परिवर्तन का संवाहक बनता पहिया

कञ्चना झा:अन्जना अधिकारी सुबह पाँच बजे उठ जाती है । घर में पति, दो बच्चे सभी को चाय नाश्ता देती हंै और तुरन्त तैयार होकर दोनों बच्चांे को स्कुटी पर बिठाकर स्कूल ले जाती है । घर से करीब चार किलोमीटर दूर बच्चांे के स्कूल से वापस आ कर खाना बनाना, खाना और फिर समय पर दफ्तर पहुँचना । दफ्तर से आते समय दुकान के लिए सामान, घर के लिए सब्जी लाना ये सब अन्जना की दैनिकी है । लेकिन इतना काम करके भी वह थकती नहीं । वह कहती हंै- स्कुटी नहीं होता तो इतना सारा काम संभव नहीं था । स्कुटी ने अन्जना के जीवन को सहज बना दिया है । स्कूटी के कारण ही वह दफ्तर में काम कर पायी है नहीं तो राजधानी की भीडÞ भाडÞ वाले सडÞक में चलने वाले सवारी साधन से समय पर पहुँचना तो -लोहे के चना चबाना ही है । लेकिन स्कुटी के कारण आज वह हर रोज लोहे के चने बडÞी आसानी से चबा रही है । mahila
सही ही कहा है किसी ने – हमें उडÞने को पंख नहीं चाहिए, बस हमारे पैरों की बेडिÞयाँ खोल दो । तो, लो खोल दी बेडिÞयाँ और दे दी स्कुटी अब दिखाओ क्या-क्या कर सकती हो तुम । आत्मविश्वास से भरी महिला जब काँधे पर बैग, सर पर हेल्मेट और आँखो में चश्मा लगाकर स्कुटी पर बैठती है तो ऐसा लगता है कि उसने सारी दुनिया अपनी मुठठी में कर ली । अन्जना ने भी कुछ ऐसा ही किया है, उसने भी सारी दुनिया को मुठ्ठी में कर लिया है ।
शहर की बात करें तो आज लगभग हर महिला के पास स्कुटी है । और जिनके पास नहीं है उन्होंने भी बहुत जल्द ही खरीदने की योजना बना रखी है । इतिहास की बात करें तो स्कुटी बहुत बाद में आया । सन १८९४ में हिल्डरब्रान्ड एन्ड उल्फमुलर ने पहली बार मोटरबाइक बनाया था । फिर बाद में रोयल इनफिल्ड, बर्मिङघम स्मल आर्म और फिर स्प्रीङ फिल्ड ने भी बाइक बनाना शुरु कर दिया । लेकिन उस समय बाइक का मतलब था पुरुषांे की सवारी साधन ।
वैसे तो महिलाओं ने भीे उन्नीसवीं शताब्दी से ही साइकल चलाना शुरु कर दिया था । लेकिन जब बात करेंगे मोटर बाइक की तो सन १९४१ में आस्ट्रेलिया से इसकी कहानी शुरु होती है । मेलबर्न शहर में जन्मी डोरथी रोबिन्सन ने जब पहली बार मोटर बाइक चलायी तो दुनिया स्तब्ध रह गई । कारण सपष्ट था क्योंकि तब तक बाइक को पुरुषों का साधन ही माना जाता था । और रोबिन्सन ने इसमें एक क्रान्ति ला दी । रोबिन्सन का कहना था कि आप महिला होकर भी बाइक चला सकतीं है, कोशिश तो कीजिए । उनका मानना था महिला सश्क्तिकरण के लिए समाज की दृष्टिकोण में परिवर्तन आवश्यक है और यह जिम्मेवारी स्वयं महिला को लेनी होगी । उन्हांेने महिलाओं को बाइक चलाने के लिए काफी प्रेरित भी किया । वह कहती थी जीवन में आगे बढने के लिए रफ्तार चाहिए और यह रफ्तार आपकोे बाइक देगी ।
लेकिन रोबिन्सन को समझने में दुनियावालों को बहुत समय लग गया । २० वीं शताब्दी में चीन, भारत, इन्डोनेसिया, थाइल्याण्ड, मलेशिया, वियतनाम जैसे देशों में तो महिला बेधडÞक बाइक कहें या स्कुटी चलाने लगी । मनन करने की एक बात यह भी है, कि इन राष्ट्रों की महिलाएँ देश के अर्थतन्त्र में अच्छा खासा योगदान दे रही है । वहाँ की महिला सवल हैं, सक्षम हैं और श्रोत साधन पर उन लोगों की पहुँच भी है । और वास्तव में कहा जाय तो सशक्तिकरण का अर्थ भी यही है । महिलाओं के लिए रोजगारी और आमदनी का श्रोत बढने का सबसे सशक्त औजार बन गया है स्कुटी । इसके माध्यम से वह आसानी से एक जगह से दूसरे जगह तक पहुँच जाती है ।
२१ वीं शताब्दी की महिलाओं को एक समय में कई भूमिका निर्वाह करनी पडÞती है । घर देखना, बच्चों का ध्यान रखना, आफिस जाना और बाजार से खरीद बिक्री करना । दो बच्चों की माँ गंगा धिताल कहती हंै – स्कुटी न होता तो मेरा जीवन इतना आसान नहीं होता । स्कुटी के कारण ही वह घर, अािफस, बच्चा और दुकान सबकुछ आसानी से चला पा रही हूँ ।
