पप्पु कन्ट्रक्सन और मेरे ऊपर नियोजित आक्रमण हो रहा है : सांसद रौनियार

राजनीतिक वृत्त में आर्थिक समृद्धि संबंधी मुद्दा को लेकर विगत कुछ सालों से जो गरमा–गरम बहस हो रहा है, वह आज भी जारी है । सरकार में शामील राजनीतिक पार्टी के नेता हो या मन्त्री हर भाषण में आर्थिक समृद्धि संबंधी मुद्दा को नहीं छुटाते हैं । एक बात स्मरणीय है कि आर्थिक समृद्धि का मतलव देश में पूर्वाधार निर्माण करना भी है । पूर्वाधार निर्माण में निर्माण व्यावसायियों की योगदान महत्वपूर्ण रहता है । लेकिन गृहमन्त्री रामबहादुर थापा ‘बादल’ के कुछ अभिव्यक्ति और एक्सन के कारण निर्माण व्यावसायी आतंकित हुए हैं । गृह मन्त्रालय कहता है कि निर्धारित समय में काम सम्पन्न नकरने में असफल निर्माण व्यावसायियों के ऊपर कारवाही किया जाएगा । ऐसी ही पृष्ठभूमि में हिमालिनी के लिए लिलानाथ गौतम ने पर्सा निर्वाचन क्षेत्र नं. ३ से निर्वाचित सांसद हरिनारायण रौनियार से बातचीत किया है, जो पूर्व निर्माण व्यावसायी भी हैं । और उनके द्वारा स्थापित पप्पू कन्ट्रक्सन आज सबसे अधिक चर्चा में भी है । प्रस्तुत है, बातचीत का सम्पादित अंश–

० आप का इतिहास निर्माण व्यावसाय से जुड़ा है, इससे पहले आप को एक निर्माण व्यावसायी के रुप में ही लोग जानते थे । सरकार को मानना है कि निर्माण व्यावसायी समय में काम नहीं करते हैं । आपके द्वारा स्थापित पम्पू कन्ट्रक्सन भी अभी विवाद में है । क्या कहते हैं ?

– हां मैंने ३५ साल निर्माण व्यावसायी के रुप में बिताया हूं । मेरे द्वारा स्थापित पप्पु कन्ट्रक्सन के माध्यम से ही मैं निर्माण कार्य में शामील रहा । ३५ साल में मैंने जो भी काम किया, वह सफल रहा । दर्जनों पुल निर्माण किया, कई नहर और सिचाईं बनाया, कई बिल्डिङ निर्माण किया । जो भी किया, वह सब सफल रहा । अर्थात् उसके बारे में अभी तक कोई भी कम्प्लेन नहीं है । यहां तक कि कुछ समय पहले तक कई लोगों को पता भी नहीं था कि पप्पु कन्ट्रक्सन क्या है और इसने क्या किया है ! लेकिन आज आकर कुछ अखबार और ऑनलाइन मीडिया लिख रहे हैं कि पप्पु कन्ट्रक्सन द्वारा निर्मित पूल टूट रहा है । मैं एक प्रश्न करना चाहता हूं– आज पप्पु कन्ट्रक्सन के बारे लिखनेवाले मीडिया ३५ साल तक कहा थे, जो आज आकर पप्पु कन्ट्रक्सन की गलतियां दिख रहे है ? ३५ साल तक सब–कुछ ठीक–ठाक, आज आकर बदमासी ? यह तो हो ही नहीं सकता ! पप्पु कन्ट्रक्सन के साथ मुझे जोड़कर बदनाम करने की यह एक साजीश है, जो नियोजित भी है ।
दूसरी बात मैं अभी पप्पू कन्ट्रक्सन में नहीं हूं । राजनीति में आने के बाद मैंने उक्त कम्पनी से रिजाइन किया है । कम्पनी किसी दूसरे व्यक्ति को ही हस्तान्तरण की गई है । मैं यह बात बारबार बोल रहा हूं, लेकिन अभी भी पप्पु कन्ट्रक्सन के साथ मुझे जोड़कर प्रचार किया जाता है । मेरे विरुद्ध में लिखनेवाले पत्रकारों से मैं कुछ प्रश्न करना चाहता हूं– क्या पप्पु कन्ट्रक्सन ने आज आकर काम करना शुरु किया है ? जो पूल बना है और टूटा है, क्या वह मैं माननीय बनने के बाद टूटा है ? क्या ३५ साल से कोई भी पूल नहीं टूटता था ? उस वक्त आपने उसके बारे में क्यों नहीं लिखें ? और क्या मेरे सांसद बनने के बाद ही नेपाल में मीडिया पैदा हुआ है ? मुझे लगता है– यह तो नहीं है । जब मैं राजनीति में आया हूं, तब से पप्पु कन्ट्रक्सन के बारे में लिखना शुरु हुआ है । इससे स्पष्ट होता है कि यह नियोजित है । अगर कोई मधेशी समाज से ऊपर आना चाहता हैं तो उसके विरुद्ध षड्यन्त्र किया जाता है, यह वही षड्यन्त्र है । मैं दावे के साथ कहता हूं, मेरे साथ जोड़ कर पप्पू कन्ट्रक्सन के बारे में जितने भी समाचार आ रही है, उसमें से ८०–९० प्रतिशत झूट है ।

