परिवर्तन के संवाहक दिनकर

Ramesh Jha

रमेश झा

हिन्दी साहित्य का सूर्य रामधारी सिंह दिनकर की लेखनी अहर्निश गतिमान सूर्य की तरह उन सामान्य जनों को समझाने, उसमें ओज भरने तथा सामान्य से सामान्य जनों का प्रतिनिधित्व करती हुई आगे बढ़ी और चेतना का ज्वार जगाती रही । जिस प्रकार निशारूपी तिमिर को चीरती हुई भास्वर सूर्य अपनी पहली किरण से ही प्राणी मात्र में चेतना का संचार करता ।

सूर्य रामधारी सिंह दिनकर

सूर्य रामधारी सिंह दिनकर

गीता में भगवान कृष्ण जिस तरह अर्जुन से कहते हैं कि जब–जब धरा पर धर्म की हानि होती है, तब–तब धर्म रक्षार्थ मैं धराधाम पर अवतार लेता हूँ । उसी प्रकार जब–जब समाज–राष्ट्र में विषमता व्याप्त होती है, तब–तब प्रकृति समाज में किसी न किसी महान विभूति का प्राकट्य करती है और उन्हीं विभूति के द्वारा समाज–राष्ट्र में चैतन्यता जगाने लोगों में स्फूर्ति भरने का काम करती है । बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक काल में भारत भी सामाजिक आर्थिक, धार्मिक प्रशासनिक आदि कठिनाइयों से त्रस्त था । उसी समय परिवर्तन के सम्वाहक रामधारी सिंह दिनकर का जन्म बिहार के बेगुसराय जिला स्थित सिमरिया ग्राम में २३ सितम्बर १९०८ ई. में हुआ ।
दिनकर की आरम्भिक शिक्षा गाँव में ही हुई । पटना विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे हाईस्कूल में शिक्षक के रूप में कार्यरत रहे । १९३४ से १९४९ ई. तक बिहार सरकार की सेवा में सब–रजिष्ट्रार के रूप में तथा प्रचार–विभाग के उपनिदेशक पदों पर काम किया । १९५० से १९५२ ई. तक मुजफ्रपुर के लंगटसिंह महाविद्यालय में हिन्दी विषय के अध्यापक रहे, वे भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी रहे । इसके उपरान्त भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार हुए । तीन–तीन बार राज्य सभा के सांसद बने । दिनकर जी को पद्मभूषण की उपाधि से सम्मानित किया । उनके द्वारा लिखित ‘संस्कृति के चार अध्याय’ नामक कृति को साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया तो ‘उर्वशी’ कृति के लिए भारती ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया ।
हिन्दी साहित्याकाश में देदीप्यमान ओजस्वी कवि दिनकर ने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ नामक एक ऐसा ऐतिहासिक पुस्तक लिख कर आयातीत इतिहास के कपोलकल्पित यथार्थवादी सोच को खण्डन करने का साहस दिखाया, । स्वाधीन भारत की स्वाधीन जनता को उनकी अपनी आर्य सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से अवगत कराना दिनकर का मुख्य उद्देश्य था ।
‘संस्कृति के चार अध्याय’ की प्रस्तावना में पंडित नेहरु ने लिखा है– भारत में संस्कृति के सबसे प्रबल उपकरण आर्यों और आर्यों से पहले भारतवासियों खासकर, द्रविड़ों के मिलन से उत्पन्न हुए । इस मिलन मिश्रण या समन्वय से एक बहुत बड़ी संस्कृति उत्पन्न हुई, जिसका प्रतिनिधित्व हमारी प्राचीन भाषा संस्कृत करती है … । दिनकर ने इस ग्रन्थ के माध्यम से केवल मनगढ़न्त ऐतिहासिक धरातल को धराशायी करने का साहस ही नहीं दिखाया, अपितु अपने अन्य दूसरी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्र प्रेम तथा समाज में क्रान्तिपूर्ण चेतना की प्रेरणा जगाने वाली ओजपूर्ण कविताओं का प्रणयन किया । दिनकर जीवन–पर्यन्त राष्ट्र के हित चिन्तन तथा उत्पीडि़त, शोषित, दलित को उठाने में अपना जीवन समर्पित किया । दिनकर समाज में अहिंसा, क्षमा के ही नहीं अपितु उन्हें सशक्त बनाने और सबल सक्षम बनाने के पक्षपाती थे–
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन, विषहीन विनीत सरल हो
सच पूछो तो शर में ही वसती है दीप्ति विनय की
संधि वचन सम्पूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की
सहनशीलता, दया, क्षमा को तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है

