पहले संविधान संशोधन, फिर संविधान दिवस

शाही सामंतवाद के देश से उखड़ने के बाद जबरदस्त ढंग से उस विरासत को नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) के खस–गोर्खाली नेतृत्व ने थाम लिया था । नेपाली कांग्रेस और तत्कालीन एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की नेतृत्व पंक्ति भी इसी इर्दगिर्द घूम रही थी ।


मधेश और मधेशी सहित पहाड़ की भी उत्पीड़ित राष्ट्रीयता ने इसका जमकर विरोध किया । संविधान घोषणा से करीब महीना दिन पहले से ही तीसरा मधेश आन्दोलन जारी था और संविधान घोषणा के बाद नाकाबंदी में बदल गया ।


मधेशी सहित की उत्पीड़ित राष्ट्रीयता के भीतर तड़प की आग अब भी सुलग रही है


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गोपाल ठाकुर
माओवादी केंद्र के अध्यक्ष प्रचण्ड के नेतृत्व में रही सरकार ने संविधान दिवस समारोह को तीन दिन मनाने का निर्णय सार्वजनिक किया है । सरकारी निर्णय के अनुरूप इस माह की १८, १९ और २० तारीख को भव्यता के साथ संविधान दिवस मनाया जाना चाहिए । किंतु अपनी अभिव्यक्ति के अनुसार ही सरकार ने इस संविधान को अधिकतम् स्वीकार्य बनाना अपने कार्यभार के भीतर रखा है । अतः यह संविधान न्यूनतम रूप में ही स्वीकार्य है, अर्थात् नेपाल की अधिकाधिक जनता के बीच यह स्वीकार्य नहीं है । बात भी यही सही है । यह संविधान गोर्खा साम्राज्य को निरंतरता देने का सब से पिछला साधन सावित हुआ है । तो क्या सरकार के इस निर्णय का अधिकाधिक कार्यान्वयन होगा ? जी नहीं ।
खस–गोर्खाली अन्धराष्ट्रवाद की निरन्तरता में पिछले साल नेपाल में उत्पीड़ित राष्ट्रीयता पर यह सातवाँ संविधान भी लादा गया । जग जाहिर है,

किंतु बात सिर्फ उतनी ही नहीं है । प्रचण्ड यह भी नहीं भूलें कि माओवादी केंद्र तत्कालीन एमाओवादी के तहत बाँकी घटकों के आत्म–समर्पण का परिणाम नहीं है । बल्कि सभी की असफलता का परिणाम है जिन में एमाओवादी की असफलता सब से अधिक थी । इतना ही नहीं, तीसरे मधेश आन्दोलन में सिर्फ मधेशवादी कहेजाने वाले लोग ही नहीं थे किंतु माओवादी केंद्र का एक सशक्त घटक तत्कालीन नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) और उसके संयोजक मातृका यादव के नेतृत्व में ही रही संयुक्त मधेशी राष्ट्रीय आन्दोलन समिति भी आन्दोलन में सहभागी थीं । इस पार्टी के महोत्तरी के विद्यार्थी नेता राम विवेक यादव की भी मधेश आन्दोलन में बलि चढ़ गई ।
सत्ताधारी वर्ग और खस–गोर्खाली राष्ट्रीयता ने पहाड़ में दीपावली मनाई । किंतु मधेश और मधेशी सहित पहाड़ की भी उत्पीड़ित राष्ट्रीयता ने इसका जमकर विरोध किया । संविधान घोषणा से करीब महीना दिन पहले से ही तीसरा मधेश आन्दोलन जारी था और संविधान घोषणा के बाद नाकाबंदी में बदल गया ।
शाही सामंतवाद के देश से उखड़ने के बाद जबरदस्त ढंग से उस विरासत को नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) के खस–गोर्खाली नेतृत्व ने थाम लिया था । नेपाली कांग्रेस और तत्कालीन एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की नेतृत्व पंक्ति भी इसी इर्दगिर्द घूम रही थी । किंतु इस बात का पता कांग्रेस को तो तब चला जब सरकार की बागडोर केपी ओली के हाथ में दी जाने लगी थीइ । नेपाली कांग्रेस ने इसे रोकने की कोशिश भी की किंतु तत्कालीन एमाओवादी के एमाले के गिरफ्त से बाहर नहीं आ पाने के कारण कामयाबी नहीं मिली । इस जमीनी यथार्थ को ओली सरकार ने महशूस भी किया था । इसलिए संविधान घोषणा के महीना दिन भी नहीं हुए थे सरोकारवालों से बिना किसी सलाह–मश्विरा सत्ताधारियों ने संशोधन भी कर डाला । किंतु मधेश आन्दोलन रूका नहीं । भले ही मधेश आन्दोलन को भारतीय नाकाबंदी के नाम से बदनाम करने की कोशिश भी क्यों न हुई हो ! कथित मधेशवादियों की कतिपय कमी–कमजोरियों से नाकाबंदी के साथ साथ पूरा आंदोलन ही शिथिल हो गया । किंतु मधेशी सहित की उत्पीड़ित राष्ट्रीयता के भीतर तड़प की आग अब भी सुलग रही है ।
यह भी लाजÞमी है कि प्रचण्ड को अपनी गलतियों का एहसास दूसरी संविधान सभा के निर्वाचन परिणाम के समय से ही होने लगा था । किंतु कामीडाँडा बैठक के बाद से ही वहाँ से अग्रगामी शक्तियों के बहिर्गमन के साथ साथ प्रतिगामी ही सही, संविधान निर्माण के पुरुषार्थ का भूत भी उनके सर उतना ही सवार था जितना जनयुद्ध के दौरान उनकी ओर से किए गए उत्पीड़ित राष्ट्रीयता की मुक्ति के वादे । इसलिए माओवादी आन्दोलन को एकत्र किए बिना उनके पास और कोई चारा भी नहीं था । फलतः उनकी कोशिश इस ओर आगे बढ़ी और टूट, फूट और विखराव में रहा माओवादी आन्दोलन आज अधिकतम रूप में माओवादी केंद्र के साथ केंद्रित होने लगा है ।