० प्रमाण स्वरुप टूटा हुआ पुल के साथ पप्पु कन्ट्रक्सन का नाम आ रहा है, क्या यह भी झूट है ?

– हमारे कारण कहीं भी पुल नहीं टूटा है, यह सब झूट है । आप का संकेत बबई पुल की ओर हो सकता है । हां, उक्त पुल पप्पु कन्ट्रक्सन ने बनाया है, लेकिन उसका डिजाइन पप्पु कन्ट्रक्सन ने नहीं बनाया है । हम लोगों ने उसी वक्त कहा था कि उक्त डिजाइन गलत है, कुछ भी हो सकता है । लेकिन सम्बन्धित निकाय हमारी बात सुनने के लिए तैयार ही नहीं था, डिजाइन गलत होने के कारण ही वह पूल टूटा है । भीडियो में राजविराज, सिरहा तथा सुर्खेत रोड़ का पुल दिखाया जाता है, बोर्डर का पुल दिखाया जाता है और कहा जाता है कि पप्पु कन्ट्रक्सन बदमासी कर रहा है । यह तो सरासर झूट है । राष्ट्र का चौथा अंग होकर इस तरह किसी को बदनाम करने की उद्देश्य से प्रेरित होना ठीक नहीं है ।
जहां तक बबई पुल का सवाल है, उक्त पुल निर्माण के लिए वि.सं. २०६८ साल में सम्झौता की गई थी, उसके बाद डिजाइन किया गया, डिजाइन का काम सडक विभाग ने किया । विभाग ने प्रथम बार जो डिजाइन बनाया, उसके अनुसार पुल बनाते तो महंगा पड़ जाता । इसीलिए सस्ता करने के लिए पुनः दुबारा डिजाइन बनाया गया । उसीके अनुसार टेन्डर हो गया और निर्माण भी शुरु हुआ । लेकिन काम शुरु करने से पहले पप्पु कन्ट्रक्सन की ओर से उक्त डिजाइन की कमी–कमजोरियों के सम्बन्ध मेंं उल्लेख करते हुए दूसरा डिजाइन भी पेश किया गया था । फिर भी सडक विभाग के निर्देशन अनुसार ही पुल बनाने के लिए कहा गया । उसके बाद जरजस्ती काम शुरु हो गया । लगभग ३ साल के बाद काम सम्पन्न हो गया, उसके डेढ साल के बाद पुल टूट गया । पुल टूटने का मूख्य कारण पुल की क्षमता से अधिक बाढ़ आना भी है, दूसरा कारण पुल का डिजाइन भी रहा । मान लीजिए कि पुल का डिजाइन ४ सौ मिटर में पानी बहाने के लिए है, लेकिन १ सौ मिटर में पानी बहाया जाता है तो वह दुर्घटना होना स्वभाविक बनता है । ऐसे कई कारण है, उक्त पूल ड्यामेज होने के पीछे ।
खास बात तो यह भी है कि पूल कहीं भी टूटा नहीं है, पीलर धस गया है । पिलर क्यों धस गया ? इस प्रश्न का जवाफ तो डिजाइनर को देना है, पप्पु कन्ट्रक्सन को नहीं । गलत डिजाइन के अनुसार पुल बनाते हैं तो उसमें कुछ न कुछ तो ड्यामेज होता ही है । दूसरी बात, मीडिया के लोग ही कहते हैं कि पप्पु कन्ट्रक्सन द्वारा सयों पुल बना है । सयों पुलों में से अन्य पुल की अवस्था क्या है, वह नहीं दिखाते हैं । लेकिन जो पुल टूटा है, जो मैंने बनाया ही नहीं, उसके साथ मेरा फोटो रखकर प्रचार किया जाता है । और कहा जाता है– यह देखिए पप्पु कन्ट्रक्सन की दादागिरी । यह तो सरासर झूट है ।

