पर्यटन विकास में मधेश का महत्त्व
गङ्गा प्रसाद अकेला

नेपाल के ऐतिहासिक एवं पौराणिक तथस्थलों में मिथिला की राजधानी जनकपुर का अपना अलग ही विशिष्ट स्थान है। राजा जनक जैसे विदेह राजषिर् की इसी पुण्य

English: Photograph taken inside the Janki Tem...

English: Photograph taken inside the Janki Temple by Abhishek Dutta ([email protected]). (Photo credit: Wikipedia)

भूमिपर जगत जननी मां सीताका अवतरण हुआ था, राजा जनक की पुत्री के रुप में। भगवान राम की ससुराल व्रहृमज्ञानी राजषिर् जनक की भूमि जनकपुर धाम आज बहुत ही दयनीय अवस्था में है। इसका कारण है- नेपाल के जितने भी शासक हुए उन लोगों ने इसके संरक्षण में, इसकी उन्नति में कभी भी समुचित ध्यान नहीं दिया। र्
पर्यटकीय दृष्टि से इस पुण्य भूमिको बहुत सुन्दर और आकर्ष बनाया जा सकता था। यहाँ अगणित ऐसे सरोबर तथा धार्मिक स्थल हैं, जिनको उचित संरक्षण देने पर विदेशों से अनुसन्धान के लिए, अवलोकन के लिए अनेक विद्वत् मण्डली, अनुसन्धानकर्ता, तर्ीथयात्री, सैलानी सभी का जमावडा यहाँ होता। मगर हम देशवासियों का दर्ुभाग्य, आज यह पवित्र नगरी आजतक शासकीय उपेक्षा का शिकार बनी हर्ुइ है।
इस आलेख में तर्राई-मधेश में पर्यटकीय, ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टिकोण से विकास के जितने आधारभूत तत्व है, उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है ः-
१.    जनकपुरधाम के क्षेत्र में ऐतिहासिक महत्व के तालाव, पोखर और कुण्डों की संख्या करीब ११५ है। सम्भवतः विश्व के किसी भी नगर में इतनी संख्या में जलाशय नहीं होंगे। इन तालाव, पोखर और कुण्ड का उचित संरक्षण और सुधार किया जाए तो पर्यटकों के लिए आकर्षा के केन्द्र हो सकते हैं।
२.    नेपाल-जयनगर-जनकपुर रेल्वे के नाम से प्रसिद्ध, जिसे आजकल जनकपुर रेल्वे कहा जाता है, उसकी दर्ुदशा देखते हुए रोना आता है। इसका सुधार करने पर इस क्षेत्रका आर्थिक विकास भी होगा, जनता को सुविधा भी प्राप्त होगी और जनकपुर का एक आकर्षा भी बढेगा।
३.    मिथिला प्रदेश में पर्व और त्यौहारो की कोई कमी नहीं है। प्रायः प्रत्येक महीने में कोई न कोई पर्व-त्यौहार में यहाँ के लोग सम्लग्न रहते है। इससे सामाजिक सद्भाव, आपसी मेलमिलाप, सौहादर््रता, भाइचारा का सम्बन्ध प्रगाढÞ होता है। सभी वर्ग, समुदाय और जात के लोग एक साथ मिलकर बडÞे ही आत्मीय ढंग से पर्व-त्यौहार मनाते हैं। उल्लेखनीय पर्व में छठ, समाचखेवा, महावीर झण्डा, दर्ुगापूजा, जाटजटिन, झिझिया, होली और जुडशीतल आदि है। इन पर्वो को व्यवस्थित किया जाए तो पर्यटकों का आकर्षा बढÞ सकता है।
४.    त्रेतायुगी प्राचीन मिथिला राज्य की राजधानी जनकपुरधाम होने की बात पौराणिक ग्रन्थों तथा रामायण, रामचरित मानस जैसे प्राचीन महाकाव्य आदि द्वारा प्रमाणित है। बृहत विष्णु पुराण में मिथिला राज्य की सीमा के सम्बन्ध में वर्ण्र्ााकिया गया है। जिस के अनुसार पर्ूव में कोसी, पश्चिम में गण्डकी, दक्षिण में गंगा नदी और उत्तर में हिमवत् खण्ड तक के भूभाग को मिथिला बताया गया है। ऐसे पौराणिक और धार्मिक महत्व के कारण से सिर्फनेपाल से ही नहीं भारत के विभिन्न प्रदेशों से तर्ीथयात्री प्रतिवर्षयहाँ बडÞी संख्या में रामजानकी के दर्शन करने और इस पुण्य भूमि में शीश नवाने के लिए आते हैं।
५.    जनकपुर धाम के अतिरिक्त तर्राई-मधेश के अन्य भूभागों में भी प्रसिद्ध धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक स्थल है। जैसे देवघाट, गढीमाई मेला, ऐतिहासिक नगरी स्रि्रौनगढ, रुपन्देही और कपिलबस्तु जिल्ला गौतम बुद्ध के जन्म स्थल होने से विश्वविख्यात है। लुम्बीनी में मायादेवीका मन्दिर प्रख्यात है। वैसे देखा जाए तो पर्ूव के झापा जिल्ला से सुदूर पश्चिम तक सांस्कृतिक महत्व के अनेक विशिष्ट स्थल हैं। जो पर्यटकों को आकषिर्त कर सकते है। उदाहरण के लिए सिरहा का सहलेस फुलबारी -लाहान), पथरी पोखरी, माडर, कमल दह, माणिक दह, महिसौथा, मोरङका कतरेगाना पाँचवी शताब्दी के प्रख्यात गाथा तथा लोक नाट्य नायक सहलेस और उनकी प्रेमिका दिना मालिनी और कुसुमा के लोकलीलापर्ूण्ा जीवन से सम्बन्धित है तो सहलेस फुलबारी अभी भी विश्व के पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षा का केन्द्रविन्दु बन सकता है।
६.    बाँके और बर्दिया जिला से सुदूर पश्चिम के कैलाली और कंचनपुर जिले तक तर्राई-मधेश के ऐसे महत्वपर्ूण्ा पर्यटकीय स्थल हैं, जिन सबों की अपनी-अपनी साँस्कृतिक विशिष्ट गरिमाएँ है, जो अवतक राज्य और सरकार की ओर से प्रायः पर्ूण्ा उपेक्षित और तिरष्कृत ही है।
तर्राई-मधेश के विशिष्ट सांस्कृतिक महत्व के साँस्कृतिक कार्यक्रम प्राचीन काल से ही सुपरिचित, प्रदर्शित, अभिमंचित होते आए विशिष्ट महत्व की साँस्कृतिक निधियाँ संरक्षण और सर्म्वर्द्धन के अभाव में पर््रदशन और अभिमंचन करने के अवसर से प्रायः वंचित कर देने के कारण विलुप्त प्रायः हो चुके हैं। जैसेः छौकडबाजी नाच, रास नाच, पमरिया नाच, बधैया -नट का) नाच, लोक नाटक, गोपीचन, अष्टयाम, नवाह, लोकसंकर्ीत्तन और उसके विभिन्न अनुभेद जैसे-संकर्ीत्तन, झांकी संकर्ीत्तन और श्री

