“पर उपदेश कुशल बहुतेरे”

उपदेश है भई हर कोई बैठे बिठाए देना चाहता है पर कोई लेटे लिटाए नहीं लेना चाहता । लेने वाला चाहता है सहयोग पर देने वाला सहयोग की मूठ्ठी तो बंद कर देता है पर उपदेश की जुबान कैंची की तरह चलने लगती है


बीमार को जितना परहेज करने के लिए डाक्टर नहीं बोलते उस से ज्यादा नजदीकी रिश्तेदार और पड़ोसी बोल बोल कर और बीमार करने में मद्धत करते हैं ।thought-process

बिम्मी शर्मा
उपदेश देना किसको अच्छा नहीं लगता होगा ? दूसरों को फोकट का उपदेश और ज्ञान दे कर पूण्य कमाना हर कोई चाहता है पर दूसरों की मुसीबत में काम आना कोई नहीं चाहता । कोई इंसान दुर्घटना में घायल हो जाए तो पास के अस्पताल में ले जाना और उसको आर्थिक सहयोग करने में सभी हाथ खींचते हैं पर उस घायल इंसान को सड़क में कैसे लाना चाहिए और दुर्घटना न हो या हो जाने पर क्या, क्या एहतियात बरतने चाहिए उसके लिए सभी दत्तचित्त हो कर उपदेश देते हैं ।
उपदेश है भई हर कोई बैठे बिठाए देना चाहता है पर कोई लेटे लिटाए नहीं लेना चाहता । लेने वाला चाहता है सहयोग पर देने वाला सहयोग की मूठ्ठी तो बंद कर देता है पर उपदेश की जुबान कैंची की तरह चलने लगती है । जब कैंची की तरह धारदार जुबान उपदेश के बहाने चलने लगती है तो गजब ढाती है । मान न मान मैं तेरा मेहमान की तरह उपदेश देने वादा इंसान जज्बाती हो जाता है । कोई लेने की चाह न रखे और कोई बस देता ही चला जाए तो उसे उपदेश या सलाह कहते हैं ।
आप के घर में आप या आपका अपना कोई बीमार पड़ जाए तब उपदेश या सलाह देने वालों की बाढ़ आ जाती है । बीमार या रोगी व्यक्ति को डाक्टर पैसे ले कर भी जितनी दवा और सलाह नहीं देते उससे ज्यादा और मुफ्त में आपके रिश्तेदार, दोस्त और पड़ोसी आपको उपदेश या सलाह दे देते हैं । बीमार से मिलने भले १ किलो सेब लेकर न आए पर १ टन सलाह या उपदेश मुफ्त में देने में संकोच नहीं करते । बीमार को जितना परहेज करने के लिए डाक्टर नहीं बोलते उस से ज्यादा नजदीकी रिश्तेदार और पड़ोसी बोल बोल कर और बीमार करने में मद्धत करते हैं ।
बीमार के लिए आराम सबसे बड़ी दवा है । पर सलाहकारों और उपदेशकों के होते हुए यह आराम हराम हो जाती है । बीमार होने की जानकारी देना भी आफत मोल लेना है । रात बिरात आ धमकते हैं और गब्बर की शैली में उपदेश या सलाह देने से ज्यादा धमकाने लगते हैं । बेचारा बीमार व्यक्ति तन से ही नहीं मन से भी बीमार हो जाता है । सभी गुरु या संत बन कर उपदेश देना तो चाहते है पर वही उपदेश खुद नहीं लेते या उस पर अमल नहीं करते । क्या करें उपदेश या सलाह टेन्शन की तरह देने की चीज है लेने की नहीं । जिस दिन उन उपदेश पर अमल कर लिया सच मानिए यह लोग अपने आप ही भगवान बन जाएँगें । भगवान कोई नहीं बनना चाहता इसी लिए शैतान बन कर उपदेश देते हैं । औरों को उपदेश या सलाह न दे तो खाया पिया हजम कैसे होगा । उपदेश चूरण का काम करती है । सोने या आराम करने से पहले औरों को उपदेश या सलाह दे कर खुद हल्के हो जाना ।