० आपका खयाल में क्यों ऐसा हो रहा है ?

– हमारी संविधान की भावना है– हर क्षत्रों की प्रतिनिधित्व हमारे सांसद में हों । मुसहर, दलित, राजपूत, ब्राह्मण, मुसलिम, थारु, महिला, जनजाति सभी का प्रतिनिधित्व हो सके । समानुपातिक प्रणाली से कुछ व्यापारी भी संसद में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं । उसी में से मैं भी एक हूं । मैं ३५ सालों की अनुभव सहित निर्माण व्यावसायियों की ओर से प्रतिनिधित्व कर रहा हूं । देश में विकास निर्माण कैसे हो सकता है, मेरे पास हिमाल से तराई तक का अनुभव है । इसीलिए किसी को मेरी क्षमता और अनुभव को देखकर डर भी पैदा हो सकता है ।

यहां एक समूह चाहते हैं कि मधेशी आगे नहीं बढ़े,Papu construction बदनाम हो : MP Harinarayn Rauniyar

 

० आप ने कहा है कि पम्पु कन्ट्रक्सन से आप रिजाइन कर चुकें है, लेकिन लोग कहते हैं कि अभी भी अप्रत्यक्ष रुप में पप्पु कन्ट्रक्सन को आप ही संचालन करते हैं ? इसमें कुछ कहना चाहेंगे ?

