पर्वहोली एक विहंगम दृष्टि

प्रस्तुतिः मुकुन्द आचार्य:कला का मुख्य उद्देश्य आनन्द है और उसका मूलाधार सौर्न्दर्य, चाहे आप आनन्द और सौर्न्दर्य की जो व्याख्या करें । रितुराज वसन्त प्राकृतिक सौर्ंदर्य की अन्तिम सीमा है । इसीलिए तो संस्कृत साहित्य के महाकवि कालिदास कह गए हैं- र्’र्सव प्रिय चारुतरं वसन्ते !’ स्वभावतः वसन्त से कला और साहित्य को बहुत प्रेरणा मिली । वसन्त और कला के सम्बन्ध का प्रमाण देते हुए ज्योतिषशास्त्र ने बतलाया है कि जिस व्यक्ति का जन्म वसन्त पञ्चमी के दिन होता है, वह ललित कलाओं का प्रेमी होता है ।
बसन्तोत्सव, वसंत-ऋतु, फाग, होलिका-दहन, होली, होलिकोत्सव आदि का साहित्य में बहुत ही चारु वर्ण्र्ाामिलता है । शायद इसका कारण यह है कि इस वसन्तोत्सव के पीछे एक महान आदर्श भी है । इस वसन्त की वासन्तिकता के बीच भगवान् शंकर को कामदेव के मोहन रूप ने मोहने की चेष्टा की थी और तब महादेव के तीसरे नेत्र ने उसे भष्म कर दिया था । प्रतिवर्षहोलिका-दहन अन्य बातों के अतिरिक्त इस घटना की स्मृति भी दिला जाता है । holi
यही स्वस्थ्य श्रृंगार संस्कृत साहित्य ने वसन्त में ढूंढÞा है । संस्कृत साहित्य में रति और कामदेव के श्रृंगार और पूजन का जो वर्ण्र्ाामिलता है, उसके मूल में भी इसी स्वस्थ्य श्रृंगार का विधान है । अतः हमारे इस सांस्कृतिक पर्व में रति और विरति का अनूठा सामंजस्य है । इसीलिए जहाँ इसे एक ओर ‘मदन महोत्सव’ की संज्ञा दी गई है, वहां दूसरी ओर ‘शतपथ ब्राहृमण’ ने बसंत को ही ब्रहृम माना है । खैर …. !
होली अथवा होलिकोत्सव एक ऐसा त्यौहार है, जिसे स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध, सब बडेÞ उत्साह से मनाते हैं । लगता है, इसके समान आनन्द और प्रसन्नता देने वाला कोई दूसरा त्यौहार नहीं है । इस त्यौहार में न तो वर्ण्र्ााेद है और न जाति भेद । अबीर-गुलाल, रंग, कीचडÞ, हास परिहास और उल्लास का महापर्व होली हिन्दू जनमानस में अपना विशेष महत्व रखता है । ब्राहृमण-क्षेत्रीय, वैश्य-शूद्र, अमीर-गरीब, ऊच-नीच सभी एक साथ मिल कर इस पर्व को मनाते हैं । इस दृष्टि से यह त्यौहार हमें राम-राज्य की हल्की सी झलक देते हुए वास्तविक प्रजातान्त्रिक समाजवाद का रूप प्रस्तुत करता है । हकीकत तो यह है कि शास्त्रीय एवं लौकिक परंपराओं को अपने में समाहित किए हुए यह पर्व सब को समान रूप से प्रिय है ।
यह लोकप्रिय त्यौहार फागुन मास की पूणिर्मा को मनाया जाता है । इस अवसर पर लकडÞी और घासफूस का बडÞा भारी ढÞेर लगा कर वेद-मन्त्रों से बिस्तार के साथ होलिका-दहन किया जाता है । इसी दिन हर महीने की पूणिर्मा के हिसाब से इष्टि -छोटा-सा यज्ञ) भी होता है । इस कारण भद्रा रहित समय में होलिका-दहन होकर इष्टियज्ञ भी हो जाता है । पूजन के बाद होली की भस्म शरीर पर लगाई जाती है । होली के लिए प्रदोष अर्थात् सायंकाल-व्यापिनी पूणिर्मा लेनी चाहिए और ऐसी रात्रि में भद्रा-रहित समय में होली प्रज्वलित करनी चाहिए । भद्रा में होली को प्रज्वलित करने से राष्ट्र में अशान्ति होती है, ऐसी जनधारणा है । प्रतिपदा, चतर्ुदशी, भद्रा और दिन में होली जलाना र्सवथा त्याज्य है । यदि पहले दिन प्रदोष के साथ भद्रा हो और दूसरे दिन सर्ूयास्त के पहले पूणिर्मा समाप्त होती हो तो भद्रा के समाप्त होने की प्रतीक्षा करके सूर्योदय होने के पर्ूव होली जला देना चाहिए । ब्रहृम पुराण कहता है कि फागुन की पूणिर्मा के दिन जो मनुष्य चित्त को एकाग्र करके हिंडोले में झूलते हुए श्री गोविन्द पुरुषोत्तम का दर्शन करता है, वह निश्चय ही बैकुंठ जाता है । यह दोलोत्सव होली के दूसरे दिन होता है ।
फाल्गुनी पूणिर्मा के दिन चतर्ुदर्श मनुओं मे से एक मनु का जन्म भी है । इस कारण यह मन्वादि तिथि भी है । अतः उसके उपलक्ष्य में भी उत्सव मनाया जाता है । संवत् के आरम्भ एवं वसन्तागमन के निमित्त जो यज्ञ किया जाता है और उसके द्वारा अग्नि के अधिदेव-स्वरूप का जो पूजन होता है, वही पूजन अनेक शास्त्रकारों ने इस होलिका का माना है । इसी कारण कोई-कोई होलिका-दहन को संवत् के आरम्भ में अग्नि स्वरूप परमात्मा का पूजन मानते हैं ।
