पश्चगामी राजनीति की ओर अग्रसर देश

कुमार सच्चिदानन्द

कुमार सच्चिदानन्द

वर्तमान संदर्भो में कहा जा सकता है कि राजनीति की रेखाएँ आड़ी तिरछी होती हंै । मगर यह पश्चगामी होती है, उसे नहीं माना जा सकता । लेकिन नेपाल का वत्र्तमान राजनीतिक संवैधानिक अभ्यास पश्चगामी होने का संकेत दे रहा है । निश्चय ही हमारे देश के महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों के शीर्ष नेता इस तथ्य को स्वीकार नहीं करेंगे क्योंकि उनकी अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा, अपना पूर्वाग्रह, दुराग्रह और अपनी आकांक्षा का मनोविज्ञान है । लेकिन जनस्तर पर इस तथ्य को स्वीकार किया जा रहा है । विगत महाभूकम्प के द्वारा देश के समक्ष आई चुनौतियों से सामना करने के लिए आनन–फानन में जो राजनीतिक सहमति हुई, उसका एक सकारात्मक परिणाम यह निकाला कि महज चन्द दिनों में लगभग छः साल से लम्बित संविधान का मसौदा देश के सामने आया । लेकिन यह राजनीतिक ध्रुवीकरण जो किसी न किसी  रूप में सत्ता से बाहर रहे दलों का सत्ता में पहुँचने की सीढ़ी बना, एक ऐसा मसोदा देश के समक्ष प्रस्तुत किया, जिसे अधूरा और उन जनभावनाओं का तिरस्कार करता माना जा सकता है, जिसकी माँग विभिन्न रूपों में विभिन्न समय पर नेपाली जनता ने की है ।
यह संक्रमण काल है । संविधान हीनता की अवस्था से देश गुजर रहा है लेकिन लोगों में संविधान की आशा भी है । अतः विभिन्न कोणों एवं दिशाओं से विभिन्न माँगों का उठना स्वाभाविक माना जा सकता है । लेकिन व्यापक रूप से इसके विरोध का स्वर उठना शुभ संकेत नहीं है ओर एक तरह से यह आगामी सम्भावित संीवधान की सर्वस्वीकार्यता पर प्रश्नचिन्ह उठाता है । विरोध को भी लोकतन्त्र में स्वभाविक माना जा सकता है लेकिन व्यापक विरोध किसी भी रूप में उपेक्षा योग्य नहीं है । विरोध करने वालाें के भी अपने तर्क हैं । उनका मानना है कि जिन चीजों के लिए लोगों ने संघर्ष किया, कुर्बानियाँ दी, उसे हाशिये पर रखकर आने वाले संविधान का अर्थ क्या है ?
संघीयता को तो सैद्धान्तिक रूप में इस मसौदा में स्वीकार किया गया है । लेकिन प्रदेशों का नामांकन और सीमांकन भविष्य के लिए छोड़ दिया गया है । गौरतबल है कि जिन उद्देश्यों से दस वर्षीय जनयुद्ध का सञ्चालन नेकपा माओवादी ने किया, उसका एक बिन्दू संघीयता और प्रदेश, विभाजन भी था । उसके साथ ही मधेश और जनजातियों के आन्दोलन भी इसी उद्देश्य से हुए थे । मगर इस तथ्य को नजरअन्दाज कर अगर संविधान राष्ट्र के सम्मुख आता है तो इन आन्दोलनों के सञ्चालक दलों के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान लग सकता है । आश्चर्य है कि इन माँगों का सबसे प्रबल पक्षधर नेकपा माओवादी ने आखिर क्यों उस मुद्दे पर नरमी बरत ली है ? रही बात भविष्य में इन मुद्दों को सम्बोधित करने की तो यह कहा जा सकता है कि नेपाल की राजनीति अब तक उस विश्वसनीय मुकाम तक नहीं पहुँच पायी है कि जहाँ जनता उस पर और उसकी कथनी पर विश्वास कर सके । ऐसा भी नहीं कि मौजूद संविधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा । किसी दल या नेता के शीघ्रातिशीघ्र सरकार का नेतृत्व लेने की महत्वांकाक्षा के कारण आधा–अधूरा संविधान देश पर लादने का औचित्य नहीं है ।
किसी भी देश का संविधान राज्य सञ्चालन करने के लिए दूरदृष्टि से लवरेज मूल कानून होता है । यह राज्य और नागरिकों के बीच सम्बन्ध को निर्धारित करता है । यह एक प्रणाली और मान्यता भी स्थापना करता है और उसके लिए आवश्यक आधारभूत विषयों का समावेश उस में किया जाता है । यदि संविधान अपने आप में अस्पष्ट और जटिल होगा तो इसका कार्यान्वयन और अधिक कठिन हो सकता है । इसलिए संविधान ऐसा होना चाहिए, जो सब को जोड़ सके । यही बात विगत यात्रा में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री मोदी ने भी कहा था कि संविधान ऐसा गुलदस्ता है, जिस में हर वर्ग को लगे कि उसके फूल की खुशबू भी उस में है । लेकिन इन बातों की उपेक्षा कर यदि हम किसी जाति, क्षेत्र या वर्ग विशेष की संवेदना को हतोत्साहित करने के लिए उसकी पारम्पारिक मूल्यों पर चोट करने के लिए विधान बनाते हैं तो वह विवाद का विषय बन ही जाता है । नागरिकता सम्बन्धी प्रचलित विधान की उपेक्षा कर जो जटिलता मसौदे में प्रस्तुत की गई उससे स्पष्ट है कि सरकार या राजनीतिक दल आज भी पञ्चायतकालीन मानसिकता से नहीं उबर पाए हैं और तराई के पारस्परिक निवासियों के प्रति उनकी दृष्टि औपनिवेशिक है । यह सच है कि इस कानून का प्रभाव कमोवेश हर जगह पडेÞगा लेकिन तराई मधेश की जनता इससे अधिक प्रभावित होगी ।