– आरोप बिल्कुल गलत है । अगर कोई मेरे बिगत के बारे में पूछना चाहते हैं तो उसमें कुछ तो बताना ही होगा । प्रथम बात तो कम्पनी उस का व्यवस्थापन चालती है, राजनीतिक रुप से हो अथवा व्यक्तिगत उसमें मेरा कोई भी लेना–देना नहीं है । राजनीति में रह कर मुझे जो जिम्मेदारी निभानी है, अभी उसको पूरा करने के लिए भी मेरे पास समय नहीं है तो मैं कहां पप्पू कम्पनी में जाकर काम कर सकता हूं ? लेकिन जहां तक मेरा विगत और उसके सम्बन्ध में जो अनुभव है, अगर उस अनुभव को राष्ट्र निर्माण के लिए कोई प्रयोग करना चाहता हैं तो मैं सहयोग के लिए तैयार हूं ।
दूसरी बात, मैं राजनीति में हूं । मेरा भी घर है, परिवार है, उसको संचालन के खातिर कुछ खर्चों की आवश्यकता है । सांसद् के रुप में सरकार की ओर से मुझे जो मिलता हैं, उससे मेरा परिवार चलनेवाला नहीं है । इसीतरह आज जो भी पर्लियामेन्ट में हैं, क्या वे सब अपनी व्यवसाय और रोजगारी को छोड़कर आए है ? क्या जीने के लिए उन लोगों को कुछ न कुछ करना नहीं पड़ेगा ? सांसद के रुप में हमें जो पारिश्रमिक और सुविधा मिलता है, उससे हमारे परिवार चलनेवाला नहीं है, काठमांडू में जीने के लिए मुशकील है । कहने का मतलव है– राजनीति करनेवाले लोग परिवार चालने के लिए भ्रष्टाचार करें ? कई लोग तो यह भी कर रहे हैं, लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं है । इसीलिए माननीय होकर भी कोई व्यापार करते हैं, कोई उद्योग चलाते हैं तो कोई दुकान चालते हैं । जीने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही है । जीने के लिए मैंने जो संस्था खड़ा किया था, आज वह किसी को ह्याण्डओभर कर दिया हूँ । बाहर के व्यक्ति को नहीं, अपने ही लोग उसे चला रहे हैं । लेकिन कानुनी रुप में मेरा उस कम्पनी से आज कोई भी लेना देना नहीं है । इसीलिए अगर मैं भी फुर्सद के समय में अपने ३५ साल का अनुभव कहीं बांट लेता हूं तो  इसमें क्या बुरा नहीं है । उसके बदले जीने के लिए मुझे कम्पनी की ओर से कुछ मिलता है तो क्या यह गलत है ? सिर्फ पप्पु कन्ट्रक्सन की ही बात है, अन्य कोई भी कम्पनी राष्ट्र निर्माण के लिए मुझे और मेरी अनुभवों का प्रयोग कर सकता है । उदाहरण के लिए डा. बाबुराम भट्टराई को ले सकते हैं, वह पूर्व प्रधानमन्त्री भी है । डा. भट्टराई आर्किटेक्ट इञ्जिनियर भी हैं । अगर कोई उनको ‘एक्सपर्ट’ के रुप में प्रयोग करना चाहते हैं तो क्या वह गलत है ? नहीं है ।

० इसका मतलव आप माननीय होकर भी काम करते हैं ?

– अगर मेरी दक्षता और अनुभव किसी के लिए महत्वपूर्ण बनता है तो कर सकता हूं । लेकिन कम्पनी एज अ म्यानेजर और कर्मचारी के रुप में नहीं । एक सल्लाहकार के रुप में मैं अपनी अनुभव किसी को भी बांट सकता हूं ।

० आज निर्माण व्यवसायियों के ऊपर जो आरोप सरकार की ओर से लग रहा है, क्या वह सच है ?

– हां, निर्माण व्यावसायियों के ऊपर सरकार ने संस्थागत रुप से ही आरोप लगाया है कि वह निर्धारित समय में काम नहीं करते हैं । कई निर्माण व्यवसायियों के ऊपर दबाव भी दिया जा रहा है और कारवाही होने की बात भी सुनने में आया है । लेकिन मैं तो कहता हूं कि यह तो सरकार की नियोजित योजना के अनुसार हो रहा है, व्यवसायियों को बदनाम करने की कोशीश की जा रही है । हां, सिण्डिकेट करना अपराध है, वह एक भ्रष्टाचार भी है । लेकिन कानुन के मातहत रहकर संस्था खडा करना अपराध नहीं है । लेकिन आज सरकार नियम अनुसार निर्मित विभिन्न संस्था खारीज करने की बात कर रही है । मैं तो कहता हूं कि संस्था खारीज करने के बदले, सो संबंधी नियम ही खारीज किया जाए । इसीतरह निर्माण व्यवसायियों के ऊपर ही ऐसा ही कुछ हो रहा है । कोई भी निर्माण कम्पनी को खुद–व–खूद टेण्डर नहीं मिलता और यह सिर्फ एक करार ही नहीं है । राष्ट्रीय पत्रिका में नोटिस निकलता है, उसके बाद कम्पनी ग्यारेन्टी रखता है, बीड करता है, सबसे कम मूल्य में टेण्डर लेनेवाले को पहचान कर उसके साथ एग्रिमेन्ट किया जाता है । उसके बाद ही कम्पनी को काम मिलता है । काम का एक प्रक्रिया है, उसके अनुसार ही होता है । अगर नहीं होता तो ठेक्का टूट जाता है, उसके लिए एक अलग ही मन्त्रालय भी है । सबकुछ कानुन के अनुसार ही हो जाता है ।
आज तो एनजीओ–आईएनजीओ के ऊपर भी आक्रमण होने की बात आ रहा है । वह भी एक कानुन के अनुसार ही निर्मित संस्था है । यह सब देखने के बाद हम लोग नहीं समझ पा रहे हैं कि सरकार क्या चाहती है ? मेरा प्रश्न है– सारे राज्य में कानुनी राज्य पालन करने की जिम्मेदारी सिर्फ पुलिस को है ? यह तो नहीं है । सारे काम एक ही मन्त्रालय करती है तो अन्य मन्त्रालय और मन्त्रियों का औचित्य क्या है ? हां, कहीं गलत भी हो रहा होगा, उसको रोकिने की जिम्मेदवारी सम्बन्धित मन्त्रालय का है, उसके लिए नियम–कानुन बनाना होगा ।