विकसित राष्ट्रों में मोेटर बाइक या स्कुटी को विलासिता की सवारी मानी जाती है । लेकिन नेपाल जैसे गरीब या विकाशसील राष्ट्र में यह तो आवश्यकता बन गयी है । लेकिन अभी भी स्कुटी का प्रयोग शहरी इलाके में ही देखने को मिलता है । वैसे तो नेपाल में भी बजाज का चेतक, लेजेन्ड, सुपर, प्रिया का स्कूटर का प्रयोग होता था, कई लोग पैडल वाला बाइक मोपेड चलाते थे । लेकिन यह भी पुरुषों तक ही सीमित थी । २१ वी शताब्दी के आरम्भ के साथ नेपाल में भी स्कुटी का प्रयोग शुरु हो गया । करीब १२ वर्षपहले जब नेपाली बाजार में टिभिएस ने स्कुटी लाया तो यह बहुत ज्यादा नही चली । यद्यपि महिलाओं ने इसको बडÞा सराहा । फिर हीरो होन्डा और बाद में यामहा ने तो स्कुटी की लोकप्रियता को आसमान पर पहँुचा दिया । बाजार की मांग देखकर इन कम्पनिओं ने सेल्फ स्र्टार्ट, लाइट वेट और रंग विरंग स्मार्ट स्कुटी बनना शुरु कर दिया और आज इसने राजधानी के सडÞक का लगभग एक चौथाई हिस्सा अपने कब्जे में कर लिया है ।
काठमान्डूु स्थित यामहा के शो रुम इन्चार्ज अनुज खडÞकी का कहना है- आज की महिला तो नौकरी पक्का हो जाने के बाद सबसे पहले स्कुटी ही खरीदती हंै । शो रुम में आये महिला ग्राहक की बातचीत सुनाते हए अनुज आगे कहते हंै – आज महिला चाहती है कि उनकी अपनी सवारी साधन हो ताकि वह समय पर हर जगह पहुँच सके । और स्कुटी उन्हंे स्वतन्त्रता के साथ-साथ सुरक्षा भी देती है ।
होन्डा में कार्यरत प्रसन्ना के अनुसार अभी तो लगभग ३५ हजार होन्डा की स्कुटी बिक्री हो रही है नेपाल में । विशेष कर १८ से ३५ वर्षआयु की आफीस जाने वाली महिला, युवा पीढÞी की क्याम्पस जानेवाली लडकियाँ स्कुटी खरीद रही है । इसके अलावा शौक से स्कुटी चलाने वालों की संख्या बढÞ रही है । अब धीरे-धीरे तो जिस घर में महिला है उस घर में स्कुटी होने लगी है ।
सुजुकी में कार्यरत प्रमिला खत्री का मानना है महिला अब खुद कमाने लगी है और वह अपने हिसाब से रहना चाहती है । स्कुटी उन्हंे स्वतन्त्रता देता है, कहीं जा सकती है, कभी भी जा सकती है । उनके शो रुम में स्कुटी खरिदने वाली अधिकांश महिला यही कहती है कि वह आत्म निर्भर बनने के लिए स्कुटी खरीद रही है । स्कुटी के कारण अब वह सुरक्षित यात्रा कर सकती है ।
वास्तव में देखा जाय तो महिलाओं की सबसे बडÞी समस्या रहती है सुरक्षित यात्रा करना । राजधानी काठमांडू की बात करें तो यहाँ की र्सार्वजनिक सवारी साधन महिला मैत्री नहीं है । कुछ महीने पहले विश्व बैंक और आस्ट्रेलियन एड ने मिलकर एक अध्ययन किया था । उस अध्ययन के प्रतिवेदन ने तो राजधानी की धज्जी उडÞा दी थी, कितने असभ्य हैं यहाँ के लोग । अध्ययन प्रतिवेदन कहता है कि राजधानी के र्सार्वजनिक सवारी साधन में यात्रा करने वाली चार में से एक महिला यौन शोषण का शिकार होती है । प्रतिवेदन में कहा गया है- १२ से ३५ उम्र की अधिकांश महिला इनएपो्रप्रिएट टचिङ का शिकार बनती है । र्सर्वेक्षण में सहभागी में से ४३ प्रतिशत महिलाओं ने स्वीकार किया है कि इनएपो्रप्रिएट टचिङ की पीडÞा को उन्होंने महसूस किया है । इसके अलावा अत्याधिक भीडÞ, पाकेटमारी, छीना झपटी, कपडÞे गन्दा हो जाना या फट जाना, ड्राइभर कन्डक्टर या यात्री की मुँह से अपशब्द सुनना और मनचलों की फब्ती र्सार्वजनिक सवारी साधन की नियति बन चुकी है । । शायद इसलिए बन्दना सिंह के पास उच्च शिक्षा होते हुए भी वह नौकरी नहीं करती । राजधानी के र्सार्वजनिक सवारी साधन में यात्रा करना बन्दना को सहज नहीं । किसी से मिलना या कहीं जाना है तो एक सप्ताह इन्तजार करती है । शनिबार को बन्दना के पति की छुट्टी रहती है तो उसी दिन वह सभी काम करती है, मिलना- जुलना, सामान खरीदना । वह कहती है- बहुत जल्द ही मै स्कुटी खरीदने वाली हूँ और उसके बाद नौकरी करूँगी । बात सिर्फबन्दना की ही नहीं बहुत महिला इसलिए घर से बाहर नहीं निकलती हैं क्योंकि र्सार्वजनिक सवारी साधन में होने वाली परेशानी वह सहन नहीं कर सकती है, वह असुरक्षित महसूस करती है ।
लेकिन देखा जाय तो आज की महिला में एक ललक है, आगे बढÞने की और वह भी किसी एक क्षेत्र में नहीं, हर क्षेत्र में वह अपने आप को स्थापित करना चाहती है कुछ करिश्मा कर दिखाना चाहती है । फिर चाहे वह घर हो या आफिस या हो सडÞक । वह हर जगह प्रतिस्पर्धा करना चाहती है और महिलाओं की इस आकांक्षा को पूरा कर रहा है दो पहिया वाला स्कुटी । सच मायने में देखा जाय तो जो रफ्तार स्कुटी ने महिलाओं को दी है वह उसे और भी मजबूत बना रहा है ।