धर्म की दृष्टि से भी यह मसौदा पश्चगामी दिशा में अग्रसर दिखाई देता है । वि.सं. २०६२–६३ के जनआन्दोलन के बाद धर्म कोई मुद्दा नहीं था और हिन्दू राष्ट्र के रूप में विश्व में नेपाल की पहचान थी लेकिन अन्तरिम संविधान में उसे धर्मनिरेपक्ष राष्ट्र घोषित किया गया । इसका विरोध भी हुआ और फिर से हिन्दू राष्ट्र बनाने की मांग भी विभिन्न स्तरों पर की गई । लेकिन इस मुद्दे पर अन्तरिम संविधान को संशोधित नहीं किया जा सका । लेकिन माना जा सकता है कि इस विरोध की आवाज राजनीतिक दलों के कानों तक पहुँची । इसलिए अब वे धर्मनिरपेक्षता छोड़कर ‘धार्मिक स्वतन्त्रता’ की बात करने लगे हैं । संविधान बनने तक इस में कुछ और परिवर्तन आता है या नहीं यह तो समय बतलाएगा । लेकिन इससे इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि हमारी राजनीतिक दृष्टि सुनिश्चित नहीं । इसलिए निर्णय लेने में भी हमें समय नहीं लगता और पलटियाँ मारने में भी समय नहीं लगता ।
महाभूकम्प के बाद चार दलों के बीच बनी राजनीतिक सहमति के अनुरूप संविधान को शीघ्रता से लाने के निमित्त १६ सूत्रीय समझौता हुआ, जिसके कुछ बिन्दूओं को सर्वोच्च अदालत ने असंवैधानिक करार दिया और यथास्थिति का आदेश भी जारी किया । लेकिन आश्चर्य की बात यह हुई कि नए संविधान में कानूनी राज्य की प्रत्याभूति का दायित्व वहन कर रहे चार दल और संविधान सभाध्यक्ष ने ही सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले को मानना आवश्यक नहीं माना । अब न्यायालय और न्यायाधीशों को निरीह बनाने के सिवा दूसरा मार्ग नहीं है और उन्होंने चुप्पी साध ली है । दरअसल न्यायालय के फैसले को कार्यान्वित कराना सरकार की जिम्मेदारी होती है । मगर सरकार ही जब उपेक्षा करने लगे, रक्षक ही भक्षक बन बैठे तो कोई कर भी क्या सकता है ? मगर सरकार के इस निर्णय का नकारात्मक सन्देश तो आम लोगों में गया ही, अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय भी अछूत नहीं रहा । इस घटना ने एक तरह से सिद्ध कर दिया कि इस देश में भी कानून का शासन नहीं । इसे क्या राजनीति का अग्रगामी कदम माना जा सकता है ?
जिस रूप में और जिस तरह संविधान देश के समक्ष लाने का अभ्यास चार दलों द्वारा हो रहा था, राष्ट्रप्रमुख की हैसियत से राष्ट्रपति ने इसके प्रति असहमति जतलायी, इसके मध्येनजर कुछ राजनीतिक दलों और उनके नेताओं ने इस संवैधानिक संस्था के प्रति एक तरह से मोर्चा ही खोल लिया है । उनका दोष यह है कि उन्होंने कहा कि संविधान सभा के भीतर और बाहर के सभी दलों को सहमति में लेकर ही संविधान जारी किया जाना चाहिएँ । गौरतलब है कि राष्ट्रपति का मुंह चिढ़ा कर सत्ता स्वार्थ के लिए संविधान शीघ्रता में जारी करने का प्रयास किया जा रहा है ।
अब सवाल उठता है कि जब हम संविधान बनाने की बात करते हैं तो किसके लिए ? निश्चय ही इसके केन्द्र में नेपाली जनता आती है । उसमें भी किसान, मजदूर, दलित और सीमान्तकृत वर्ग के हितों का खयाल आधिकारिक रखा जाना चाहिए । क्योंकि इससे पूर्व के सभी छः संविधानों ने इस वर्ग के लोगों की उपेक्षा की गई । इसका परिणाम यह हुआ कि कोई भी संविधान देश के लिए चिरस्थायी नहीं हो सका और लम्बे द्वन्द्ध से भी देश को गुजरना पड़ा । आज जो दल भावी संविधान में इस मूल मर्म की उपेक्षा करना चाहता है, उनसे तो यह सवाल पूछा ही जाना चाहिए कि क्या वे ऐसा ही संविधान चाहते हैं, जो काल के शिलालेख पर शताब्दी की बात तो दूर, दशक को भी न गुजार सके । एक बात तो समझना ही चाहिए कि शक्ति की बदौलत आवाज को लम्बे समय तक दबाया नहीं जा सकता । माँगे उठी है तो उसका वैज्ञानिक और सन्तोषजनक समाधान ढूँढा जाना चाहिए । अन्यथा सारे राजनीतिक अभ्यास पश्चगामी ही माने जाएँग

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