० समाचारों में आ रहा है कि ठेकेदारों ने समय में काम नहीं किया, उन लोगों के ऊपर कारवाही होना चाहिए । इसके बारे में क्या कहते हैं ?

– क्या इसमें सिर्फ ठेकेदार जिम्मेदार हैं ? निर्धारित समय में काम न होने के पीछे कई अन्य कारण है, उसके ऊपर कुछ भी बहस नहीं किया जाता, लेकिन निर्माण व्यवसायियों के ऊपर अंगूली उठाया जाता है । जहां समय में काम नहीं हो रहा है, उसमें ७५ प्रतिशत राज्य जिम्मेदार है, निर्माण व्यवसायी नहीं । २५ प्रतिशत व्युरोक्रेसी और निर्माण व्यवसायी दोषी हैं । मैं यहां एक उदाहरण देता हूं– आज के दिन में देश भर में लगभग १२ सौ पुल निर्माण हो रहा है । कोई १ अरब का है तो कोई १५ करोड का । एभरेज में सिर्फ २० करोड़ का पुल मानते हैं तो उस को पूरा करने के लिए २५ अरब चाहिए । अब आप ही बताइए, क्या यह सम्भव है ? हमारी आर्थिक क्षमता उक्त पुल निर्माण करने में सक्षम रहेगी ? भौतिक मन्त्रालय की पूरा पाँच साल का बजट भी उसमें डाल दिया जाता है तो भी पुल पूरा नहीं होगा । इसीलिए इस तरह की कार्ययोजना के अनुसार हम लोग समय में कई भी काम सम्पन्न नहीं कर सकते हैं ।
दूसरा उदाहरण, मान लीजिए ३० करोड बजट में एक पुल निर्माण करना है । किसी कम्पनी के साथ ३० करोड़ बजट के साथ सम्झौता भी हो गया है और उस कम्पनी को कहा गया है कि ३ साल में निर्माण सम्पन्न करना है । अब हर साल सरकार को कम से कम १० करोड़ निर्माण कम्पनी को मिलना चाहिए । लेकिन उसके खाते में साल में सिर्फ १ करोड़ डाल दिया जाता है तो क्या ३ साल में निर्माण सम्पन्न हो पाएगा ? नहीं । १० करोड़ हर साल देते हैं तो ३ साल में निर्माण सम्पन्न होगा, अगर सिर्फ २ करोड़ दिया जाता है तो उसको सम्पन्न करने में १५ साल तो लगेगा ही । इसतरह का कई योजनाएं है, जो समय में निर्माण सम्पन्न नहीं हो पा रहा है, इसमें निर्माण व्यवसायी नहीं, सरकार जिम्मेदार है । यही बात मैंने पार्लियामेन्ट में भी रखा है । समय में निर्माण सम्पन्न न होने के पीछे दोषी कौन है ? इसके बारे में प्रमाण जुटाए बिना ही निर्माण व्यवसायियों को दोषी करार करना ठीक नहीं है । मैं आज यहा एक बात क्लियर कर दूं कि निर्माण व्यवसायियों को आज ९० अरब से अधिक रुपयां भुक्तानी देना बांकी है । ऐसी अवस्था में निर्माण व्यवसायी कैसे समय में काम सम्पन्न कर पाएगा ? इसीतरह साल भर पैसा नहीं मिलता, लेकिन आषाढ महीना में इधर का पैसा उधर, उधर का पैसा इधर करके कुछ बजट निकाला जाता है । आषाढ़ में बजट देकर काम सम्पन्न करने के लिए कहा जाता है तो काम कैसे ठीक से हो पाएगा ?