सशक्तिकरण का औजार है स्कुटी
मैं हीरो होण्डा के प्लेजर ब्रान्ड का स्कुटी चलाती हूँ । वैसे तो राजधानी में र्सार्वजनिक यातायात की सुविधा है लेकिन मैं स्कुटी को ही प्राथमिकता देती हूँ । स्कुटी समय की बचत तो करता ही है और साथ ही इसने जीवन को सहज , सरल भी बना दिया है । र्सार्वजनिक यातायात में बहुत ज्यादा भीडÞभाडÞ होती है, और हर रोज हरासमेन्ट सहना पडÞता है , लेकिन स्कुटी के कारण मुझे यह समस्या नहीं । अभी तो मैं टेलिभिजन के काम के साथ-साथ पढर्Þाई भी कर रही हूँ । और स्कुटी के कारण ही इन दोनों को निरन्तरता दे पा रही हूँ । बस से जायें तो घन्टांे लग जाते हैं लेकिन स्कुटी से चन्द मिनटों मंे ही मंै एक जगह से दूसरी जगह पहुँच जाती हूँ । मुझे लगता है कि- स्कुटी ने तो एक क्रान्ति ला दी है , खास कर महिलाओं को इसने स्वतन्त्र बनाया है । और स्कुटी प्रयोग करने वाली महिलाओं को समाज भी आत्मविश्वासी, निडर, सक्षम महिला के रूप में लेते हैं । -रोजिता क“डेल, न्यूज रिडर
एभिन्यूज टेलिभिजन

