परमादेश की अवमानना : प्रो. नवीन मिश्रा

प्रो. नवीन मिश्रा

प्रो. नवीन मिश्रा

ऐसा नहीं है कि सबों ने न्यायालय के निर्णय की आलोचना की है । बहुत सारे प्रवुद्ध व्यक्तियों ने जिस में अमरेश सिंह, विमलेन्द्र निधि, रामसरोज यादव, मोहन वैद्य किरण, पदम्रत्न तुलाधर, आदि ने न्यायालय के निर्णय को सही ठहराते हुए उसका स्वागत किया है

सर्वोच्च अदालत के द्वारा चार दलों के बीच सम्पन्न सोलह सूत्रीय सहमति कार्यान्वयन नहीं करने के लिए परमादेश क्या जारी किया, पूरे देश में हंगामा मच गया । बिना सोचे समझे कोई इसे शक्ति पृथकीकरण सिद्धान्त के प्रतिकूल बता रहा है तो कोई इसे विधि के शासन तथा नागरिक सर्वोच्च के । कुछ लोग इसे संविधान निर्माण की प्रक्रिया में कोड़ा मान रहे हैं । न्यायालय के इस आदेश का न सिर्फ खसवादी मानसिकता से ग्रसित नेताओं ने आलोचना की है, बल्कि कुछ प्रमुख राजनीतिक दल भी इस होड़बाजी में शामिल हैं । यहाँ तक कि देश के प्रमुख अखबारों ने भी न्यायालय के इस निर्णय की भत्र्सना ही नहीं की है बल्कि नेताओं और दलों के द्वारा जो विरोध जताया जा रहा है, उसकी प्रशंसा भी की है । जबकि सच्चाई बिल्कुल ही इसके विपरित है । यह निर्णय शक्ति पृथकीकरण सि