० इस तहर की समस्या कैसे समधान किया जा सकता है ?

– जहां जो आयोजना है, उसके लिए बजट कितना है और वह समय में उपलब्ध हो सकता है कि नहीं ? यह महत्वपूर्ण है । मान लीजिए, ३ साल में पूरा करने के लिए कोई भी एक परियोजना है, उक्त परियोजना के लिए आवश्यक रकम तीन साल के अन्दर में ही भुक्तानी करने की बात रेडबुक में लिखा गया है कि नहीं ? सबसे बड़ी महत्वपूर्ण बात यही है । हां, रेडबुक में भी बजट का व्यवस्था हो गया है, तब भी ३ साल के भीतर काम सम्पन्न नहीं किया जाता है तो उसमें निर्माण व्यवसायी दोषी हो सकते हैं । लेकिन उसके बाद भी फिल्ड क्लियरेन्स सम्बन्धी कई बात होती है, जिसके चलते निर्माण व्यवसायी अपने काम समय में सम्पन्न नहीं कर पातें । इसमें भी निर्माण व्यवसायी को ही दोषी करार दिया जाता है । जैसे की जहां परियोजनाएं है, वहां बन कटानी हुआ है या नहीं ? जमीन की मुआब्जा दिया है या नहीं ? विद्युत का पोल हटाया है या नहीं ? खानेपानी और टेलिफोन का अवरोध है तो उसको हटाया है कि नहीं ? यह सब देखना पड़ता है । उल्लेखित सब समस्या क्लियर करने की जम्मेदारी राज्य का है, निर्माण व्यवसायियों का नहीं । अगर सब कुछ क्लियर होते हुए भी ३ साल के अन्दर परियोजनाएं सम्पन्न नहीं किया जाता है तो वहां निर्माण व्यवसायी दोषी होते हैं ।

० जहां अवरोध है और काम समय में सम्पन्न करना मुश्किल है तो निर्माण व्यवसायी काम करने के लिए क्यों सम्झौता करते हैं ?

– वि.सं.२०६३ में निर्मित ऐन में स्पष्ट है कि मुआब्जा तथा फिल्ड क्लियरेन्स सम्बन्धी सभी अवरोध खत्म हाने के बाद ही निर्माण कार्य के लिए सम्झौता किया जाएगा । लेकिन राज्य की ओर से ही कानुन का उल्लंघन हो रहा है । प्रक्रिया पूरा किए बिना ही हचुवा में सम्झौता किया जाता है, क्या इसमें सिर्फ निर्माण व्यावसायी दोषी है ?

० फिल्ड क्लियर न होने के पिछे निर्माण व्यवसायी कितने जिम्मेवार है ? कहा जाता हैं कि निर्माण व्यवसायियों की ओर से ही किसी स्थानीय को उक्सा कर उसमें अवरोध किया जाता है !