मैं होण्डा का डिओ चलाती हूँ । स्कुटी ने तो मेरी जिंदगी ही बदल दी कार्यालय, दुकान, घर और बच्चो के स्कूल से मैं तंग आ चुकी थी । र्सार्वजनिक यातायात का प्रयोग करती थी । एक तो पैसा बहुत खर्च होता था दूसरा बहुत थक जाती थी । कोई भी काम समय पर नहीं होता था । लेकिन अब मैं बहुत सुकून महसूस करती हूँ । स्कुटी होने के कारण सभी जगह समय पर पहुँच जाती हूँ , ज्यादा झिकझिक नहीं करना पडÞती है । मेरा मानना है कि महिला सशक्तिकरण अभियान में स्कुटी बहुत बडÞी भूमिका निर्वाह कर रही है । इससे महिलाओं में आत्म विश्वास बढÞा है, अब कहीं जाने के लिए वह दूसरे पर मोहताज नहीं । स्कुटी ना होता तो शायद मेरी जिन्दगी इतनी आसान नहीं होती । – गंगा धिताल, कर्मचारी

मैं होण्डा का डिओ स्कुटी चलातीं हुँ । र्सार्वजनिक यातायात कभी भी समय में गन्तब्य पर नहीं पहुँचाती है । एक तो बहुत लेट से आती है और दूसरी भीडÞ बहुत रहती है । काफी दिक्कत होती है यात्रियों को और अगर बात करें महिला यात्री की तो उसकी पीडÞा का तो वर्ण्र्ााही नहीं किया जा सकता है । लेकिन अभी तो मैं स्कुटी की आदी हो चुकी हूँ और इसने मेरे जीवन को फास्ट बना दिया है । मुझे याद है जब मैने पहली बार स्कुटी चलाया था तो ऐसा लगा की मंैने स्वतन्त्रा पा ली । मुझे लगा कि अब छोटे छोटे कामों के लिए मुझे किसी का मोहताज नहीं होना पडÞेगा । और वास्तव में देखा जाय तो यही है महिला सशक्तिकरण । आपको क्या करना है इस बात का निर्ण्र्ााआप स्वंय लंे किसी दूसरे पर मोहताज न हों और सशक्तिकरण की परिभाषा भी यही है । निसन्देह स्कुटी ने महिला की सशक्तिकरण के अभियान में बहुत महत्वपर्ूण्ा भूमिका निर्वाह किया है । हाँ, कभी-कभी एक बात तो अवश्य खलती है कि जब मैं पैदल या र्सार्वजनिक यातायात का प्रयोग करती थी तब बहुत सारे दोस्त थे लेकिन स्कुटी होने के कारण काम खत्म और स्कुटी पर सवार होकर नौ दो ग्यारह । तो वास्तव में दोस्त कम हो गये । -नम्रता बानिया“, प्रोग्राम प्रेजेन्टर

मै महिन्द्रा का डुरो चलाती हूँ । अभी मैं कालेज में पढÞ रही हूँ जहाँ सबसे अहम बात होती है समय पर क्लास में पहुँचना । जब तक मेरे पास स्कुटी नहीं थी, मंै र्सार्वजनिक बस का ही प्रयोग करती थी , हर रोज लेट हो जाती थी और कालेज प्रशासन की बात सुनना मेरी नियति ही बन चुकी थी । बस में सीट नहीं मिलती थी और कालेज पहुँचते-पहुँचते इतनी थक जाती थी कि पढर्Þाई में मन ही नहीं लगता था । अभी मेरे पास स्कुटी है और इससे मुझे गर्व भी महसूस होता है । इसने मेरे काम करने की क्षमता को दोगुना बढÞा दिया है । और जब मैं स्कुटी चलाती हूँ तब मैं एडभेन्चरस महसूस करती हूँ । अब मुझे पिताजी, भैया या भाई को कहीं पहुँचा दो कहने की जरुरत नहीं पडती । सबसे बडÞी खुशी भी यही कि मुझे कहीं जाने-आने के लिए किसी पर निर्भर नहीं होना पडÞता । शायद यही सशक्तिकरण की पहली सीढÞी है । मेरा पास भी क्षमता है, मैं भी आम लोगों की तरह सडÞक पर गाडÞी चला सकती हूँ , यही भावना मुझे कम्पीटेन्ट बना रही है । – कुन्साङ पाल्मो, विद्यार्थी

