पहाड़ का दर्द देखकर रोता है मधेश

कभी कभी ये जिन्दगी भी, कैसे रंग दिखाती है ।
जो ना सोचा, ना चाहा वो ही हरपल सताती है ।

kailash das

कैलाश दास

Upendra yadav

भूकम्प पीडित के लिए वीरगंज में राहत संकलन कार्य में सरिक फोरम नेपाल कें अध्यक्ष उपेन्द्र यादवल लगायत के नेतागण ।

रामछोप जिला  भकूम्प पीडि़त का ेराहत प्रदान करत ेहएु सद्भावना पार्टी क नतो तथा कायर्कर्ता

रामछोप जिला भकूम्प पीडि़त का ेराहत प्रदान करत ेहएु सद्भावना पार्टी क नतो तथा कायर्कर्ता

भूकम्प पीडित के लिए राहत संकलन कार्य में सक्रिय तराई मानव अधिकार रक्षक सञ्जाल थर्ड एलायन्स के सामाजिक कार्यकर्ता

भूकम्प पीडित के लिए राहत संकलन कार्य में सक्रिय तराई मानव अधिकार रक्षक सञ्जाल थर्ड एलायन्स के सामाजिक कार्यकर्ता

‘जीवित राष्ट्र की पहचान है आन्दोलन’ ये हम नहीं हिमालिनी की सम्पादक श्वेता दीप्ति का उद्घोष है जो उन्होंने हिमालिनी के अप्रील अंक में लिखा था । सही मायने में ये शाश्वत सत्य है । जिसे नकारा नही जा सकता । आन्दोलन के जरिए ही हमने लोकतन्त्र प्राप्त किया । आन्दोलन के जरिए हमने ढाई सौ वर्ष पुराने राजतन्त्र को समाप्त किया और आन्दोलन के जरिए ही आज मधेस और मधेसी को विश्व पहचानने लगा है । मधेस की समस्याएँ विश्व विरादरी के बीच चर्चा का विषय बना है । नेपाली राज्य सत्ता और काठमाण्डूवासी जिसे मधेसिया, मर्सिया और धोती कहते थे, वे आज मधेसी का सम्मान करने को विवश हैं । चाहे वह सम्मान उपर के मन से ही क्यों ना हो । ऐसे तो कुछ कथित कलमवाज मधेस आन्दोलन को साम्प्रदायिकता से जोड़कर भी देख रहे हैं । परन्तु इसे नकारा नही जा सकता कि मधेस आन्दोलन का मूल मर्म संघीयता, समानुपातिकता और समानता का अधिकार को प्रतिस्थापित करना था । लोकतन्त्र में संघीयता, समानुपातिकता और समानता राष्ट्रीय एकतारूपी पूल का सब से मजबूत खम्भा है । जिस पर राष्ट्रीय एकतारूपी महल खड़ा होता है । कारण सबको मालूम ही है जहाँ विभेद होगा वहाँ आन्दोलन होगा और आन्दोलन सिर्फ जीवित लोग ही करते हैं । देश में महाभूकम्प आया ये अच्छा तो नहीं हुआ लेकिन आज यह राष्ट्रीय एकता का जीवंत उदाहरण बन गया है । पहाड़ में आये भूकम्प के कारण मधेशी—पहाड़ी के बीच वर्षों से चलता आ रहा आरोप—प्रत्यारोप, विभेद, राजनीतिक द्वन्द्व कम हुआ है । संकट की इस घड़ी में आपसी विभेद भूल जाना ही सबसे बड़ा विषय है और बड़े गर्व की बात भी है । जब तक मानव जिन्दा रहेगा तक तक हम एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप, विभेद या राजनीतिक हस्तक्षेप कर सकते है । संकट की घड़ी में ही अपने और पराए की पहचान होती है । अपने पहाड़ी भाइयों के दुःख के इस घड़ी में मधेशी जनता ने दिखा दिया है कि हम एक हैं ।
