पहाड़ के दर्द में मधेश साथ था परन्तु आज मधेश में मौत का मंजर जारी है : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू , २६ ,अगस्त ,२०१५ |

upendraइतिहास साक्षी है कि युद्ध के बाद का मंजर दोनों ओर एक सा होता है । परिजनों की आह एक सी होती है, चुल्हे एक से बुझते हैं, आँखें एक सी रोती हैं । टीकापुर में जो हुआ निःसन्देह वह निन्दनीय है । बात सिर्फ एक तरफ के क्षति की आ रही है किन्तु यह विश्वास करने योग्य नहीं है कि दूसरी ओर कम क्षति हुई है । परन्तु यह शासकीय व्यवस्था है, जहाँ प्रायः ऐसी बातें दबा दी जाती हैं । किन्तु मसला यह नहीं है कि क्षति कितनी हुई मसला यह है कि क्यों हुई ? हर रोज घायलों और मृतकों की संख्या बढ रही है । मौत का मंजर जारी है । इसके पहले मैंने लिखा था कि क्या नेतागण लाशों के ढेर देखना चाहते हैं ? आज तो यह अभिलाषा भी पूरी हो गई और आगे के लिए राहें भी खुल गई हैं । देश की जिम्मेदारी अगर सबसे अधिक होती है तो गृहमंत्रालय की । किन्तु फिलहाल जो आनन फानन में गृहमंत्री वक्तव्य जारी कर रहे हैं, उसमें उनकी अदूरदर्शिता ही दिख रही है और शायद यही वजह है कि पड़ोसी राष्ट्र भारत भी उनसे स्पष्टीकरण माँग बैठा । उन्होंने कहा कि दक्षिण की ओर से बड़ी संख्या में जमात आई और उसने इस नृशंस कार्य को अजांम दिया । बिना किसी जाँच के यह andolanआरोप लगाना कितनी बचकानी हरकत है । यह दो राष्ट्रों के बीच के सम्बन्धों पर सीधा असर डाल सकता है और एक बार फिर पूर्व की भाँति अप्रिय घटना की पुनरावृत्ति हो सकती थी । अफरातफरी में सेना परिचालन का निर्णय ले लिया गया बावजूद इसके समुदाय विशेष के घरों और व्यवसायों को जलाने की घटना घटी है । उनके परिवार छिपते फिर रहे हैं । यह किस बात का संकेत है ? क्या यह सोची समझी नीति के तहत नहीं किया जा रहा ? क्या इन बातों से आग को और भड़काने की कोशिश नहीं की जा रही ? निषेधाज्ञा और सेना गश्ती के बावजूद अगर यह घटना घटी है तो यह सवाल सुरसा की तरह मुँह बाए खड़ा है कि फिर सेना की तैनाती का औचित्य क्या है ? क्या सिर्फ एक समुदाय विशेष को डराने के लिए और उसकी आड़ में अपनी मनमानी करने के लिए ? सेना तैनात कर के क्या एक पूरे समुदाय के असंतोष को दबाया जा सकता है ? मान लिया जाय कि बातें कुछ क्षण के लिए शांत हो भी जाय किन्तु क्या मन का असंतोष शांत हो पाएगा ? आग ऊपर से राख का ढेर हो जाती है पर चिन्गारी उसमें शेष रहती है जो सिर्फ एक अनुकूल हवा से भड़क सकती है ।

gaurदेश आज जिस द्वन्द्ध की आग में जल रहा है क्या यह आग नेताओं ने नहीं सुलगाई है ? अंतरिम संविधान की अनदेखी करना, जनता की भावनाओं को अनदेखा करना और दमन की रणनीति अपनाना क्या इस असंतोष का कारण नहीं है ? इन सारी बातों का जन्म एक दिन में तो नहीं हुआ है । कहाँ हैं देश के मसीहा जिन्होंने सुखद सपना दिखाया था ? जातीयता और पहचान की आग जलाकर रोटी सेकने वाले हाथ क्या देश की इस हालत के जिम्मेदार नहीं हैं ? आज इतने दिनों से पूरा प्रदेश सुलग रहा है किन्तु सत्ता पक्ष की ओर से कोई मजबूत पहल नहीं हो रही । संविधान किसके लिए बन रहा है ? समग्र नेपाली जनता के लिए या सिर्फ उनके लिए जो आज तक शासक वर्ग ही रहे हैं ? क्या इस संवेदनशील माहोल में संविधान प्रक्रिया को रोक कर वार्ता की अपेक्षा सत्ता पक्ष से नहीं की जानी चाहिए ? स्वार्थ की राजनीति की आग में हमेशा से जनता और सुरक्षाकर्मी ही होम होते रहे हैं । बहुत दिन नहीं हुए जब जनआन्दोलन के नाम पर हर रोज निर्दोष जनता और सुरक्षाकर्मियों की मौत होती थी । आज भी लापता लोगों की लम्बी सुचि है जिनकी कोई भी जानकारी सत्तापक्ष नहीं दे पा रही है और देश एक बार फिर उसी पीड़ा को झेलने की राह पर है । हिंसा ने कभी किसी का भला नहीं किया है । आन्दोलन की आवाज को रोकने के लिए राजनीति का गन्दा और विभत्स खेल बन्द करें और अपनी स्वस्थ मानसिकता का परिचय दें नेतागण आम जनता सिर्फ यही चाहती है ।

काठमान्डू के दो दिनों की बन्दी में कुछ संस्था ऐसी हैं जो बैनर लेकर खड़े थे जिसमें लिखा था नेपाल खुला है । क्या नेपाल सिर्फ काठमान्डू है ? बन्द की मार मधेश पिछले सप्ताह से झेल रहा है । वहाँ की जनता भी भूखी रह रही है, बच्चे शिक्षा से वंचित हैं, दैनिक कमाने वाले मजदूर भाई, यातायात संचालन करने वाले व्यवसायी सभी पीड़ित हैं क्या उनकी तकलीफ काठमान्डू की नहीं है ? पहाड़ के दर्द में मधेश साथ था परन्तु आज वह अपने दर्द में अकेला है । मधेश वही तो माँग रहा है जिसपर पूर्व में समझौता हो चुका है । आज मधेश की आवाज में पहाड़ की आवाज क्यों नहीं मिल रही ? भाईचारे की सीख सिर्फ एकपक्षीय क्यों ? इस विश्लेषण की जरुरत है । देश सुलग रहा है ऐसे में आपसी सद्भाव और संयम की आवश्यकता है न कि उकसाऊ फिकरे और तानों की । समय अब भी है । सत्ता चाहे तो असंतुष्ट पक्ष को सम्बोधित कर हालात को सुधार सकते हैं ।

श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति

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