पहाड़ पर हावी चीनी सोच ने मधेश की माँग को भारत की माँग बना दी है : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति, काठमांडू , ७ अक्टूबर | आखिर हमारे सर्वमान्य नेतागण क्या चाह रहे हैं ? जितनी तत्परता से ये भारत के विरुद्ध मोर्चाबन्दी करने में लगे हुए हैं अपनी बेतुके आरोपों से, अगर उतनी तत्परता देश की समस्या के समाधान में दिखाते तो शायद आम जनता राहत की साँस ले पाती । ५२/५३ दिनों के बाद भी क्या इन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि अगर अपने आन्तरिक मामलों को सुलझा लेंगे तो बाहरी व्यवधान स्वयं समाप्त हो जाएगा । कूटनीतिज्ञ जितनी गम्भीरता से यह सुझाव दे रहे हैं कि नाकाबंदी के मुद्दे का अन्तरराष्ट्रीयकरण किया जाय, वो यह सलाह क्यों नहीं दे रहे कि पहले देश के असंतुष्टों को संतुष्ट किया जाय । नाकापर नेपाल के नागरिक बैठे हुए हैं, आखिर वो क्यों बैठे हैं, क्या अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की निगाह वहाँ नहीं होगी ? या वो सिर्फ वही देखेंगे जो हमारे नेता दिखाना चाह रहे हैं ? अपनी कमजोरियों को न देखकर, आत्मविश्लेषण न कर, दूसरों को दोष देकर यह देश कब तक चलेगा ? मधेश की माँग नई तो नहीं है ? जिसे सम्बोधन करने के लिए इन्हें इतनी कठिनाई हो रही है ।

बीरगंज-रक्सौल सीमा , photo jahangast

अन्तरराष्ट्रीय समुदाय क्या देश के एक हिस्से में जो हो रहा है उससे अनभिज्ञ होगा ? और मान लिया जाय कि उन्हें नाका पर बैठे मधेशी नहीं दिखते होंगे पर क्या हमारे दैनिक पत्र पत्रिकाओं और संचार मीडिया को भी अपने ही देश की जनता सीमा पर नहीं दिख रही है ? जो बस एक राग अलाप रहे हैं कि भारत ने नाकाबंदी की है, इसलिए भारत को अन्तरराष्ट्रीय अदालत में लाया जाय । ठीक है यह भी कर लो किन्तु अस्त व्यस्त देश को तो सुधार लिया जाय पहले । पर्दे के पीछे की बात हर कोई जानता है, किन्तु जो सामने दिख रहा है उसका क्या किया जाय ? क्या वहाँ बैठी जनता के ऊपर गाड़ी चला दी जाय ? वैसे प्रशासन तो कोई कमी नहीं ही छोड़ रही, कभी लाठी चार्ज, तो कभी आधी रात में आन्दोलनकर्मियों पर प्रहार, हाँ अभी अगर कुछ नहीं हो रहा है तो वह है फायरिंग । जिस निर्ममता के साथ शुरुआत में दमन किया गया उस पर अंकुश लगा हुआ है । किन्तु कितने मजे की बात है कि उस समय यह बात न तो राष्ट्रीय समुदाय को समझ आई और न ही अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को और तो और मानवाधिकार भी मुखर नहीं हो पाया । कहीं से कोई जिम्मेदार वक्तव्य नहीं आ रहा सिवा आरोप प्रत्यारोप के । आखिर कब तक अपनी कमजोरियों का नजरअंदाज किया जाएगा ? ठीक है कूटनीतिज्ञों की दृष्टि में अगर भारत ने अघोषित नाकाबंदी कर के आधुनिक सभ्यता, मूल्य सिद्धान्त, अन्तरराष्ट्रीय अधिकार, दो देशों के बीच हुए संधि, समझौता को चुनौती दी है, तो उसे भी जवाब देना चाहिए क्योंकि नेपाल एक स्वतंत्र राष्ट्र है और उस पर कोई नजर नहीं उठा सकता । भारत के भी अपने तर्क होंगे अपने पक्ष में, किन्तु अभी जो देश की परिस्थिति है उसमें सबसे पहली जरुरत क्या है ? पड़ोसी देश की नीयत पर बहस करना या जिसकी वजह से यह परिस्थिति बनी है उसे दूर करना ।

जनसंख्या के आधार में सीमांकन, राज्य के निकायों में समानुपातिक समावेशी, सेना में मधेश की सहभागिता , संघीय प्रदेश को आत्मनिर्णय का अधिकार और अंगीकृत नागरिकता का मसला ये कुछ विशेष माँगें हैं मधेश के । अगर इसमें से नागरिकता के मसले को हटा दिया जाय कुछ समय के लिए, तो बाकी मुद्दों पर ईमानदारी के साथ बहस कर के इसका समाधान नहीं निकाला जाना चाहिए ? जबकि इन सारे मुद्दों पर सहमति पहले हो चुकी है तो आज इसे इतना भयावह क्यों बना दिया गया है ? मधेशी, थारु, जनजाति, मुस्लिम सदियों से अवहेलित हैं । जब तक चुप थे सब शांति से चल रहा था । किन्तु जैसे जैसे इन्हें अपने अधिकारों का अहसास हुआ वैसे वैसे खसवादी अहं चिन्तित होता चला गया । अपने हाथों से सबकुछ फिसल जाने का डर उन्हें तानाशाह बना रहा है । मधेश की माँग को आज भारत की माँग बना दी गई है । तो क्या ये माना जाय कि पहाड़ की सोच पर चीन हावी हो रहा है ? खैर ये कूटनीति की बातें हैं, जो चलती रही हैं और आगे भी चलती रहेंगी । किन्तु सत्ता जनता के लिए होती है, इसलिए कोरी भाषणबाजी और अहम् का प्रदर्शन करने की बजाय जनता और देश की स्थिति पर गम्भीरता से ध्यान दें तो बेहतर होगा । किन्तु विडम्बना तो यह है कि ये कुर्सीपरस्त अधिक हैं । डेढ महीने से देश को जिस राह पर इन्होंने धकेला है वह स्वयं इनके द्वारा निर्मित है और अगर थोड़ी उदारता और तत्परता दिखाएँ तो समस्या का समाधान भी निकल सकता है ।

आज के परिप्रेक्ष्य में अधिकार और अस्मिता की पहचान आम जनता को हो गई है । तानशाही कुछ वक्त के लिए भले ही मनोबल को कमजोर कर दे, किन्तु यह वह बीज है जो एक बार अगर जम गई तो कभी सूखती नहीं । जरा भी समय अनुकूल हुआ तो प्रस्फुटित हो जाती है । मधेश ने अपना मनोबल गोलियों के सामने डटकर और बृहत मानव श्रृंखला के रूप में विश्वपटल पर दाखिल करा लिया है । अब इसे न तो नकारा जा सकता है और न ही नजर अंदाज किया जा सकता है, इस बात को अब भाग्यविधाताओं को भी समझ लेना होगा ।

 

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