Grishchandra lal

न्यायाधीश गिरिशचन्द्र लाल

द्धान्त के प्रतिकूल नहीं बल्कि अनुकूल है । ऋषि धमला ने तो मधेशियों की राष्ट्रीयता पर ही सवाल उठा दिया ।  मधेशियों के निर्णय को वह षड्यन्त्रकारी बताते हुए कहते है कि ऐसा निर्णय इसलिए आया क्योंकि इस मामले का विषय, वकील और न्यायाधीश सभी मधेशी थे । अगर ऐसा ही है तो मधेशियों को भी सभी पहाड़ी न्यायाधीशों का निर्णय अमान्य होना चाहिए । जहाँ तक मधेशी में राष्ट्रीयता का प्रश्न है, ऋषि धमला जैसे लोगों को समझ लेना चाहिए कि अगर मधेशी में राष्ट्रीयता नहीं होती तो नेपाल का नक्सा कब का बदल गया होता । मधेशियों के कारण ही नेपाल की सीमा सुरक्षित और अक्षुण्ण है, जिसके लिए अन्य देशों को सीमा सुरक्षा बल पर न जाने कितने पैसे खर्च करने होते हैं । ऋषि धमला जैसे लोगों के व्यक्तव्यों और मानसिकता के कारण मधेश में जयकृष्ण गोइत और सीके राउत पैदा होता है, जिसकी अन्तिम परिणति होती है– जनआन्दोलन ।
ऐसा नहीं है कि सबों ने न्यायालय के निर्णय की आलोचना की है । बहुत सारे प्रवुद्ध व्यक्तियों ने जिस में अमरेश सिंह, विमलेन्द्र निधि, रामसरोज यादव, मोहन वैद्य किरण, पदम्रत्न तुलाधर, आदि ने न्यायालय के निर्णय को सही ठहराते हुए उसका स्वागत किया है । जो लोग न्यायालय के इस निर्णय को शक्ति पृथकीकरण सिद्धान्त का विरोधी बता रहे हैं, उन्हें पहले शक्ति पृथकीकरण सिद्धान्त के विषय में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । १९वीं शताब्दी में मांतेक्यु के द्वारा इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया । इसे सिद्धान्त के पीछे उनकी सोच थी कि अगर सभी शक्तियां सरकार के किसी एक अंग या व्यक्ति को सौंप दिया जाए तो वह तानाशाह बन सकता है । अतः शक्तियों का पृथकीकरण करना जरूरी है । इसी सिद्धान्त के आधार पर शक्तियों को तीन भागों में विभाजन कर सरकार के तीन अंगो व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की स्थापना की गई । व्यवस्थापिका का काम है कानून का निर्माण करना, कार्यपालिका का काम है कानून को लागू करना और स्वतन्त्र न्यायपालिका का काम है कानून की रक्षा करना । साथ ही उसने अवरोध और संतुलन के सिद्धान्त का भी प्रतिपादन कर सरकार के सभी अंगों को अधिकार प्रदान किए जिससे एक अंग दूसरे अंग पर नियन्त्रण स्थापित कर सके । इसके परिणामस्वरूप सरकार का कोई भी अंग अपनी शक्ति का दुरूपयोग नहीं कर सकेगा । न्यायालय का निर्णय है कि संविधान सभा (व्यवस्थापिका) से बाहर जाकर संविधान का निर्माण न हो । संविधानसभा के द्वारा ही जैसा कि संविधान की धारा में भी उल्लेखित है, संविधान निर्माण होना चाहिए । अब समझ में नहीं आता है कि इस निर्णय में क्या गलत है, जो इतना बबाल मचा हुआ है । निर्णय के विरोध में एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि इसके कारण संविधान निर्माण में देर होगी । तो अब तक इतने वर्षों में इतना सारा पैसा खर्च होने के बावजूद भी संविधान का निर्माण क्यों नहीं हो सका ? न्यायालय का निर्णय तो अभी आया है । यह भी कहा जा रहा है कि मधेशी मामले से संम्बन्धित विषय की सुनवाई मधेशी न्यायाधीश के द्वारा नहीं  किया जाना चाहिए था । अगर ऐसा है तो किसी पहाड़ी मामले की सुनवाई पहाड़ी न्यायाधीश के द्वारा नहीं की जानी चाहिए । कुछ लोग यह भी तर्क दे रहे हैं कि न्यायालय के इस निर्णय को ही अमान्य कर दिया जाए । अगर ऐसा है तो कल को कोई अपराधी भी न्यायालय के निर्णय को अमान्य कर सकता है या फिर सम्पूर्ण मधेश संविधान सभा को ही अमान्य कर सकता है ।