मै होण्डा का डिओ चलाती हूँ । र्सार्वजनिक सवारी साधन से कहीं जायें तो कभी समय पर नहीं पहुँचती । दूसरी बात काडमान्डू की र्सार्वजनिक सवारी साधन महिला के लिए सुरक्षित भी नहीं है । महिलाओं को शारीरिक और मानसिक रुप सें यातना सहन करनी पडÞती है । यात्री और कण्डक्टर का व्यवहार भी ठीक नहीं । जब से मैनें स्कुटी लिया जीवन आसान हो गया, अब मुझे बस में धक्के नहीं खाने पडÞते ,कहीं जाने के लिए किसी की खुशामद नहीं करनी पडÞती, ना ही धूप का खतरा और सबसे बडÞी बात जो है वो है – आत्मविश्वास । स्कुटी ने मुझे इतना आत्म विश्वास दिया है कि मुझे लगता है मंै सारे विश्व को जीत सकती हूँ । और मेरे हिसाब से सशक्तिकरण की पहली सीढÞी भी यही है कि आप आत्मनिर्भर बनें । वास्तव में स्कुटी चलाना नन्हे मुन्ने का खेल भी नहीं । इसके लिए साहस होनी चाहिए, जल्द निर्ण्र्ाालेने की क्षमता , संयम और अनुशासन भी अनिवार्य है । मै तो कहती हूँ कि अगर हमें महिला को सही मामलों में सशक्तिकरण करना है- तो उसे स्कुटी दे ही देना चाहिए । -अभिलाषा सिंह लिम्बु शिक्षिका

मंै टिभीएस स्कुटी चलाती हूँ । इससे मुझे समय की बचत होती है और कहीं छोटी सी जगह में भी पार्क कर सकती हूँ । काठमान्डू की अवैज्ञानिक बस रूट सिर्फसमय ही नहीं बल्कि मंहगी भी पडÞती है । इसलिए पैसा के हिसाब से स्कुटी मुझे किफायती लगती है । खुली हवा में ड्राइभ करना मुझे बहुत भाता है और मंजिल भी नजदीक दिखती रहती है । आराम और आत्मविश्वास महसूस होने के कारण अब स्कुटी जीवन का अभिन्न अंग ही बन चुकी है । इसने मेरी जिन्दगी ही परिवर्तन कर दी है । कई जगहों पर आना-जाना पडÞता है और स्कुटी के कारण ही यह संभव हो पाया है । परोक्ष रुप से देंखे तो महिला सशक्तिकरण में भी स्कुटी की बहुत बडÞी भुमिका है क्योंकि इसने महिलाओं में आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास बढÞाया है । हम अपना नेतृत्व स्वयं कर रहे है, भीडÞभाडÞ वाली सडÞक पर जब मैं स्कुटी चलाती हूँ तो मुझे लगता है- मै भी सक्षम हूँ मेरी भी अपनी छवि है । और एक शब्द में कहें तो स्कुटी ने मेरे जीवन को खुशनुमा बना दिया है । -रीता लिम्बु, प्रोग्राम प्रोड्युसर

मै हीरो होन्डा का प्लेजर चढती हूँ । राजधानी की र्सार्वजनिक सवारी साधन की बात करें तो भीडÞभाडÞ, फिर ट्रैफिक जाम । समय पर कहीं पहुँचना असम्भव हो जाता है । वैसे भी मैं मीडिया से जुडÞी हूँ , दिनभर दौडÞधूप होती है । ऐसे में अपनी सवारी साधन नहीं हो तो कोई काम संभव नहीं । और दूसरी बात मुझे शौक भी है स्कुटी चलाने की । जब में स्कुटी चलाती हूँ तो मुझे बडÞा मजा आता है, बहुत सारा प्लान तो मैं स्कुटी पर ही बनाती हूँ । फिर इसका मतलब ये नहीं कि मैं ट्राफिक रूल को फाँलो नहीं करती । वास्तव में कहा जाय तो स्कुटी ने मुझे स्मार्ट बनाया है । इसने सक्षम, प्रतिस्पर्धी के साथ साथ आत्मबल बढÞा दिया है । परोक्ष रुप से कहें तो इसने मुझे सशक्त बना दिया है । -तुलसा बस्नेत, सञ्चारकर्मी

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