English: Photograph of Janki Mandir of Janakpu...

English: Photograph of Janki Mandir of Janakpur Dham(Nepal). This photo was taken from the roof of Shah Glass house building by Abhishek Dutta ([email protected]). I took this photograph during my Dashami trip to Janakpur (my birth place) on 14 October 2007. (Photo credit: Wikipedia)

सीताराम झांकी-विवाह संकर्ीत्तन, दाहा, तजिया, महावीर झण्डा, झर्रर्ीीादि।
लेकिन शासक वर्ग ने कभी भी इन अमूल्य सांस्कृतिक निधियों का उचित पोषण नहीं किया, जिसके चलते हम लोग एक बहुत बडे आर्थिक एवं सांस्कृतिक लाभ से वञ्चित हैं।
कुछ अपरिहार्य सुझावः-
१.र्    र्सवप्रथम, सरकारी स्तर पर केन्द्र में एक अलग ही ‘संस्कृति तथा सफल पर्यटन मंत्रालय’ की स्थापना अनिवार्य है। नागरिक उड्डयन का क्षेत्र विस्तृत और अलग प्रकृति का होने के कारण उसको ‘संस्कृति तथा पर्यटन मंत्रालय’ में समावेश करना प्रभावकारिता की दृष्टि से विल्कुल ही अनुपयुक्त है। संस्कृति और पर्यटन एक-दूसरे से अविच्छिन्न रुप से आवद्ध होने के कारण उन दोनों क्षेत्रों को साथ-साथ सामञ्जस्यपर्ूण्ा नीति-निर्माण कर तद्नुरुप की प्रक्रिया अपनाकर सफलतापर्ूवक संचालन किया जा सकता है।
२.    सम्प्रति अस्तित्व में रहे ‘नेपाल पर्यटन बोर्ड’ विगत कुछ दशकों से अब-तक की उसकी नीतियाँ और क्रियाकलापों को देखने के बाद बिल्कुल ही अप्रभावकारी, अति सीमित क्षेत्र से आवद्ध एवं बिल्कुल ही निष्प्रभावी संस्था के रुप में प्रायः सिद्ध हो चुकी है। इसलिये राष्ट्रीय स्तर में ‘नेपाल पर्यटन बोर्ड’ के बदले एक नयी संस्था-‘नेपाल पर्यटन-पर््रवर्द्धन तथा विकास समिति’ का गठन होना अत्यावश्यक हो गया है, जिसकी संचालक समिति में देश के हरेक क्षेत्र के सम्वद्ध विज्ञ व्यक्तित्व को सदस्य में रखने का प्रावधान होना चाहिए। उसी संचालक समिति के द्वारा ‘नेपाल पर्यटन-पर््रवर्द्धन तथा विकास समिति’ के उच्च पदाधिकारीयों के चयन की व्यवस्था होनी चाहिए। जिस व्यवस्था से ‘तर्राई-मधेश पर्यटन कार्यक्रम’ जैसे कार्यक्रम को अंजाम दिया जाए। अन्य पर्यटन कार्यक्रमों को भी सफलतापर्ूवक संचालन करके देश के पर्यटन क्षेत्र में अभूतपर्ूव प्रगति की जा सकती है।

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