पर्नर्वहाली की औचित्यहीन मांग

श्रीमन नारायण

या खुदा यह क्या माजरा है !
हम उनसे वफा की उम्मीद करते है
जिन्हें मालूम नहीं बफा क्या है !!
नेपाल की वर्तमान राजनीति की भी यही अवस्था है। संविधानसभा के जरिए संविधान बने, यह चाहत नेपाली जनता की वर्षों पुरानी है। सवा चार वर्षपर्ूव संविधानसभा का चुनाव हुआ था। एक दशक तक सशस्त्र संर्घष्ा करनेवाले माओवादी पार्टर्ीीो चुनाव में अधिक सफलता मिली। नेपाल जैसे छोटे देश में ६०१ सदस्यीय विशालकाय संविधानसभा बनाया गया। सबसे बडÞी पार्टर्ीीोने के नाते माओवादियों से यह अपेक्षा थी कि कम से कम वे संविधान निर्माण में मददगार साबित होंगे। परन्तु देश के अन्य दो बडÞेÞ दल नेपाली कांग्रेस एवं एमाले के सदृश यह भी उंचा नाम फिकी पकवान ही साबित हुआ। संविधानसभा के निर्धारित दो वर्षके कार्यकाल में संविधान नहीं बन सका। कहा यह गया कि संविधान निर्माण का नब्बे फिसदी काम हो चुका है, लिहाजा एक वर्षके लिए इसके कार्यकाल के लम्बा कर दिया जाए फिर क्या था, खूद ही दुल्हा और खूद ही बाराती की भूमिका में सहभागी सभासदों ने एक वर्षके लिए संविधानसभा का समय और बढÞÞा दिया। फिर भी संविधान नहीं बन पाए। कहा गया कि संविधान निर्माण का ८५ फिसदी काम हो चुका है। लिहाजा इसके अवधि को फिर तीन महीने के लिए बढÞÞाया गया।
इस पर चुटकी लेते हुए एक दिग्गज नेपाली राजनीतिज्ञ ने कहा भी कि जब पौने दो सौ प्रतिशत काम हो चुका है तो इसके अवधि को क्यों बढÞÞाया जाए – दूसरी बार तीन महीने के लिए बढÞÞाया गया। पिछले साल के अगस्त के अन्त में तीन महीने के लिए फिर इसका कार्यकाल बढÞÞाया गया। चौथी बार पिछले नोभेम्बर के अन्त में ६ माह के लिए कार्यकाल बढÞÞाया गया। इस तरह दो साल के बदले चार साल का समय मिला फिर भी संविधान नहीं बन सका। सर्वोच्च अदालत के कठोर रुख के कारण पांचवी बार इसका कार्यकाल नहीं बढÞÞाया जा सका। नेपाली कांग्रेस एवं एमाले के नेता अभी भी चाहते हैं कि संविधानसभा को फिर से जीवित किया जाए और संविधान निर्माण का बाँकी काम पूरा कर लिया जाए। जबकि देश के प्रधानमन्त्री डा. बाबुराम भट्टर्राई की नेतृत्ववाली एकीकृत माओवादी-मधेशी मोर्चा साझा सरकार ने २७ मई को ही संविधानसभा का विघटन कर नये चुनाव हेतु २७ नोभेम्बर का तारिख भी तय कर दिया है। राष्ट्रपति कार्यालय से मुहर लगते ही चुनावी प्रक्रिया तत्काल शुरु हो जाऐगी। एमाले एवं कांग्रेस के नेता राष्ट्रपति कार्यालय में गणेश परिक्रमा कर रहे हैं, वे चाहते हैं कि राष्ट्रपति सिर्फउनकी ही सुनें और मृत संविधानसभा को जिन्दा कर दें ताकि कुछ दिनों के लिए ये दल भी सत्ता सुख हासिल कर सकें।