मानते हैं कि १६ सूत्रीय समझौते में शामिल दल संविधानसभा के सर्वाधिक बड़े दल हैं, लेकिन इसके अतिरिक्त भी संविधानसभा में और भी दल हैं, जो देश के अल्पसंख्यकों जैसे की मधेशी, जनजाति आदि का प्रतिनिधित्व करते हैं । भले ही इनकी संख्या कम है लेकिन संविधान निर्माण में इनकी भी सहमति आवश्यक है । संविधान का निर्माण सहमति के आधार पर होना चाहिए, प्रायः सभी विज्ञों ने ऐसी राय जाहिर की है । ऐसे में बहुमत के आधार पर जबरदस्ती निर्मित संविधान, जिस में संघीयता, मधेशी, जनजाति, महिला के हितों की उपेक्षा की जाए, कभी मान्य नहीं हो सकता । न्यायालय का निर्णय अगर सचमुच संविधान निर्माण प्रक्रिया में बाधक है तो इसका समाधान भी कानून सम्मत ढंग से ही खोजना पड़ेगा, न कि उसके निर्णय को अस्वीकार करके । सत्ता के पीठाधीशों की मनमानी अब बर्दास्त नहीं की जाएगी । मधेशी हकहित की रक्षा के लिए नेपाल के इतिहास में पहली बार न्यायलय का ऐसा निर्णय आया है, जो स्वागतयोग्य है । अभी तक मधेश की जनता अपने हकहित के लिए आवाज उठाती रही है अब न्यायालय का निर्णय भी उसके पक्ष में आने लगा है । नेपाल के न्यायिक इतिहास में न्यायालय का यह निर्णय मील के पत्थर से कम नहीं है । बेतुकी बयानबाजी से बात और बिगड़ेगी । समय है, समझदारी से निर्णय लेने का । सबों को साथ लेकर चलने का । ऐसा संविधान निर्मित हो, जिससे सभी वर्गों और सभी क्षेत्रों की जनता के हकहित की रक्षा हो सके ।
अभी तक किसी भी दल या नेता को संविधान निर्माण की चिन्ता नहीं थी । सभी अपने अपने स्वार्थों और राजनीतिक रोटी सेंकने में लीन थे । ऐसे में जेठ २५ गते के दिन जब चार प्रमुख दलों नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले, एकीकृत माओवादी तथा मधेशी जनअधिकार फोरम (लोकतन्त्रिक) के बीच १६ बुँदे समझदारी या समझौता के बाद देश को लगा था कि इतने दिनों से रुकी हुई संविधान निर्माण की गाड़ी अब आगे बढेÞगी । इन सभी दलों के बीच आठ प्रदेश के निर्माण पर सहमति जताई गई है लेकिन सबसे कठिन कार्य प्रदेशों के नामांकन और उससे भी ज्यादा उनका सीमांकन अभी बाँकी है । अनेकों बार दलों के बीच सहमति नहीं होने के कारण संविधानसभा महीनों तक अवरुद्ध रहा । सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के विरुद्ध चार राजनीतिक दलों ने कठोर विरोध व्यक्त करते हुए, न्यायलाय के निर्णय को अमान्य करते हुए संविधान निर्माण की प्रक्रिया को नहीं रोकने की बात कही है और न्यायालय को यह भी चेतावनी दी है कि वह राजनीतिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करे । देश का सबसे भ्रष्ट तन्त्र राजनीतिक तन्त्र ही है, यह बात कई बार उजागर हो चुकी है । ऐसे में अगर न्यायालय राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करना बन्द कर दे तो जो भी भ्रष्ट नेताओं के दिल में थोड़ा बहुत कदाचार के लिए खौफ है, वह भी समाप्त हो जाएगा और ऐसी स्थिति में देश का क्या हाल होगा, यह कहना मुश्किल है ।
स्वतन्त्र, निष्पक्ष, ईमानदार, तथा सक्षम न्यायिक व्यवस्था लोकतन्त्र के लिए अनिवार्य है । न्याय प्रणाली अन्तर्गत किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप न हो तथा न्यायाधीश अपने निर्णय में स्वतन्त्र हो, इसलिए न्यायपालिका को राज्य के अन्य अंगो से स्वतन्त्र रखा जाता है । आवश्यक है कि संविधान और कानून की व्याख्या न्यायालय के द्वारा की जाए । यही कारण है कि अन्तर्राष्ट्रीय कानून द्वारा भी न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को लोकतान्त्रिक व्यवस्था