– बिलकुल गलत ! स्थानीय बासी मुआब्जा मांगते हैं, बन कर्मचारी आकर रुख काटने के लिए रोक देते हैं तो उस समस्या का समाधान निर्माण व्यवसायी कैसे कर सकता है ? क्या मुआब्जा भी ठेकेदारों को ही देना है ? विद्युत पोल न हटाने के लिए क्या निर्माण व्यवसायी कहते हैं ? आप देखते हैं कि टेलिफोन का लाइन खड़ा है, क्या वहां भी निर्माण व्यवसायी न हटाने के लिए कहते है ? यह बात आया कहां से कि निर्माण व्यवसायी उचाल देता है !? यह सफ बहाना–बाजी है । भारत हो या और अन्तर्राष्ट्रीय जगत के कई बड़े–बडे कम्पनी क्यों वापस हो गए है ? क्या उन्होंने भी विजुली का पोल न हटाने के लिए कहा ?
दूसरी बात है– हमारी नियम–कानुन में भी कई कमजोरिया हैं । मान लीजिए कि कोई एक कम्पनी का बीड क्यापिसिटी १ अरब का है । वह अपने क्यापिसिटी के अनुसार एक टेण्डर ले लेता है । लेकिन वही कागज दिखाकर वह कल और ५० टेण्डर लेता है । एक काम पूरा किए बिना ही उसको दूसरा काम दिलाने के लिए कौन जिम्मेदार है ? यह तो कानुन की कमजोरियां है । इसतरह यहां कई विकृतियां है, जिसको हटाना है । लेकिन ‘हार्ड एण्ड फास्ट’ नहीं । कानुन निर्माण कर उसको हटाया जा सकता है ।

० अन्त में कुछ कहना चाहेंगे ?

