परंपरा और आधुनिकता के बीच पिसती ज़िंदगी : मुक्तिनाथ शाह

मुक्तिनाथ शाह, जनकपुर,12 मार्च |
एक बात मेरे जेहन में बार बार आती है कि हम क्या चाहतें हैं ? हमारा समाज और राष्ट्र क्या चाहता है ? एक ओर तो हम कहते हैं कि आज का यूग ग्लोब्लाईजेशन का युग है,हमें और हमारे संततियों को दुनिया में प्रतिस्पर्धा करना होगा। हमें हमारे बच्चों को इस तरह की शिक्षा दीक्षा देनी होगी की वह दुनियां में प्रतिस्पर्धा कर सके। क्योंकि दुनियां की तकनिकों को हमे समझना ही होगा,दुनियां के साथ चलने लायक हमें बनना ही होगा। यह हमारी जरूरत भी है और बाध्यता भी। यदि दुनियां के तकनिकों को हम ना समझ सके, उस के साथ ना चल सके तो फिर हमारा जीना दूभर हो जाएगा। पर दूसरी ओर हम अपनी परंपराओं को भी कायम रखना चाहते हैं,परंपराओं के साथ चलना चाहतें है।यह अपने आप में विरोधाभास है। पुरानी परंपरा और आधुनिकता कैसे साथ साथ चल सकती है ? इस से लगता है कि कहीं ना कहीं हम विरोधाभास की ज़िंदगी जी रहे हैं और आजकल हमारे समाज में व्याप्त कई तरह की तनाव एवं घटने वाली घटना का मुख्य कारण भी यही हो सकता है।
Globalization-effects-
          यदि हम भाषा की ही बात करतें हैं तो आज दुनियां में प्रतिस्पर्धा करना है तो हमें अंग्रेजी भाषा, जिसका बोलबाला दुनियां भर में है, को जानना ही होगा। क्यूकि दुनियां के लगभग हरेक देश और हरेक क्षेत्र में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग होता रहा है। पर दूसरी ओर हम अपनी मातृभाषा और प्रादेशिक भाषा पर भी जोर दे रहे हैं। इस को छोडना नही चाहतें है। इस को बचाए रखने के लिए भरपूर प्रयास करते हैं। आज के दौर में अभिवावक और बच्चों में भी एक प्रकार की अन्यौलता बनी रहती है की किस भाषा को अहमियत दें और किस हद तक। सामान्य जानकारी और किसी खास मकसद तक तो ठीक है पर जहाँ तक शिक्षा पद्धति की बात है, इस को माध्यम बनाना कितना उचित है ? जब की हम जानतें है कि इसका भबिष्य सीमित है।अन्तर्राष्ट्रीय बजार में न भाषाओ का कोई महत्व नही। इस क्षेत्र में जो लगेंगे उन का दायरा भी सीमित हो जाएगा और मात्र जिवीकोपार्जन का माध्यम भर बन सकता है। कहने और सुनने में अच्छा तो नही लगता पर कटु सत्य है कि जिस को लोप होना है वह होगा ही। हम जितनी भी बचाने की कोशिश करें नही बचेगा। फिर दुनियां उसी की ओर भागती है जो बिकती है। अभी हरेक देश दुनियां में बिकने वाली,दुनियां में प्रतिस्पर्धा कर सकने वाली जनशक्ति ही उत्पादन करने मे लगी है।
       इसी तरह यदि हम हमारी रहन सहन,संस्कृति और परंपरा की बात करें तो यहां भी भारी विरोधाभास दिखता है। एक ओर हम पाश्चात्य संस्कृति,रहन सहन और परंपरा की ओर आकर्षित हो रहे हैं क्योंकि दुनियां उसी ओर बढ़ रही है और हमें दनियां में प्रतिस्पर्धा करनी है तो दूसरी ओर हम अपनी संस्कृति,रहन सहन और परंपरा को भी नही छोडना चाहते। क्यो की हम सोचते हैं कि कहीं हमारी संस्कृति और परंपरा लोप न हो जाए। इस से हमारे समाज में अभिवावक और बच्चों के बीच भारी और स्पष्ट बिमति दिखती है। ऐसी स्थिति है कि न हम पाश्चात्य शैली में पुरी आजादी से जी पा रहें हैं न ही पुरी तरह परंपरा में बंधना चाहतें है।है न विरोधाभास ? हमारे समाज में यदि अंतरजातीय विवाह होती है तो लोग परंपरा और जात पात के नाम पर हाय तौवा मचा देते हैं, उन का जीना दुभर कर देते हैं।पर वही दम्पत्ति अगर आर्थिक रूप से सबल हो जाए या कोई अच्छा पद पा ले वही समाज सब कुछ भूला कर वाह वाह करनें लग जातें है।यदि सब के सब अंतरजातीय विवाह करने लगे तो कालांतर मे इस का क्या प्रभाव पडेगा ? कैसा समाज का निर्माण होगा ? पारिवारिक और सामाजिक संरचना कैसी होगी ?  