हिन्दी साहित्य में गद्य–पद्य दोनों क्षेत्रों में समान रुप से महारत प्राप्त कवि दिनकर जैसे विरले ही दिखाई देते हैं । आधुनिक हिन्दी के महान और प्रमुख लेखक होने के साथ–साथ ओज के सर्वश्रेष्ठ कवि है । स्वाधीन भारत की स्वाधीन जनता की अन्तश्चेतना को झकझोरने और राष्ट्रीयता के पक्षपाती राष्ट्र कवि दिनकर गद्य–पद्य के रूप में अहर्निश साहित्य साधना करते रहे । इनके द्वारा रचित कविताओं को पढ़ने से पाठक गण में स्वतःस्फूर्ति का संचार होने लगता है । भारत जब २६ जनवरी १९५० में संवैधानिक गणतान्त्रिक देश बना तो दिनकर जी हुंकार करते हुए शासन सत्ता को ललकारा–सिंहासन खाली करो जनता आती है । इस पंक्ति ने जनपक्षीय भावना को अपनी ओर इस प्रकार आकृष्ट किया कि वह हरेक राजनीतिक आन्दोलन का जयघोष बन गई । आपातकाल के विरोधी आन्दोलन को इस पंक्ति ने ऊर्जा भरने का कम किया । जनजन की जिह्वा से स्वतःस्पूmर्त रूप में निकलने लगी–

हुँकारों से महलों की नींव उखड़ जाती
सांसो के बल से ताज हवा में उड़ता है
जनता की रोके राह समय में ताब कहाँ
वह जिधर चाहती काल उधर ही मुड़ता है ।
सबसे निरा जनतन्त्र जगत का आ पहुँचा
तैंतिस कोटि हित सिंहासन तैयार करो
अभिषेक आज राजा का नहीं प्रजा का है
तैंतिस कोटि जनता के सर पर मुकुट धरो
फावड़े और हल राजदण्ड बनने का हैं
धूसरता सोने से श्रृंगार सजती है
दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो
सिंहासन खालीकरो कि जनता आती है ।

