परमार्थ पथ

अध्यात्म पथ के पथिकों को र्सवप्रथम तो एक पवित्र व्रत लेना चाहिए । वह व्रत है- किसी का भी कभी भी किंचित् भी बुरा न चाहना । याद रखिए ‘निज प्रभुमय देखहीं जगत का संग करत विरोध -‘ -गोस्वमी तुलसीदास । जो सम्पर्ूण्ा जगत को अपने ही प्रभु की लीला मानता है, वह कैसे किसी का विरोध कर सकता है – कैसे किसी का अपकार, अहित कर सकता है –
जो साधक अपने दोषों को मिटाना चाहता है, चरित्र को दर्ुर्गुणों से मुक्त करना चाहता है, उसे दूसरो के दोषों की ओर नहीं देखना चाहिए । दूसरों के दोष देखने से द्रष्टा के अपने ही दोष पुष्ट होते हैं । इस तरह दोषों के साथ सम्बन्ध हो जाने से नित नये-नये दोष उत्पन्न होते हैं । और वे दोष ही क्रमशः बढÞते-बढÞते साधक को परमार्थ पथ से च्युत कर देते हैं ।
नित्य और अनित्य का विवेचन करते हुए हमें असत् का त्याग करना चाहिए और यथासम्भव सत् की ओर अग्रसर होना चाहिए । अनित्य वस्तु कर्ीर् इच्छा, उसके लिए प्रयत्न करना, वस्तु प्राप्त हो जाने पर फिर उसकी रक्षा करना, अनित्य वस्तु का नाश तो होगा हीं, फिर उससे दुःख होना यह तो सिफ मूखर्ता हीं है । इस विषय में हमें सचेत होना चाहिए ।
‘सब कुछ वासुदेव ही है, वासुदेव के सिवा कुछ है ही नहीं’ – इसका जितना भी मनन किया जाए, विचार किया जाए, उतना ही उत्तम है । सब साधन इस एक में आ जाते हैं । श्रुति कहती है- र्सवर्ं खल्विदं ब्रहृम । इसी तथ्य को संत तुलसीदास कितने सुमधुर शब्दों में समझाते हैं-
सिया राममय सब जग जानी,
करऊँ, प्रनाम जोरी जुग पानी ।
यह धारणा जब दृढÞ से दृढÞतर होती जाती है, तब साधक के मन बुद्धि में ऐसा भाव आता है- प्रभु जो कुछ करते हैं, और करेंगे, उसी में मेरा हित है । किसी ने क्या खूब कहा हैर्-र् इश्वरः  यत्करोति शोभनमेव करोति । पश्चिमी सभ्यता और धर्म में रंगे हुए भी कहते हैं- ‘हृवाट एभर गाँड डज, डज फँर द गुड ।’ अर्थात् भगवान् जो करते हैं, अच्छे के लिए ही करते हैं । ऐसा दृढÞ विश्वास होने पर परमार्थ पथ का पथिक हर परिस्थिति की प्राप्ति में निश्चिंत रहता है, मजे में रहता है, मस्ती से जीता है ।
साधक जितना जानता है, उतना मान कर उसका पालन करना आरम्भ कर दे तो आगे की आवश्यक जानकारी स्वतः प्राप्त हो जाती है । यह भगवत्कृपा की महिमा है । लेकिन हम तो इन्द्रियों के वश में होकर वह काम भी कर लेते हैं, जिसको हम स्वयं ही बुरा समझते हैं । यही अपने ज्ञान का निरादर है । इसीलिए तो भगवान् व्यासदेव ने कहा है-
पुण्यस्य फलमिच्छन्ति पुण्यं नेच्छन्ति मानवाः ।
न पापफलमिच्छन्ति पापं कर्ुवन्ति यत्नतः ।।
अर्थात् पुण्य का फल -सुख) तो चाहते हैं, परन्तु पुण्य -पवित्र कर्म) करना नहीं चाहते । इसी प्रकर पाप का फल -दुःख) कोई नहीं चाहता परंतु यत्नपर्ूवक -नये-नये ढूढÞ कर) पाप करते हैं । इस समय जगत् के मानव-प्राणी की यही दशा है । घोर तमो गुण से उसकी बुुद्धि इतनी विपरीत हो गई है कि उसे पाप में ही पुण्य की झाँकी मिल रही है । भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में इसी तथ्य को इस तरह समझाया है-
अधर्मं धर्म मिति या मन्यते तमसावृता ।
र्सवाथान् विपरीताश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ।।
अर्जुन् ! जो तमोगुण से ढÞकी हर्ुइ बुद्धि अधर्म को धर्म मानती है, और सारी बातों को उलटा ही देखती है, वह बुद्धि तामसी है ।
जब तक भोगों की लालसा हृदय में भरी रहेगी, तब तक भगवान् को हृदय में स्थान कैसे मिलेगा – अतः पहले भोगों की कामना का त्याग करके भगवान् से मिलने की लालसा को प्रबल बनाना चाहिए । भोगों की प्राप्ति इच्छा से नहीं होती, ये तो कर्मफल के रुप में मिलते हैं और जैसे-जैसे मिलते हैं, इच्छा को बढÞाते रहते हैं । सुख भोग की इच्छा कभी भी पूरी नहीं हो सकती । इसलिए, इनकी इच्छा का त्याग करना ही श्रेष्ठ है । त्याग से तत्काल शान्ति प्राप्त होती है ।
जब तक हमारी तामसिक वुद्धि नहीं बदलेगी, जब तक हम पाप को पाप समझकर उसका परित्याग नहीं करेंगे, तब तक निश्चय जानिए कि दुःखों की मात्रा उतरोत्तर बढÞती ही जाएगी । फिर चाहे मोहवश हम उसे उन्नति-विकास, अभ्युदय या अन्य किसी गौरवप्रद नाम से पुकारें । असली सुख-शान्ति तो तब होगी, जब सारी विषय कामना को छोडÞकर हम श्री भगवान् का भजन करेंगे –
तब लगि कुशल न जीवकहँ, सपनेहुँ मन विश्राम ।
जब लगि भजत न राम कहँ, सोक धाम तजि काम ।।

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