भविष्य पुराण में नारदजी ने राजा युधिष्ठिर से होली के सम्बन्ध में जो कथा कही है, वह इस प्रकार है-
नारद जी बोले- हे नराधिप । फाल्गुन की पूणिर्मा को सब मनुष्यों के लिए अभयदान देना चाहिए, जिससे समस्त प्रजा भयरहित होकर हँसे और क्रीडÞा करे । डंडे और लाठी लेकर बालक शूर-वीरों की तरह गांव के बाहर जाकर होली के लिए लकडÞी और कंडों का संचय करें । उससे होलिका में विधिवत् हवन किया जाए । अट्टहास, किल-किलाहट और मन्त्रोच्चारण से पापात्मा राक्षसी नष्ट हो जाती है । इस व्रत की व्याख्या से हिरण्यकश्यपु की भगिनी अर्थात् प्रहृलाद की फुआ, जो प्रहृलाद को अग्नि में लेकर बैठी थी, प्रति वर्षहोलिका नाम से आज तक जलाई जाती है ।
हे राजन ! पुराणान्तर में ऐसी व्याख्या है कि ढूंढÞला नामक राक्षसी ने शिव-पार्वती का तप करके यह वरदान पाया था कि जिस किसी बाल को वह पाए, उसे खाती जाए । परन्तु वरदान देते समय शिवजी ने यह युक्ति रख दी थी कि जो बालक वीभत्स आचरण एवं राक्षसी वृत्ति में निर्लज्जापर्ूवक फिरते हुए पाए जाएंगे, उनको वह न खा सकेगी । अतः उस राक्षसी से बचने के लिए बालक नाना प्रकार के वीभत्स और निर्लज्ज स्वांग बनाते और अंट-संट बकते हैं ।
होलिका दहन के पंद्रह दिन बाद चैत्र शुल्क प्रतिपदा से नयाँ वर्षभी प्रारम्भ होता है । सत्य जो हो किन्तु इतना जरूर है कि होलिकोत्सव आसुरी वृत्तियों के दहन एवं सदवृत्तियों की विजय का परिचायक है ।
होलिका दहन के बाद तो जैसे जनमानस में एक नयाँ आनन्द आ जाता है । दिन भर लोग रंग खेलते हैं, अवीर-गुलाब लगाते हैं । संध्या समय संगीत-महाफिलें जमती हैं । फाग के मीठे गीतों से सारा वातावरण सरस हो उठता है । होली के नायक भी तो रसिया कृष्ण हैं, जो ब्रज में राधा एवं गोपियों के साथ होली खेलते थे । आज भी भोजपुरी-मैथिली-अवधी क्षेत्र में कृष्ण और राम के फाग खेलने के गीत बडÞी तन्मयता से आगे जाते हैं । फागुन के महीने में अंतः प्रवृत्ति और बाहृय प्रवृत्ति दोनों में एक सरसता आ जाती है, एक मादकता अंगडर्Þाई लेने लगती है । जिस के पति परदेश गए है, वह विरहिणी गा उठती है-
फागुन मस्त महीना हो लाला,
फागुन मस्त महीना, पिया नहीं अइले,
केकरा संग खेलबि होरी हो लाला पिया नहीं अइले ।
सब के पिया घरे चली अइले, मोर पिया विदेश हो लाला ।
पिया नहीं अइले, केकरा संग खेलबि होरी हो लाला ।
होली के दिन सारी जनता मस्त हो जाती है । बूढÞे, युवक और बच्चों में कोई भेद नहीं रहता । सभी एक स्वर में ‘कबीरा’ और ‘जोगीडÞा’ गाते हैं । इनके माध्यम से लोग अपने मन की कसक भी निकालते हैं । इन गीतों में अश्लीलता की मात्रा बहुत होती है । इस प्रथा में अंकुश लगाना बहुत जरूरी माना जाता है । मगर होली के बीतते ही लोग सब कुछ भुला देते हैं ।
विभिन्न क्षेत्र और समुदाय में होली पर्व मनाने का अपना-अपना अलग प्रचलन होता है । नेपाल में तर्राई की होली और पहाडÞी क्षेत्र की होली में कुछ साम्यता होते हुए भी अन्तर भी बहुत होता है । तर्राई में पूणिर्मा के एक रोज वाद में होली खेली जाती है । मांस और शराब का दौर हर जगह एक-सा नजर आता है । होली की अनेक विकृतियां भी समाज में आ रही हैं । नशा सेवन कर सडÞकों पर बेहाश पडÞे रहना, आपस में मारपीट कर लेना, रंग-गुलाब के बदले कीचडÞ, अलकतरा, पेन्ट आदि रगडÞना, लडÞकियों से छेडÞछाडÞ करना- ऐसी अनेक बुरी आदतें बर्जित होनी चाहिए । होली में तो दुश्मन भी दोस्त बन जाएं, तो समझिए कि अच्छी होली खेली । एक उर्दू शायर ने क्या खूब कहा है-
बिछडÞे हैं जो मिल जाएँ
बैरी देखें और हिल जाएँ
तेरे घर का मेल !
ऐसी होली खेल !
मधुर भाव की पुजारिन कवि की आत्मा परम प्रियतम से चुनरी ओढÞ कर फाग खेलना चाहती है-
‘मै तो वा दिन फाग मैचै हों, जा दिन प्रिय मेरे द्वारे ऐहों ।
रंग वही, रंगरेजवा ओही, सुरंग चुनरिया रंगै हो ।’

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