भावनात्मक संबध कैसा रहेगा , समाज मे व्याप्त खराब पक्ष को समाज और सरकार द्वारा समय समय पर परिर्वतन किया  जाता रहा है यह कहकर यह रूढि़बादी परंपरा है।पर दूसरी ओर उन्ही द्वारा कुछ परंपरा और संस्कृति को बढावा देतें है पौराणिक परंपरा और मौलिकता के नाम पर।तो क्या जिस परंपरा,संस्कृति और मौलिकता को संस्थागत रूप में बढावा दिया जाता है,बचाया जा रहा है उस में कोई रूढिबादि परंपरा नही होती ? एक तरफ कहा जाता है कि रूढिबादी परंपरा को निरूत्साहित किया जा रहा है पर असल में दूसरी ओर किसी दूसरी रूढिबादी परंपरा को मलजल दिया जा रहा है।
         आज महिलाओं की स्वतंत्रता,समानता,सहभागिता आदि पर बहुत बात की जाती है।बहुत अच्छी बात है कि महिलाओं को स्वतंत्रता मिलनी चाहिए,समान अवसर मिलनी चाहिए,सरकार की हरेक क्षेत्र और अंग में सहभागिता होनी चाहिए।महिलाओं के साथ भेदभाव या उत्पीडन जैसी बात नही होनी चाहिए।आज के बदलते परिवेश में महिला हरेक क्षेत्र में सक्षम है,सफल भी है।पर जीतन िस्वतंत्रता दी जा रही है उतना ही हमारा समाज खलबला भी रहा है।यह कटु सत्य है।पारिवारिक रिश्ते कमजोर पड़ रहें है,बच्चों का पालन पोषण और संस्कार पर असर पड़ रहा है।माता पिता का समुचित प्यार और लगाव न पाने के कारण बच्चों में एक प्रकार की मानसिक विकृति पनप रही है।परिवार बिखर रहा है।आज आलम यह है कि हम पुरी तरह पाश्चात्य संस्कृति को न तो स्वीकार करने की स्थिति में हैं न ही पुरी तरह अस्वीकार करने की स्थिति में हैं।एक बहुत बडा विरोधाभास की ज़िंदगी जी रहें हैं हम।क्या ठीक क्या नही ठीक की स्थिति में है हम।यह अलग बात है कि कहीं पुरूष द्वारा महिला हिंसा,उत्पिडन,उपेक्षा,और यौन शोसन का शिकार हो रही है तो कहीं अति महत्वकांक्षा या अन्य दुसरे कारणों से महिला खुद ऐसी बातों का जिम्मेबार होती है।आज की स्थिति यह है कि हमारी सदियों से चली आ रही सामाजिक मान्यताऐं,परंपराऐं टूट रही है विकास के नाम पर,आधुनिकता के नाम पर।एस का यह कदापी तात्पर्य नही है की महिलाओं को स्वतंत्रता न दिया जाए,उन को अवसर न दिया जाए,उन से समान व्यवहार न किया जाए ,उन को अवला समझा जाए।आज भी सक्षम और योग्य महिला हरेक क्षेत्र में सफल है,पुरूषों के साथ कांधे में कांधा मिलाकर कार्य कर रही हैं कहीं कहीं तो पुरूष से बेहतर कर रही है।
      आज परंपरागत सोच और आधुनिक सोच के टकराव के कारण तीन(तीन पीढीं हो रही है।बृद्ध माता पिता को बृद्धाश्रम में रखनें की परंपराऐं बढ़ रही है या उन से अलग हो कर एकल परिवार की ज़िंदगी जीने की होड सी मची हई है।दुसरी ओर नवालिग बच्चों को शिशु स्याहार केंद्र या हास्टल में रख कर स्वतंत्र ज़िंदगी जीने की परंपरा फल फूल रही है।यहां तक कि स्वतंत्रता के नाम पर पति पत्नी के बीच का रिश्ता भी बिगड रहा हैं,तलाक की संख्या भी दिनानुदिन बढ़ रही है।इस में कौन कितना दोषी है कहना बड़ा मुश्किल होता है।आज पति,पत्नी और बच्चों सब को स्वतंत्रता चाहिए।सब की अपनी अपनी मान्यताऐं होती है और उसी के अनुरूप सब जीना चाहतें हैं।ईसी वजह से आज भावनात्मक संबध में व्यापक कमी आ रही है।सामाजिक संरचना तहस नहस हो रही है।आखिर किन किन को कितना स्वतंत्रता चाहिए ? स्वतंत्रता की नाम पर अनुचित मार्ग पर चलने वालों की भी कमी नही आज के दौर में।
      एक बात स्मरण करनें योग्य है कि परंपरा से चली आ रही कई चीजें नए बदलावों से कहीं अधिक बेहतर होती है।किसी भी बदलाव की प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने मूल से कितना सुसंगत है। यदि परिवर्तन ऐसे हों की वे संपूर्ण ढ़ांचें के लिए ही खतरा उत्पन्न करनें लगें,तो ऐसे में जरूरी है की परिवर्तनकारी तत्वों को नियंत्रित किया जाए या उनके ढ़ांचें को अनुकुल बनाया जाए।
Loading...