२०७२ बैशाख १२ गते ११ बज कर ५७ मिनट में एक ऐसी तबाही मची की क्षण में नेपाल अस्त व्यस्त हो गया । सब के सब स्तब्ध रह गये । पति—पत्नी से विछड गया, माँ बेटा अलग हो गए । बूढ़ा,  जवान, महिला, पुरुष बच्चा किसी को प्रकृति ने नही बख्शा । सड़कें फट गयीं, महल ध्वस्त हो गए । न रहने के लिए घर बचा और न ही खाने के लिए अन्न । यहाँ तक की सर ढकने लिए छत तक नही रही । इतिहास के पन्नों में झाँकने से हमे मालूम होगा की नेपाल का यह दूसरा सबसे बड़ा विनाशकारी महाभूकम्प है । वि.सं. १९९० में ८.४ रेक्टर स्केल का भूकम्प आया था जिसमें करीब ८ हजार ५ सौ १९ की मृत्यु हुई थी । हजारों घायल और ६ लाख घर विहीन हुए थे । वही २०७२ में ७.९ रेक्टर के महाभूकम्प में करीब २० हजार लोगों की मौत होने का अनुमान है तो लाखों घायल हैं । कितनों की भौतिक संरचनाएं ध्वस्त हुई इसका अनुमान लगाना मुश्किल है । बस इतना कहा जा सकता है कि इस विपदा से उबरने के लिए हमें दशकों लग जाएँगे ।
नेपाल की राजधानी शुरू से ही काठमान्डौ रही है । राजधानी वैसीे जगह पर बनाई जाती है जो सबसे सुरक्षित जगह हो । जहाँ अच्छे व्यवसाय, गुणस्तरीय शिक्षा और अच्छा वातावरण हो ।  वहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता और प्राशानिक सुलभता के कारण नेपाली जनता काठमाण्डू को अपना पहला गन्तव्य बनाने लगे । लोग काठमाण्डू में जमीन खरीद कर घर बनाने लगे । लेकिन महाभूकम्प से कुछ ही क्षणों में ऐसा हादसा हुआ की सभी का सपना टूट गया । तराई के जिलों में बहुत कम असर पड़ा है, परन्तु पहाड़ की न तो धरती स्थिर हुई है और न ही वहाँ के लोग । काठमाण्डू सहित पहाड़ के एक दर्जन जिले में अभी भी त्राहिमाम मची है । भूकम्प प्रभावित क्षेत्रों में पीडि़तो को तो खाना पीना और औषधि तो दूर, सर ढकने के लिए पाल, त्रिपाल भी नही मिल रहा है । भूकम्प प्रभावित क्षेत्र की जनता बिलकुल असहाय बनी है और सरकार नीन्द से सोयी हुई है ।
स्रोत, साधन, जनशक्ति और सामूहिक परिचालन की दृष्टि से देखा जाए तो नेपाल सब कुछ में सामथ्र्यवान है । लेकिन सामथ्र्य होते हुए भी असफल दिखता है । ऐसी विपत्ति की घड़ी में सरकार को अभिभावक की भूमिका निर्वाह करनी चाहिए थी । इतना बड़ा हादसा होने के बाद भी काँग्रेस एमाले के संयुक्त सरकार ने ६ घण्टे बाद सरकार की बैठक बुलायी । उसमें भी जनता को सान्त्वना और भरोसा देने की बात कहीं नहीं उठी, केवल ‘राष्ट्रीय विपत्ति’ की घोषणा की गयी ।
एक और सबसे बड़ी बात यह है कि जनता के अधिकार के वास्ते हमेशा बन्द हड़ताल, नारा जुलुस, तोड़फोड़ करते आ रहे राजनीतिक दल भी ऐसी विपत्ति की घड़ी में सान्त्वना तक नही दे सके । संकट में जनता को सान्त्वना देना और जनता के बीच रहना और उसमें उर्जा  जगाने वाली भूमिका राजनीतिक दलों की होतीं है । परन्तु शब्दो में भी कि हम जनता के साथ हंै यह भी नहीं कह सके । किसी भी दल का नेता अभिभावक नही बन पाया । सबके सब तमाशबीन बने रहे । जब कि इस विपदा की घड़ी में हीं नेतृत्व की पहचान होती है । समाज में सुषुप्त अवस्था में रही शक्ति को जगाने का कार्य उनका होता है । किन्तु दल के नेता भी त्रसित दिखे । राज्य ही नही राज्य बनाने वाले सामाजिक, राजनीतिक तत्वों के अभाव को जनता ने महसूस किया ।