की न्यूनतम आवश्यकता के रूप में स्वीकार किया गया है । लेकिन यह तय है कि स्वतन्त्रता का अर्थ स्वच्छन्दता नहीं होता है । कहा जाता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं होता और न्यायाधीश भी इसके अपवाद नहीं होते । इस् सम्बन्ध में एक बार भारत के पूर्वप्रधान न्यायाधीश ने कहा भी था कि ‘समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने काम के प्रति जवाबदेह होता है, यहाँ तक की न्यायाधीश भी । इसी कारण अन्तर्राष्ट्रीयस्तर पर न्यायाधीशों को जवाबदेह बनाने के लिए मापदण्ड निर्धारित किए गए हैं । न्यायपालिका को जवाबदेह बनाने के सम्बन्ध में भी विभिन्न देशों में भिन्नता पाई जाती है । पड़ोसी देश भारत में भी न्यायाधीशों को जवावदेह बनाने के लिए कोई संयन्त्र, विधि का अभाव है । लेकिन वर्तमान समय में इस दिशा में प्रक्रिया आगे बढ़ी है, जिस में पूर्वप्रधान न्यायाधीश के संयोजकत्व में गठित पाँच सदस्यीय समिति न्यायाधीश विरुद्ध के मामलों की सुनवाई कर सकता है । इसी तरह श्रीलंका में संविधान के धारा १०७ के अनुसार न्यायाधीश को संसद अपने बहमत से पदमुक्त कर सकता है । लेकिन इस प्रावधान का न्यायापालिका की स्वतन्त्रता पर कुठाराघात मानते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसकी निन्दा की है । बंगलादेश में न्यायाधीशों के आचरण तथा कार्य क्षमता की छानबीन करने के लिए अधिकार वहाँ की सर्वोच्च न्याय परिषद् को दिया गया है । इस परिषद् का अध्यक्ष प्रधानन्यायाधीश होता है । नेपाल के २०४७ साल के संविधान में न्यायपरिषद् की स्थापना कर न्यायिक स्वतन्त्रता तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया लेकिन इस में संतुष्टि नहीं होने के कारण अन्तरिम संविधान में संसदीय सुनवाई सम्बन्धी व्यवस्था की गई है । लेकिन इन दोनों ही संरचना विवादित बनने के कारण व्यवहार में अभी तक सफलतापूर्वक कार्यरत नहीं हैं । वि.सं. २०४७ साल के संविधान निर्माण के समय न्यायालय की स्वतन्त्रता बनाए रखने के लिए बहुत कुछ प्रयास किया गया । न्यायालय को स्वतन्त्रता तो प्रदान की लेकिन इसके भीतर विद्यमान सामन्ती प्रवृत्ति का अन्त नहीं कर सकी । यही कारण है कि न्याय प्रणाली से जनसाधारण अभी तक वंचित है । न्यायपालिका को जिम्मेदार बनाना भी जरूरी है । लेकिन इस कार्य के विलए संसदीय समिति का उपयोग करना सर्वथा अनुचित होगा । क्योंकि ऐसा करने में राजनीतिक प्रभाव का खतरा बना रहेगा । इससे न सिर्फ कानुन का शासन प्रभावित होगा, बल्कि लोकतन्त्र भी हमारा कमजोर हो जाएगा । बल्कि इस कार्य की जिम्मेदारी न्याय परिषद् को सौंपी जा सकती है लेकिन उस में भी व्यापक सुधार की आवश्यकता है ।
अपनी पार्टी की खुशामद में और अपना प्रधानमन्त्री बनाने का सपना संजो ओली एयरपोर्ट से ही न्यायालय और राष्ट्रपति पर बोली की गोली छोड़ते नजर आए । पता नहीं राष्ट्रपति ने ऐसा क्या कह दिया, जो इस बात का भी बितण्डा खड़ा किया जा रहा है । उन्होंने तो सिर्फ इतना ही कहा कि सरकार के सभी अंगो के बीच सामंजस्य होना चाहिए । इस में गलत क्या है ? फैसला देनेवाले न्यायाधीश गिरिशचन्द्र लाल और यहाँ तक कि राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव पर भी महाभियोग लगाने की चर्चा जारी है । अगर ऐसा कुछ होता है तो ताज्जुब नहीं कि एक बार फिर मधेश जल उठे और इसकी ज्वाला में क्या खाक होगा, कहना मुश्किल है । अतः बिना किसी भेदभाव से परे ठंढे दिमाग से समस्या का समाधान खोजा जाना चाहिए ।

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