– हां, मैं मधेश से प्रतिनिधित्व करता हूं । कई राजनीतिक लड़ाई के बाद ही हम लोग जैसे मधेशी आज ऊपर आ रहे हैं, जिसके पास राष्ट्रीय भावना भी है । लेकिन जब–जब कोई मधेशी ऊपर आना चाहता हैं तो उस को कहीं न कहीं मुद्दा–मामिला में फसाया जाता है, राजनीति में ऊपर जाने के लिए अवरोध किया जाता है । यहां एक समूह है, जो चाहते हैं कि मधेशी आगे नहीं बढ़े । इसमें एक वर्ग के सरकारी कर्मचारी और मीडिया के लोग भी सक्रिय हैं । उन लोगोंका यह सोच होता है कि मधेश से आए हुए लोग को किस ढंग से निरुत्साहित किया जाए और रोका जाए । इस बात को पुष्टि करने के लिए यहां पप्पु कन्ट्रक्सन को ही जोड़कर एक उदाहरण पेश करना चाहता हूं– नेपाल में एक–डेढ सौ निर्माण कम्पनियां है । उसमें से लगभग २० कम्पनी ऐसे हैं, जो २० अरब से भी ज्यादा का काम कर रहा है । उन कम्पनियों की नाम मीडिया में कहीं भी नहीं आ रहा है । अन्य कम्पनी किस तरह काम कर रहा है, इसकी चर्चा भी बहुत कम ही होती है । लेकिन पप्पु कन्ट्रक्सन, जो २० कम्पनियों के अन्दर भी नहीं पड़ती है, उसके बारे में अनेक अफवाह फैलाया जाता है । पत्र–पत्रिका के फ्रन्ट पेज में समाचार बनाया जाता है । ऐसा क्यों हो रहा है ?
हां, काम करते वक्त कभी–कभार गलतियां हर कोई से होता है । लेकिन उसको सुधार करने का मौका मिलना चाहिए, न कि उस कम्पनी को अस्तित्व ही मिटाया जाए । यहां पप्पु कन्ट्रक्सन और बबई पुल का एक और उदाहरण पेश करना चाहता हूं– उस वक्त सिर्फ पप्पु कन्ट्रक्सन द्वारा निर्मित बबई पुल ही ड्यामेज हुआ था, यह नहीं है । देशव्यापी भारी बारिस होने के कारण उस वक्त देश के अन्य भू–भाग में रहे १९ पुल ड्यामेज हुआ था, जो काठमांडू से लेकर देश के कई भूभाग में बनाया गया था । लेकिन क्यों सिर्फ बबई पुल का समाचार बना ? दूसरी बात, कभी–कभार भू–स्खलन, बाढ़, भूकंप आदि प्राकृतिक प्रकोप के कारण ऐसे कई पुल टूट जाता है, जिसको एक निर्माण कम्पनी के साथ जोड़कर प्रचार करना ठीक नहीं है । यह कोई भी बड़ा इस्यु नहीं है, लेकिन नेपाली मीडिया पप्पु कन्ट्रक्सन को ही इस्यु बना देते हैं । इसके जरुर कोई न कोई एक समूह का षड्यन्त्र है, जो मधेशी को ऊपर आने के लिए रोकना चाहते हैं ।
एक और उदाहरण– चुनाव के समय में मुझे चुनाव हराने के लिए कुछ पत्रकार ऐसे लगे हुए थे कि वह मुझे पप्पु कन्ट्रक्सन के साथ जोड़कर प्रचार करते थे । मैं जहां जाता था, वहां के जनता मुझे स्वागत कर सम्मान करते थे । लेकिन उस सम्मान को फोटो खीचकर कुछ मीडिया टूटा हुआ पुल (जो मैंने नहीं बनाया है) उसके साथ जोड़कर प्रचार करते थे । लेकिन मैं एक समाजसेवी भी हूं । स्थानीय तहों में मुझे निर्माण व्यवसायी से ज्यादा समाजसेवी के रुप में जाननेवाले भी कई लोग हैं । उन लोगों के साथ और विश्वास के कारण ही मैंने चुनाव जीता है । लेकिन चुनाव जितने के बाद भी मुझे बदनाम करने की कोशीश हो रही है ।
यहाँ तो मधेशी समुदाय होने के कारण भी साप्रदायिक भेदभाव होता है । इस तरह भेदभाव करते हैं तो हम लोग समृद्ध नेपाल नहीं बना पाएंगे । क्षमतावान मधेशी को अपने पूरी क्षमता के साथ काम करने का मौका मिलता है तो वह भी देश के लिए कुछ न कुछ कर सकते हैं । यहां राजनीतिज्ञ जयप्रकाश गुप्ता का उदाहरण काफी है और सान्दर्भिक भी है । आज ऐसे कई भ्रष्टाचारी खुलम–खुला घूम रहे हैं, जिसके पास कल तक कुछ भी नहीं था । लेकिन आज उन लोगों के पास काठमांडू में १० से भी अधिक घर खरीदने की क्षमता है । लेकिन गुप्ता जी को ‘भ्रष्टाचारी’ करार देकर उनकी राजनीतिक जीवन को खत्तम कर दिया गया । अगर कोई क्षमतावान मधेशी आगे आना चाहता है तो उसको झूटा मुद्दा में इसतरह फसाकर हतोत्साहित किया जाता है । मैं भी एक निर्माण व्यावसायी हूं, राज्य से ठेक्का लेकर निर्माण का काम करता था । लेकिन मधेशी होने के कारण ही आज कुछ लोग मेरे पीछे पड़े हुए हैं ।
हां, नियतबस मैंने कई भ्रष्टाचार किया है अथवा गैरकानुनी काम किया है तो मेरे ऊपर कारवाही होना चाहिए । लेकिन नियतबस किसी को बदनाम करने के लिए लग जाते हैं तो वहां कई बाहना निकल जाता है । अपने को एक बड़ा–सा मीडिया संचालक तथा पत्रकार बताने वाले व्यक्ति अगर नियतबस किसी के पीछे लग जाता है तो मैं क्या कर सकता हूं ? मुझे लगता है कि यह तो पत्रकारों का धर्म नहीं है । अगर कोई विषय मेरे साथ जुड़ा हुआ है तो उसमें मेरा दृष्टिकोण क्या है, इसके बारे में पूछना चाहिए या नहीं ? मेरे साथ कुछ पूछे बिना ही नियतबस समाचार बनाया जाता है, उसमें मेरा फोटो रखा जाता है । यह सब देखने के बाद आज मेरे मन में प्रश्न उठ रहा है– मेरे साथ ऐसा भेदभाव क्यों हो रहा है ?

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