नेपाल के सबसे बड़ी विपत्ति की घड़ी में भारत का सहयोग अतुलनीय रहा । महाभूकम्प को २४ घण्टा भी नही बीता कि उद्धार टोली नेपाल आ चुकी थी । यहाँ की सरकार और राजनीतिक दल अपने बचाव में लगे थे और भारतीय सेना एवं उद्धारकर्मी टोली नेपाली जनता की उद्धार में । वैसे नेपाल को केवल भारत ही नही चीन, जापान, अमेरिका, पाकिस्तान, बंगला देश सहित दर्जनाें ने खुलकर सहयोग किया है जिसकी प्रशंसा करनी ही होगी । इन सभी देशों की सरकार और नागरिकों ने भी नेपाल को हरसम्भव सहयोग करने का प्रयास किया है । लेकिन नेपाल सरकार को दातृ राष्ट्र से किस प्रकार का सहयोग लेना चाहिए और किस प्रकार नहीं वह सीमा ही भूल चुका है । देश का ऐसा भी भाग होता है जो गोप्य और संवदेशनशील होता है । जहाँ राज्य के अलावा अन्य देश को वहाँ तक जाना उचित नही माना जाता है जिसे भूकम्प से लाचार सरकार प्रभाव में पड़कर यह भी ख्याल नही रख सका । ऐसे विपत्ति के समय में पड़ोसी राष्ट्र से सहयोग लेना आवश्यक होता है । परन्तु राज्य के किस क्षेत्र में कैसी सहयोग लेनी चाहिए यह भी विचारणीय है ।
फिलहाल भारतीय मीडिया के ऊपर नेपाल के कुछ मीडियाकर्मी  आरोप प्रत्यारोप लगाकर बदनाम करने पर तुले हैं । जिस समय नेपाल में आफत आयी थी उस समय विश्व को दिखाने के लिए भारतीय मीडिया ही अपनी जान जोखिम में डालकर विश्व के समक्ष प्रस्तुत हुआ । इसी परिणाम के कारण आज नेपाल को दातृ राष्ट्र द्वारा हर तरह का सहयोग मिल रहा है । नेपाल का मीडिया कितना कमजोर है यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन भारतीय मिडिया के उपर आरोप प्रत्यारोप लगाकर अपनी कमजोरी दिखा रहे हैं । हाँ, हो सकता है राजनीतिक फायदा लिया होगा । परन्तु विश्व के आगे नेपाल की परिस्थिति को भी दिखाया है ।
भूकम्प प्रभावित क्षेत्र में भूकम्प पीडि़त जनता राहत देने की घोषणा सुन तो रहे हैं लेकिन राज्य वहाँ तक राहत पहुँचा नही पा रही । ऐसी स्थिति में प्रधानमन्त्री को कड़ा निर्देशन देकर राज्य के मुख्य अंग को परिचालन करना चाहिए था । यह समय कागजी प्रक्रिया और क्षेत्राधिकार में उलझने का नहीं है । राज्य जितना असफल सिद्ध होगा राष्ट्रीय संकट को दूसरा चक्रव्यूह प्रारम्भ हो जाएगा ।
