोट भी उतनी ही गाढी मिलने की उम्मीद रहती है । वोट जीतने के लिए बस आखों के हाव भाव और कटाक्ष ही काफी है । लिखना, पढ्ना गया चूल्हे में । बस वरिष्ठ पत्रकारों से नजदीकी बनाए रखना इनकी योग्यता होती है । बांकी काम तो एक मुस्कान कर देती है । दूसरे लट्टू जो है इनकी कातिलाना मुस्कान पर । दूसरे जिले से आ कर कम ही वक्त में इस शहर में हक जमाना, लोकप्रिय होना और निर्वाचन में जीतना कोई छोटी बात तो नही है । यह सबके बस की बात भी नहीं है । इसी लिए सभी चुनाव जीत भी नहीं पाते ।
केन्द्र में इनके बडे नेता हैं । जिला और क्षेत्र में वह इन्ही बड़े नेताओं के चमचे और फोटो कॉपी के रूप में यह पार्टीकारिता करने वाले पत्रकार अपनी सत्ता चलाते हैं । पत्रकारों के चुनाव में इनके बडेÞ नेता या सांसद ऐसे शिरकत करते हैं जैसे यह इन्हीं के बीच में सांसदो का निर्वाचन या भिडंत हो । केन्द्र या सिंह दरवार में ही ओली, प्रचण्ड और देउबा नहीं है । उन्हीं की छवि और कार्य रूप वाले छुटभैये नेता और पत्रकारों की एक बडी फौज हैं जिलो में । जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि की तर्ज पर यह पत्रकार हर गलत जगह पर नजर आ जरूर जाते है पर समाचार लिखने के लिए नहीं उसी समाचार को मोल तोल कर के अपना बटुआ गर्म करने के लिए । पत्रकारिता किस चिडि़या का नाम है इनको पता नहीं पर व्यापारियों के सारे गोरखधंधे और काले कारनामे इन को याद है । पैसा बनाने का टक्सार विभाग यही व्यापारी तो है पत्रकारों के लिए । इन्ही व्यापारियों को धमका कर बटोरा गया पैसा ही तो पत्रकार महासंघ के चुनाव में वोट की खरीद, बिक्री में काम आता है । इन्हीं पैसों के बदौलत ही तो चुनाव में जीतते हैं यह खोटे सिक्के । नहीं तो दिमाग के टक्सार विभाग में पडेÞ–पड़े इनको जंग लग जाता । बेचारों के पास समाचार या लेख लिखने की योग्यता नहीं है । इसी लिए पत्रकारों का नेता बन कर चुनाव जीतने में अपनी पूरी जिंदगी झोंक देते हैं । वह कहते हैं ना जो कमजोर होता है वही गुस्सा करता है और उठापटक मचाता है । बस यह पत्रकार भी वहीं कर रहे हैं शुद्ध और व्यवसायिक पत्रकारिता करने की क्षमता नहीं हैंं इसी लिए तो चुनाव में जीत कर अपनी महत्ता सावित करना चाहते हैं और महत्ता सावित करने के लिए नोट से वोट खरीदना जरूरी है । व्

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