संविधान सभा के चार वर्षके कार्यकाल में इसकी साख जाती रही। कथित संविधान लेखन पन्ध्र-बीस नेताओं के लिए बन्द कमरें का प्रयोगशाला बन गया। इसकी पर्ुनर्बहाली की जीद पर अडÞेÞ पर्ूव सभासदों को अपनी बदनामी का शायद अहसास नहीं है, जो सदस्य इसकी गरिमा को बरकरार नहीं रख सके, जिन्होंने इसके महत्व को नहीं समझा बडÞी बेशर्मी से वही लोग इसकी पर्ुनर्बहाली चाहते हैं।
जब संवैधानिक समिति को पर्ूण्ा मस्यौदा तयार करने का जिम्मा दिया गया, विवाद समाधान उप समिति को दिया गया, फिर हात्तीवन, गोकर्ण्र्ााौर गोदावरी के होटलों में कुछ नेता विशेष के हवाले इसे कर दिया गया और समाधान वहीं ढूंढÞा जाने लगा। उस समय कहाँ थे ये सभासद – जब जनता में जाने की बात आयी, तब पर्ूण्ा कटौती प्रस्ताव आया और उस में सभी ने अपनी सहमति जतायी थी। इन सभासदों ने अपना अधिकार, विवेक कुछ समिति के लोगों के हवालें ही नहीं किया, अपितु जनता के लोकतान्त्रिक अधिकार के बारे में भी इन्होंने नहीं सोचा। गान्धारी की भाँति आँख में पट्टी बाँधकर चुपचाप र्समर्थन करने बाद अब पश्चाताप क्यों कर रहे हैं –
इतना जानते हुए कि प्रत्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपति होने से हमेशा टकराव बना रहता है, फिर भी इसे मान लिया गया। समानुपातिक कोटे से ४५ प्रतिशत निर्वाचित, सर्वोच्च अदालत को चुनौती देने वाला संवैधानिक अदालत का गठन, नेपाल जैसे छोटे देश में ग्यारह प्रदेश का प्रस्ताव आदि विषय में बन्द कमरें में कुछ नेताओं ने निर्ण्र्ाालिया और बाँकी सभी ने र्समर्थन किया। अपरादर्शी और अविश्वसनीय संविधानसभा को फिर से जिन्दा करने का क्या मतलब – लोकतन्त्र पर विश्वास रखनेवालों को जनता में जाना चाहिए। वैसे भी दो वर्षके लिए ही चुनाव हुआ था गलत तरीके से चार वर्षका किया गया। चार वर्षमें भी सफल नहीं होने के कारण जनता में जाना ही एक मात्र समाधान हो सकता है। वैसे भी जिस निर्वाचित निकाय का कार्यकाल स्वाभाविक रुप में समाप्त हो चुका हो, उसकी पर्ुनर्बहाली क्यों –
अगर पर्ुनर्बहाली हो भी जाए तो सहमति बन ही पाएगी, इसकी गारन्टी कौन देगा – क्या मधेशवादी दल जातीय संघीयता छोडÞ सकते हैं – पर्ूव-पश्चिम के बजाय उत्तर-दक्षिण संरचना मधेशवादी एवं जनजाति नेताओं को स्वीकार्य होगा – नेपाली भाषी ब्राहृमण-क्षेत्रियों की बर्चस्ववाली एमाले एवं कांग्रेस पार्टर्ीीे नेता वैसी संघीयता स्वीकार करेंगे – जिस में मधेशी और जनजाति खुद को विजेता महसूस करेगा – कदापि नहीं। महज प्रधानमन्त्री के निर्वाचन में सहमति नहीं होने के कारण झलनाथ खनाल एवं रामचन्द्र पौडÞेल को १८ बार दो-दो हाथ करना पडÞा था। प्रतिस्पर्धात्मक बहुदलीय प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में सहमति कुछ खास मुद्दों पर ही सम्भव हो सकता है। सैद्धान्तिक मसलों पर तो कतई नहीं। पर्ुनर्बहाली से भी अगर समस्या का निदान नहीं हुआ तो क्या फिर संविधानसभा के चुनाव नहीं कराने होंगे –