संकट की घड़ी में राज्य ने नेपाली जनता बीच जिस प्रकार का एकद्वार प्रणाली बनायी है वह सबसे दुःखद है । यह सही है कि भूकम्प का सबसे ज्यादा चोट पहाड़ में रहने वाले नेपाली ने खायी है । लेकिन दर्द सबसे ज्यादा मधेशी जनता को हुआ है । भारतीय मीडिया ने जिस प्रकार से भूकम्प का दृश्य दिखाया है उसे देखकर ऐसा एक भी मधेशी नही होगा जिसकी आँखें न रोई हों ।
भूकम्प प्रभावित क्षेत्र में राहत वितरण के लिए मधेश के प्रायः सभी घरो ने सहयोग किया है, और करना भी चाहिए । मधेश की स्थानीय संघ संस्था, उद्योग वाणिज्य संघ सहित सैकड़ौं ने जहाँ सरकार की आवाज तक नही पहुँची वैसे दुर्गम क्षेत्र में मधेश ने अनाज पहुँचाया है । मधेसी जनता विपदा में पड़े अपने पहाड़ी भाईयों के लिए नमक से खून तक देने को तैयार है । नेपाल भारत मैत्री युवा संघ के केन्द्रीय अध्यक्ष सभासद महेन्द्र यादव कहते हैं—‘ जब पहाड़ रोता है तो मधेस भी रोता है । ये राष्ट्रीय एकता का सुन्दर उदाहरण है । राज्य को चाहिए कि इस सद्भाव को बरकरार रखें ।’ सभासद महेन्द्र यादव के नेतृत्व में सिंधुली के भूकम्प प्रभावित क्षेत्र में  राहत भी वितरण किया गया था । राजनीतिक लड़ाई अधिकार की होती है और मौलिक अधिकार भी है । लेकिन मानव बीच सदा सर्वदा सम्बन्ध बने रहे ऐसा सम्बन्ध कायम रखने लिए मधेशी जनता का यह सहयोग स्मरणीय रहेगा ।
विपत्ति की घड़ी में सरकार ने राहत वितरण में जो एकद्वार प्रणाली लगाई है यह भूकम्प प्रभावित क्षेत्र एवं पीडि़त जनता के लिए सबसे बड़ी घातक है । यह खारिज होनी चाहिए । संकट में सहयोग की आवश्यकता होती है न कि एकद्वार प्रणाली की । काठमाण्डू में भूकम्प प्रभावित क्षेत्रों के लिए यह प्रणाली सम्भव है क्योंकि वह सैकड़ौं दातृ राष्ट्र पहुँचे हुए हैं । वही दोलखा, ओखलढुंगा, रामेछाप सहित बहुत सारे ऐसे दूर्गम क्षेत्र हैं जहाँ अभी तक राज्य का कोई निकाय नही पहुँचा है ।
पहाड़ में आए विपत्ति में हाथ बंटाने के लिए अभी मधेस के सभी जिलों के युवा सक्रिय हैं । कोई राहत संकलन में तो कोई रक्तदान में । लाखों क्वीन्टल चूड़ा, दालमोट, चावल, नमक, चीनी, चाउचाउ, हजारों त्रिपाल और पीने का पानी मधेस से पहाड़ भेजा जा रहा है । दुःख की घड़ी में सभी नेपाली एकाकार हो रहे हैं जिसे अत्यन्त सकारात्मक मानना चाहिए । वरिष्ठ पत्रकार श्याम सुन्दर शशी के अनुसार यह समय टीका टिप्पणी का नहीं है । राष्ट्रीय एकता का सन्देश देने की आवश्यकता है । विपदा की घड़ी में मधेशी पहाड़ी की पहचान नही नेपाली होने का पहचान बनाना है । मधेश का धनुषा, महोत्तरी, सर्लाही, सिरहा, वीरगञ्ज,राजविराज सहित के जिलों से करोड़ों की राहत सामग्री संकलन कर जिस प्रकार का सहयोग भूकम्प प्रभावित क्षेत्र में भेजा गया है ऐसी ही एकता राष्ट्र विकास में बनी रहे इससे सम्पन्न राष्ट्र की पहचान बनेगी ।
हिन्दी चलचित्र का एक गीत ‘चोट लगे तुझको तो दर्द मुझे होता है’ यह आज मधेश ने साबित कर दिया है ।

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