कोई अपना या पड़ोसी दुर्घटना में पड़ कर घायल हो जाए और उसको रक्त चढ़ाना पडेÞ और उनमें से किसी को रक्त देना पड़े तो ऐसे खीसें निपोरने लगते हैं जैसे किसी ने उनकी रक्त नहीं किडनी ही मांग लिया हो जैसे कोई भी इंसान पढ़ाई, लिखाई में जितना ही फिसड्डी हो, कोई डिग्री उसके हाथ न आया हो पर उपदेश या सलाह देने में वह बहुत ही कुशल होता है । उपदेश या सलाह की अदृश्य डिग्री उसके पास हमेशा रहती हैं । दिखने वाले पर्स में पैसा ज्यादा या कम हो सकता है पर अदृश्य पर्स से उसके पास उपदेश या सलाह की भरमार होती है । एक मांगो वह दस देता है ।
लोग पैसे से भले गरीब हो पर उपदेश या सलाह देनें के मामले में वह बील गेट्स को भी मात कर देते हैं । किसी के घर मे शादी हो रही है तो उपहार देने में भले ही कंजुसी करे पर सलाह देने में नहीं करते । बरातियों को भोज में क्या क्या परोसा जाए से ले कर दूल्हा या दूल्हन को कितने कपड़े, गहने और नकद दिया जाए इस की भी लगे हाथ सलाह देते हैं यह मूफ्त के सलाहकार । अपने घर की शादी में तो वह दिल खोल कर खर्च करेंगे पर अपने रिश्तेदार या पड़ोसी को किफायत से खर्च करने के लिए उपदेश देने लगते हैं । और साथ में मूफ्त का चाय नाश्ता खा पी लेते है अलग से ।
देश के संसद में या प्रधान मंत्री को सलाह देने वाले का तो कहना ही क्या । राजनीति में तो सलाहकार का पद ही होता है । वह प्रधान मंत्री या राष्ट्रपति को क्या सलाह देते हैं भगवान जाने ? अब तो सोशल मीडिया पर भी सलाहकारों की एक नईं खेप उग आई है । जो अपने फेसबुक या ट्विटर के टाईम लाईन को भरने के बहाने से राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री को ऐसे सलाह देते हैं जैसे वह कोई घर के दूध पीते बच्चे हो । पर ईसान का मन बड़ा ही चंचल होता है । वह उपदेश या सलाह दिए बिना चैन से नहीं बैठता । जब भी देश के राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री या और कोई मंत्री विदेश भ्रमण पर जाने लगते हैं तब उनको वहां किस तरह से बोलना है, किस किस तरह कि संधि में हस्ताक्षर करना है । यह सब आज कल सोशल मीडिया के प्रयोगकर्ता तय करते हैं ।
खुद को आंख और नाक का लोर पोंछने का शउर नहीं है पर दूसरो को उपदेश और सलाह की रेवड़ी मुफ्त में सरे आम बांटते रहते हैं । कोई इन को वही मुफ्त की सलाह की रेवड़ी खिलाए तो इन्हे डायबिटिज हो जाता है और कन्नी काट्ने लगते हैं । पर दूसरों को थाली में खाने कि जगह सलाह और उपदेश भर कर परोसते हैं । अपना पैसा तो जाएगा नहीं बस अपने दिमाग का कचरा सलाह और उपदेश के बहाने औरों के दिमाग में भर देते हैं । इसी को कहते है “हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा आए ।” पर कभी कभी रंग चोखा न आ कर बदरंग हो जाता है तब इन का मुँह देखने लायक होता है । इन को अपने सर की खुजली तो दिखाई नहीं देती पर दूसरों के जुएं दूर से ही दिखाई देने लगती हैं । क्योंकि यह औरों को पर उपदेश देने में बहुत ही कुशल और निपुण होते हैं ।

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