चार वर्षपर्ूव देश में जितने दल थे, उन में से अधिकांश विभाजित होकर विभिन्न टुकडÞो में बट गए। नई शक्तियाँ स्थापित हर्ुइ हैं। माओवादी पार्टर्ीीें भी बहुत बडÞा विभाजन हुआ है। अगर मातृका यादव की बात करें तो माओवादी का तीसरा धार मोहन वैद्य खेमा है। मधेशवादी दलों का विखराव तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। एमाले एवं नेपाली कांग्रेस से जनता नाखुश है। चुनाव में ही वे तौल लिए जाएंगे। राजावादी दल कमल थापा के नेतृत्ववाली राप्रपा नेपाल पिछले चार साल में काफी सक्रिय दिखा। राजेन्द्र महतो के नेतृत्ववाली सद्भावना पार्टर्ीीे पहाडÞ के करीब तीन दर्जन से अधिक जिलों में अपने संगठन का विस्तार किया है।
पर्ुनबहाली क्यों – पर्ुनर्बहाली की माँग करनेवाले खुद स्पष्ट नहीं है कि वे ऐसा क्यों चाहते हैं – थोडÞेÞ वक्त के लिए पर्ुनर्बहाली करने से क्या लाभ – पारदर्शी काम नहीं करनेवाले एवं अपनी विश्वसनीयता खो चुके संविधानसभा को पुनर्जीवित कर तैयार किए गए दस्तावेज को देशकी जनता स्वीकार कर ही लेगी, इसकी क्या गारन्टी – अल्प अवधि का मतलव तीन दिन, तीन महिना, तीन साल कब तक – अगर कोई दल या गठबन्धन लम्बे समय तक की अवधि के लिए इसे बढÞÞाने का प्रयास गरे, तब क्या होगा – वक्त रहते अगर यह प्रयास किया गया होता तो बात कुछ और होती। जबरन इसकी फिरसे बहाली अधिनायकवाद को जन्म देगा। जनता बेचारी ठगी सी महसूस करेगी। संविधानसभा का यह अन्त अस्वाभाविक नहीं स्वाभाविक है। दो, साल के बदले चार साल तक सक्रिय रहने के बावजूद यह अपना उद्देश्य प्राप्त नहीं कर सका। नेपाली कांग्रेस एवं एमाले, बेवजह राष्ट्रपति को विवाद में घसीटना चाहते हैं।
राजा ज्ञानेन्द्र द्वारा प्रतिनिधिसभा को जब भंग किया गया तो सदन की अवधि शेष थी। फिर १९ माघ २०६१ में राजा ज्ञानेन्द्र ने अपने हाथ में सारी शक्ति लेकर सेना के बलबूते सरकार चलाने का काम किया था लिहाजा पर्ुनर्बहाली की उस समय की माग गलत नहीं थी। आज परिस्थिति भिन्न है। इस संविधानसभा को किसी ने भंग नहीं किया है। वक्त पर हुआ है और वह भी सर्वोच्च अदालत के दिशा निर्देश के आलोक में। कुछ दल विशेष एवं नेता विशेष की स्वार्थपर्ूर्ति के लिए संविधानसभा को पर्ुनर्वहाली क्यों किया जाए –
एमाले एवं नेपाली कांग्रेस के भीतर अन्तरकलह है। पार्टर्ीीे अदिवासी, जनजाति एवं मधेशी नेताओं के द्वारा अख्तियार किए गए व्रि्रोही तेवर के कारण ये दल चुनाव में नहीं जाना चाहते। इधर एमाओवादी पार्टर्ीीें आए विखराव एवं जगह-जगह दोनों पक्ष के कार्यकर्ताओं -प्रचण्डÞ-वैद्य) के बीच जारी भौतिक द्वन्द्व के कारण अब प्रचण्डÞ भी पर्ुनर्बहाली की ही भाषा बोलने लगे हैं। क्या संविधासभा सिण्डिÞकेट प्रणाली के तरह सत्ता चलाने का जरिया मात्र है – शायद नहीं।

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