इस सन्दर्भ में किसी भी हालत में यथास्थिति में संविधान कार्यान्वयन की रट जो लगाई जा रही है और कही जा रही है कि संविधान कार्यान्वयन नहीं हुआ तो शायद आसमान टूट जाए या धरती फट जाए ! किंतु माक्र्स, लेनिन और माओ के अनुयायी बतानेवालों को तो इस बात का एहसास होना चाहिए कि उत्पीड़ित राष्ट्रीयता को मुक्त किए बिना समाजवाद सम्भव नहीं

इसका पहला सकारात्मक परिणाम यह है कि आज तुलनात्मक रूप से प्रगतिशील राष्ट्रवाद के पक्ष में सब से पहले माओवादी केन्द्र और उसके साथ साथ नेपाली काँग्रेस भी खड़ी दिखती है । संविधान में संघीयता, गणतन्त्र, धर्म–निरपेक्षता, समानुपातिक प्रतिनिधित्व जैसे अग्रगामी अवयवों के पक्ष और विपक्ष में खड़ी होनेवाली राजनीतिक शक्तिओं के बीच तीब्र ध्रुवीकरण होने लगा है । मधेशी और आदिवासी जनजातियों के साथ साथ उत्पीड़न में पड़ी राष्ट्रीयता की नेतृत्व पंक्ति से संविधान संशोधन के विषय पर सरकार की बातचीत जारी है । संभवतया कुछ बात आगे भी बढ़ेगी । इस अवस्था में सरकार की ओर से बिना संविधान संशोधन संविधान दिवस का जश्न नहीं मनाया जाना चाहिए । बल्कि इस अवसर पर संविधान की कमी–कमजोरियों पर बहस–विमर्श हो तो हमारी राष्ट्रीय एकता को अधिक मजबूती मिलेगी ।
यह सिर्फ इसलिए नहीं कि संविधान दिवस का जश्न सिर्फ कथित मधेशवादियों के लिए अपाच्य होगा । अभी तो सरकार को इस जनविरोधी संविधान घोषणा से धुमिल हमारी राष्ट्रीय एकता के बारे में सोचना चाहिए । सरकार यह भी नहीं भूले कि देश की आधी से अधिक आवादी ने संविधान घोषणा के दिन काला दिवस मनाया था । जरा सोचने की बात है जिसने इस संविधान के खिलाफ ऐलान–ए–जङ में अपनी जान तक न्योछावर कर दी, जिनको अपांग बनकर जीना पड़ रहा है, जनको झूठे मुकदमें के तहत जेल और प्रवास में जिंदगी गुजारनी पड़ रही है, वे और उन पर आश्रित परिवारजन संविधान दिवस के जश्न में सिर्फ इसलिए सहभागी होंगे कि आज ओली की जगह प्रचण्ड ने ले ली है ? या सिर्फ इसलिए कि अब सड़कों पर आन्दोलन या नाकों पर कोई अवरोध नहीं है ? या सिर्फ इसलिए कि प्रचण्ड संविधान संशोधन की बात करने लगे हैं ? ये और ऐसे सभी प्रश्नों के उत्तर अब तक नकारात्मक ही आयेंगे ।

