पनामा पेपर्स–लीक्सः जिसने दुनिया को हिला दिया

वीरेन्द्र केएम
पनामा पेपर्स के खुलासे से दुनिया भर में इस समय तहलका मचा हुआ है । मध्य और दक्षिण अमेरिका के बीच बसे देश पनामा की ला ‘फर्म’ मोसाक फा ‘नसेका’ ने एक करोड़ १५ लाख पेज के दस्तावेज जारी किया, जिसमें २,१४,१५३ कंपनियों तथा १४,१५३ व्यक्तियों के नाम सामने आए, जो अपना काला धन इस देश में ले गए थे । मकसद धन छिपाना या उसे सफेद बनाना (मनी लान्ड्रिंग) था । पनामा पेपर्स में ५० से ज्यादा देशों के १४० राजनेताओं के भी नाम शामिल हैं । इनमें ७३ वर्तमान सहित पूर्व राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख भी हैं ।
लेकिन सबसे ज्यादा यह ‘पनामा पेपर्स लिक्स’ मामले मे नेपालियोंं का शामिल होना भी एक आश्र्चयजनक बात साबित हुई है । क्योंकि इस खुलासे ने नेपाली भी इस मामले मे एक्सपर्ट हैं यह सावित कर दिखाया । नेपाल को एक गरीब देश के रूप में जाना जाता है लेकिन इस लिस्ट मे नेपालियों का नाम आना अपने आप मे आश्चर्यजनक है । हालांकी इधर इस लिस्ट मे शामिल लोगाें के बारे मे अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग ने भी अपनी छानबीन शुरु कर दी है और यह करना जरुरी भी है । अख्तियार ने पिछले हपm्ते ही नेपाल की सरकारी अधिकारियों से राय–मश्विरा शुरु कर दिया है ।
आयुक्त नवीनकुमार घिमिरे सहित आयोग के कुछ सहसचिवों की टीम ने सरोकार वाले सरकारी निकाय के अधिकारियों के साथ बातचीत किया । विचार विमर्श में राजस्व सचिव राजन खनाल, सम्पत्ति शुद्धिकरण विभाग के महानिर्देशक दामोदर रेग्मी, आन्तरिक राजस्व विभाग के महानिर्देशक चूडामणि शर्मा, राजस्व अनुसन्धान विभाग के महानिर्देशक निर्मलहरि अधिकारी, उद्योग विभाग के महानिर्देशक महेश्वर न्यौपाने, राष्ट्र बैंक के डेपुटी गभर्नर शिवराज श्रेष्ठ, नेपाल पुलिस के केन्द्रीय अनुसन्धान ब्युरो की प्रमुख एवं डीआईजी नवराज सिलवाल की टीम ने इस मामले में तफसीस करना शुरु कर दिया है । नेपाली अधिकारियों ने ‘पनामा पेपर्स लिक्स की सुचि मे शामिल लोग तथा कम्पनीयों के विषय में ट्रयाकिङ कर उचित छानबिन के लिए आपसी सहमति बनायी है । विचार विमर्श मे शामिल एक अधिकारी के मुताविक ‘सरकारी सभी छानबीन निकाय के अधिकारियो ने एक आपस में सूचना आदानप्रदान कर पहले अध्ययन और उसके बाद कार्यवाही प्रकिया को तूल दी जाएगी ।’
लिस्ट मे रहे लोगों ने मोसाक फानसेका के जरिए फर्जी कंपनियां बनवाईं, उनके नाम पर अपना धन जमा किया और फिर उन कंपनियों से अपने कारोबार के लिए कर्ज लिए अथवा अपने उपभोग का खर्च उनके नाम पर दिखाया । मोसाक फानसेका के कागजात किसी अज्ञात स्रोत के जरिए जर्मन अखबार सुदेउट्श जीटुंग ने हासिल किए । उसने वाशिंगटन स्थित इंटरनेशनल कंसोर्टियम आफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (आईसीआईजे) के साथ उन्हें साझा किया । खोजी पत्रकारों की इस संस्था ने दस्तावेज के विश्लेषण में ७८ देशों के १०७ मीडिया घरानों को शामिल किया । महीनों की मेहनत के बाद एक साथ इन समाचार माध्यमों ने इसकी खबर दी, जिसे अब काले धन के बारे में इतिहास का सबसे बड़ा खुलासा कहा जा रहा है । इससे जो नाम घिरे हैं, उनमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, अर्जेंटीना के राष्ट्रपति मारिसियो मास्री, सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल–असद, आईसलैंड के प्रधानमंत्री सिगमुंदुर डेविड गनलान्गसन तथा दुनिया के अन्य बहुत सारे धनी–मानी और चर्चित नाम शामिल हैं ।
हालांकि इस मामले ने दुनिया भर को हिला दिया तो वही हमारे खास सम्बन्ध वाले पड़ोसी मुल्क भारत के भी कई तरह के चर्चित चेहरे शक के दायरे में आए हैं । इससे भारत मे भी हड़कम्प मची हुई है । उनमें अभिनेता अमिताभ बच्चन, अभिनेत्री ऐश्वर्या राय, रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ के मालिक केपी सिंह, उद्योगपति विनोद अडानी, अपोलो टायर्स एवं इंडिया बुल्स कंपनियों के मालिक और अंडरवर्ल्ड डान इकबाल मिर्ची के भी नाम शामिल हैं । भारत की लगभग ५०० कंपनियों, प्रतिष्ठान एवं ट्रस्ट तथा २३४ व्यक्तियों ने मोसाक फानसेका की मदद ली । जारी दस्तावेज १९७७ से लेकर चार महीने पहले तक के हैं । इनमें जिन भारतीयों के नाम हैं, पिछले साल उनके पास अपने अवैध धन को वैध बनाने का मौका था । बीते ३० सितंबर तक ये लोग अपने धन की जानकारी भारत सरकार को देकर और उस पर कर अदा कर अपने अपराध से मुक्त हो सकते थे । किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया । तो अब वे कानूनन जुर्माना और जेल के हकदार हैं ।
भारत की हाल एनडीए सरकार काले धन का दुश्चक्र खत्म करने का वादा करते हुए सत्ता में आई थी । अपने पहले फैसले के रूप में उसने अवकाश–प्राप्त जज न्यायमूर्ति एमबी शाह की अध्यक्षता में विशेष जांच दल (एसआईटी) भी बनाया । अब सरकार के पास अपना वादा निभाने का एक और बेहतरीन मौका है । पनामा पेपर्स में दर्ज सूचनाओं को उसे एसआईटी को सौंप देना चाहिए । अपनी एजेंसियों को मामले की तह तक पहुंचने में लगाना चाहिए । यह सख्त पैगाम देने की जरूरत है कि चाहे कितना बड़ा नाम हो, उसके काले कारोबार को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा । तबही भारतीय प्रधानमन्त्री मोदी जी का वह रुतवा कायम रह पाएगा । इस प्रकार की डकुमेन्ट चुहावट के बाद आइसल्यान्ड सहित के देश के प्रधानमन्त्रियों तक को हैरान में डाल दिया ।
सन् १९९७ मे अमेरिकी पत्रकार चुक लेविस ने यह आइसीआइजे नामक मुनाफा रहित अन्तर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्था की स्थापना की थी । इस संस्था के अभी तक निजी दान और सहयोग से संचालित है । यह संस्था अभी तक कई मामले का पर्दाफास कर चुकी है । यह अफगानिस्तान से हो रही बहुराष्ट्रिय कम्पनी की तस्करी, संगठित अपराध की सिन्डिकेट, निजी सेना की उत्पादन, पर्यावरण की लबी सहित के मामले का पर्दाफास कर चुकी है । व्व्व्

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