स्वयं दिनकर का कथन है कि राजनीति साहित्य की चेरी होती है । दिनकर का हमेशा भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के साथ निकट का सम्बन्ध रहा । परन्तु वे कभी सत्तारूपी सिंहासन से चिपके नहीं । राजसत्ता की इच्छा से अधिक जनपक्षीय आकांक्षाओं से जुडेÞ रहे । इसीलिए तो राष्ट्रकवि दिनकर जनता की समस्या को बेवाक उठाते है । सरकार के प्रति व्याप्त जनता के असन्तोष को ऐसे व्यक्त करते हैं–
सदियों को बुझी ठंडी राख सुगबुगा उठी
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है
उठो समय के साथ को घर्घर नाद सुनो
सिंहासन करो खाली के जनता आती है ।
शासकीय सेवा में रहकर भी कवि दिनकर कभी राजनीतिक दबाव बिना निरन्तर सामाजिक समस्याओं को आधार बनाते हुए उत्कृष्ट रचना करते रहे । उनकी साहित्यिक चेतना हमेशा राजनीति और राजनेताओं से निर्लिप्त रही । इसी कारण तो उनके साहित्य में निर्भीकता का दिग्दर्शन होता है । अभाव में ग्रस्त शोषित, पीडि़त जनता की पीड़ा से दुखी रहते थे । किसानों की पीड़ा को दर्शाते हुए दिल्ली के सिंहासन पर आसीन तत्कालीन राजनेताओं और उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों में व्याप्त दुष्प्रवृत्तियों को तार–तार करते लिखते हैं –
रेशमी कलम से भाग्य लिखने वाले
तुम भी अभाव से कभी ग्रस्त हो रोए हो
बीमार किसी बच्चे की दवा जुटाने में
तुम भी क्या घर–भर पेट बाँधकर सोए हो
चल रहे कुँजो में पछिया के झकोर
दिल्ली लेकिन ले रही लहर पुरवाई में
है विकल देश सारा अभाव के तापों में
दिल्ली सुख से सोयी है नर्म रजाई में
तो होश करो दिल्ली के देवों होश करो
सब दिन तो मोहनी न चलने वाली है
……………………………………..
फिर नए गरुड़ उड़ने को पांखे तोल रहे
फिर झपट झेलनी होगी नूतन बाजों की
राष्ट्रवाद की चिन्ता से आहत दिनकर का अन्तर्मन एकाएक अजेय हो भारत की सुरक्षा हेतु अडिग खड़ा हिमालय से पुकार लगाते हैं । दिनकर का अन्तर्हृदय एक ओर राष्ट्र की चिन्ता से चिन्तित तो है पर दूसरी ओर आशाओं की किरण उषाकालीन प्रातः बेला की ओर अग्रसर होने का संदेश देती है–
मेरे नगपति ! मेरे विशाल ।
ओ, मौन, तपस्या लीन यति । पल भर को तो कर दृगुन्मेष
रे ज्वालाओं से दग्ध, विकल है तड़प रहा पद पर स्वदेश
सुखसिन्धु, पंचनद, ब्रह्मपुत्र, गंगा, यमुना की अमितधार
जिस पुण्यभूमि की ओर वही तेरी विगलित करुणा उदार
जिसके द्वारों पर खडा क्रान्त सीमापति तूने की पुकार
पद–दलित इसे करना पीछे पहले ले मेरा सिर उतार
उस पुण्यभूमि पर आज तपी रे आन पड़ा संकट कराल
व्याकुल तेरे सुत तड़प रहे डंस रहे चतुर्दिक विविध व्याल
मेरे नगपति ! मेरे विशाल
कितनी मणियाँ लुट गई ? मिटा कितना मेरा वैभव अशेष
तू ध्यान मग्न ही रहा, इधर वीरान हुआ प्यारा स्वदेश
वैशाली के अवशेष से पूछ लिच्छवी–शान कहाँ
ओ री उदास गण्डकी ! बता विद्यापति कवि के गान कहाँ
………………………………………………………….
तू शैलराट हुँकार भरे फट जाए कहा, भागे प्रमाद
तु मौन त्याग, कर सिंहनाद रे तपी आज तप का न काल
नवयुग शंखध्वनि जगा रही तू जाग, जाग, मेरे विशाल
वर्षों से परतन्त्रता की बेड़ी में जकड़ी, तड़पती शोषित होती भारत की जनता १९४७ ईं में जब स्वाधीनता की सांस ली भारतभूमि आजाद हुई, तब दिनकर ने भारत माता के युवा सपूतों में जोश बढ़ाते, आत्मविश्वास जगाते हुए विषमताओं के प्रति आत्मविश्वास जगाते हुए लड़ने को प्रेरित करते हैं –
अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का
सारी रात चले तुम दुःख झेलते कुलिश निर्मम का
एक खेप शेष है किसी विध उसे पार कर जाओ
वह देखो उस पार चकता मन्दिर प्रियतम का
आकर इतने पास फिरे वह सच्चा वीर नहीं है
थक कर बैठे गए क्या भाई मंजिल दूर नहीं है
भारत की जनता में व्याप्त अकर्मण्यता और घोर नैराश्य को देखते हुए कवि दिनकर को कर्म–योग का सन्देश देने वाली गीता के उपदेशों की ओर जनता को आकृष्ट करते हुए कर्म–योगी बनने की प्रेरणा देते कहते हैं–
वैराग्य छोड़ बाहों की विभाग संभालो
चट्टानों की छाती से दूध निकालो
है रुकी जहाँ भी धार शिलाएँ तोड़ो
पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो
चढ़ तुंग शैल शिखरों पर सोम पियो रे
योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे
दिनकर का काव्य हमेशा दलित, शोषित, प्रताडि़त जनता का प्रतिनिधित्व करती भावनाएँ उजागर करती है, किसी भी रचना का उद्देश्य ही होता है, समाज में व्याप्त हो रहे विषमता, अन्याय, दुराचार, शोषणकार्य को उद्भाषित करना और सामाजिकजनों को उद्वेलित करना । दिनकर ने यही किया है । उन्होंने रुढि़वादी जाति व्यवस्था पर ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ काव्य में करारा प्रहार करते हुए लिखा है–
घातक है, जो देवता–सदृश दिखता है
लेकिन कमरे में गलत हुक्म लिखता है,
जिस पापी को गुण नहीं, गोत्र प्यारा है
समझों उसने ही हमें यहाँ मारा है ।
‘रश्मिरथी’ रचना में जातिवादी व्यवस्था पर व्यंग्य करते हुए दिनकर ने कुछ यों लिखा है –
जाति–जाति रटते जिनकी पूँजी केवल पाखंड,
मैं क्या जानु जाति–जाति हैं, ये मेरे भुजदण्ड ।
कवि दिनकर की छोटी–बड़ी कृतियाँ लगभग बीस हैं । हरेक रचना अपनी रचनाधर्मिता को निर्वाह करती हुई सामान्य जनों को समझाने, जगाने, उठाने का काम की । इसलिए तो वे जनजन के लिए राष्ट्रकवि बन गए । लेखनी की ओजस्विता, निर्भीकता तथा तेजस्विता के कारण ही साहित्य के सर्वश्रेष्ठ सिंहासन पर भास्वर रूप में आरुढ़ हैं । पुरखों से विरासत में प्राप्त साहित्यिक विशेषता को दर्शाते हुए दिनकर कहते हैं –
मत्र्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं
उर्वशी, अपने समय का सूर्य हूँ मैं ।

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