इसलिए हम उम्मीद करते हैं कि इस बार के संविधान दिवस के अवसर पर इसके सबल और दुर्बल पक्ष पर चर्चा हो जो अन्धराष्ट्रवादियों को मंजूर नहीं । इस संविधान का संशोधन हो यह भी उन्हें मंजूर नहीं । तो शायद जो उन्हें मंजूर है उसी दिशा में अगर प्रचण्ड सरकार भी अग्रसर है तो बेकार का ढिंढोरा क्यों पीटा जा रहा है संविधान संशोधन का ? लेकिन याद रहे अगर संविधान का समुचित संशोधन यानी उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के मुद्दे अगर संबोधित नहीं हुए तो कोई चुनाव संभव नहीं है । साथ साथ अगर ऐसा हुआ तो इस संविधान का कार्यान्वयन कदापि संभव नहीं होगा ।
किंतु बात सिर्फ उतनी ही नहीं है । प्रचण्ड यह भी नहीं भूलें कि माओवादी केंद्र तत्कालीन एमाओवादी के तहत बाँकी घटकों के आत्म–समर्पण का परिणाम नहीं है । बल्कि सभी की असफलता का परिणाम है जिन में एमाओवादी की असफलता सब से अधिक थी । इतना ही नहीं, तीसरे मधेश आन्दोलन में सिर्फ मधेशवादी कहेजाने वाले लोग ही नहीं थे किंतु माओवादी केंद्र का एक सशक्त घटक तत्कालीन नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) और उसके संयोजक मातृका यादव के नेतृत्व में ही रही संयुक्त मधेशी राष्ट्रीय आन्दोलन समिति भी आन्दोलन में सहभागी थीं । इस पार्टी के महोत्तरी के विद्यार्थी नेता राम विवेक यादव की भी मधेश आन्दोलन में बलि चढ़ गई । हमारे दर्जनों साथी अब तक कई झूठे मुकद्दमें में पिसे जा रहे हैं । तो जब हमने आत्म–समर्पण नहीं किया है, हमारे मुद्दों का सम्बोधन नहीं हुआ है और माओवादी केंद्र का आधार पत्र में आन्तरिक औपनिवेशिकता को समाप्त करने, राष्ट्रीय आत्म–निर्णय का अधिकार सुनिश्चित करने, मधेश आन्दोलन का संबोधन करने के वादे किए गए हैं तो भला हम से यह उम्मीद कैसे की जा सकती कि हम स्वयं भी इस जश्न में सहभागी होंगे ? इसलिए हम उम्मीद करते हैं कि इस बार के संविधान दिवस के अवसर पर इसके सबल और दुर्बल पक्ष पर चर्चा हो जो अन्धराष्ट्रवादियों को मंजूर नहीं । इस संविधान का संशोधन हो यह भी उन्हें मंजूर नहीं । तो शायद जो उन्हें मंजूर है उसी दिशा में अगर प्रचण्ड सरकार भी अग्रसर है तो बेकार का ढिंढोरा क्यों पीटा जा रहा है संविधान संशोधन का ? लेकिन याद रहे अगर संविधान का समुचित संशोधन यानी उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के मुद्दे अगर संबोधित नहीं हुए तो कोई चुनाव संभव नहीं है । साथ साथ अगर ऐसा हुआ तो इस संविधान का कार्यान्वयन कदापि संभव नहीं होगा ।
इस सन्दर्भ में किसी भी हालत में यथास्थिति में संविधान कार्यान्वयन की रट जो लगाई जा रही है और कही जा रही है कि संविधान कार्यान्वयन नहीं हुआ तो शायद आसमान टूट जाए या धरती फट जाए ! किंतु माक्र्स, लेनिन और माओ के अनुयायी बतानेवालों को तो इस बात का एहसास होना चाहिए कि उत्पीड़ित राष्ट्रीयता को मुक्त किए बिना समाजवाद सम्भव नहीं । तो अगर इस संविधान से नेपाल की उत्पीड़ित राष्ट्रीयता पर जारी उत्पीड़न को निरन्तरता ही मिलेगी तब तो जरूरी यह है कि माओवादी केंद्र की ओर से संविधान संशोधन का विधेयक व्यवस्थापिका–संसद् में जाए, पारित हुआ तो बहुत ही बढ़िया, अगर नहीं हुआ तो दो रास्ते हो सकते हैंः— मौजूदा स्थिति की ही व्यवस्थापिका–संसद् का अगला निर्वाचन या खस–गोर्खाली अन्धराष्ट्रवादियों के खिलाफ निर्णायक संघर्ष । नेपाल की उत्पीडीत राष्ट्रीयता इन दोनों विकल्प के लिए तैयार हैं, देखना है शासक बदलते हैं या नहीं । किंतु नहीं बदलेंगे तो बदल दिए जायेंगे । व्

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