पा“च महीने से सुलगता मधेश

यही कारण है कि जब–जब समाधान की जमीन पर थोड़ी सी हरियाली पनपने की आशा लोगों में संचारित हुई है, तब–तब सरकार या इसके सन्यन्त्रों के द्वारा ऐसी दमनात्मक कार्रवाइयाँ हुई हैं कि इससे नवांकुर पर तुषारापात हुआ है और समस्या आज भी जैसी की तैसी अवस्था में है
मधेश आन्दोलन ने एक बात तो साफ कर दिया है कि पूरा राष्ट्र वैचारिक स्तर पर दो भागों में विभाजित है । एक का सही दूसरे के लिए गलत है ।

कुमार सच्चिदानन्द :तराई आन्दोलन के पाँच महीने गुजरने को हैं और शायद नेपाल के इतिहास में यह अपनी तरह का पहला आन्दोलन है । लेकिन इन पाँच महीनों के आन्दोलन का अब भी कोई अर्थ नहीं निकल पाया है और यह अब भी जारी है । लेकिन इसके साथ ही इसके मूल्यांकन का दौर भी जारी है । एक पक्ष ऐसा है जो इसकी निरर्थकता को सिद्ध करने के लिए तुला हुआ है । उनके पास सदियों से भोग रहे सत्ता और सुविधा का अहंकार और इसे निरन्तरता देने के लिए शस्त्रास्त्र हैं । जबकि दूसरा पक्ष इसे किसी भी रूप में न तो निरर्थक मानने के लिए तैयार है और न ही और न ही इसे निरर्थक होने देने के लिए तैयार हैं । वे अपने कुण्ठित अधिकार के यथार्थ को किसी भी रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं । यह भी सच है कि आन्दोलन के लम्बा खींचने के कारण चिंगारी पर थोड़ी सी राख जमी है दिखलाई देती है लेकिन हवा का एक हलका सा झोंका उसकी दाहकता स्पष्ट कर देता है । यह सच है कि देश के राजनैतिक रंगमंच पर चल रहे इस घटनाक्रम के नेपथ्य में इसे असफल करने के जितने प्रयास हो रहे हैं, शायद उतना इसे सम्बोधित करने के प्रयास नहीं हुए हैं । यही कारण है कि जब–जब समाधान की जमीन पर थोड़ी सी हरियाली पनपने की आशा लोगों में संचारित हुई है, तब–तब सरकार या इसके सन्यन्त्रों के द्वारा ऐसी दमनात्मक कार्रवाइयाँ हुई हैं कि इससे नवांकुर पर तुषारापात हुआ है और समस्या आज भी जैसी की तैसी अवस्था में है । लेकिन एक बात तो साफ है कि इस सन्दर्भ में शासन का जो दमनात्मक मनोविज्ञान है और दूसरी ओर मधेश को अपने अधिकार और अस्मिता के प्रति जो आग्रह है उससे समस्या का पूर्ण समाधान होना संभव नहीं । मधेश समानता की भूमि पर जब तक अपने को स्थापित नहीं कर लेता तब तक उसके असंतोष की चिंगारी किसी न किसी रूप में सुलगती रहेगी और किसी भी क्षण यह दाहक स्वरूप ले सकती है जिसमें देश की शाँति और विकास जैसी आधारभूत बातों की जलकर राख होने की संभावना निरन्तर बरकरार रहेगी ।

लगभग पाँच महीने के इस आन्दोलन से यह स्पष्ट है कि यह अपने परिणामों में चाहे अद्र्धसफल हो या असफल (पूर्ण सफल होने की संभावना नहीं) लेकिन चेतना की एक लहर जो इसने पैदा की है उसे देखकर साफ–साफ कहा जा सकता है कि चाहे दशकों की साधना ही क्यों न लगे, मुकाम तो यह प्राप्त करेगा ही । इस आन्दोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि यह आन्दोलन न तो सिर्फ शहर केन्द्रित रहा है और न ही सिर्फ कार्यकर्ताओं और भाड़े पर लाए गए महज कुछ लोगों की सड़कों पर नुमाइश । इसकी धमक गाँवों तक भी पहुँची है और बच्चा–बच्चा जागरण की चेतना से सराबोर है और अपने स्वत्व की रक्षा के लिए सड़कों पर निकलकर कट मरने के लिए तैयार भी है जिसका प्रमाण भी इस आन्दोलन में लोगों ने दिया है और हँसते–हँसते दर्जनों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी है तथा सैकड़ों लोग घायल अवस्था में स्वास्थोपचार कर रहे हैं । आज एक वर्ग ऐसा भी है वे चाहे जिस किसी अन्दाज में कहें लेकिन इतना कहते हैं कि आखिर इस आन्दोलन की माँग क्या है ? उनके लिए एक ही बात कही जा सकती है कि मधेश में आज ऐसे भी लोग हैं जो यह नहीं जानते कि चल रहे मधेश आन्दोलन की माँग क्या है मगर वे उसी अन्दाज में इतना ही जानते हैं कि राज्य द्वारा उनके साथ विभेद किया जा रहा है और इसे मिटाने के लिए वे किसी हद तक जाने को तैयार हैं ।
मधेश आन्दोलन ने एक बात तो साफ कर दिया है कि पूरा राष्ट्र वैचारिक स्तर पर दो भागों में विभाजित है । एक का सही दूसरे के लिए गलत है । एक जिस संविधान को महिमा मण्डित कर विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है, दूसरे की दृष्टि में उसकी जगह रद्दी की टोकरी में है और बिना महत्वपूर्ण संशोधनों के वह स्वीकार्य नहीं है । लेकिन सरकार और इसके दृष्टिकोण से सहमति रखनेवालों की सबसे बड़ी समस्या है कि राष्ट्रवाद के नाम पर वह मधेश को कुछ देने के मनोविज्ञान में नहीं । दूसरे शब्दों में कहें तो कहा जा सकता है कि विभेद का जो ताना–बाना अतीत में बुना गया, उसे निरन्तरता देने के लिए वे संकल्पित हैं । यही कारण है कि चरम अभाव को झेलकर भी राजधानी में असंतोष की जो लहर उत्पन्न होनी चाहिए, वह नहीं देखी जा रही है । लेकिन यह इस आन्दोलन की विशेषता रही कि तथाकथति राष्ट्रवादियों की जमात से ही राजनीति, पत्रकारिता एवं अन्यान्य वैचारिक क्षेत्रों में ऐसे लोग उभर कर सामने आए हैं जो मधेश की पीड़ा और अपमान को समझते हैं, उसके आन्दोलन को वैध ठहराते हैं और उसकी माँगों के पक्ष में आवाज भी उठाते हैं । यही आवाज आगामी दिनों में नेपाल की दिशाहीन राजनीति को ऐसी जमीन दे सकती है जहाँ सहिष्णुता, समानता और शाँतिपूर्ण सहअस्त्वि के पौधे पनप सके ।
इस आन्दोलन का एक महत्वपूर्ण आयाम यह भी सिद्ध हुआ है कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नेपाल एक द्वन्द्वग्रस्त राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ है । यह सच है कि विगत २७ वर्षों में इस देश में किसी न किसी रूप में ऐसे आन्दोलन होते रहे हैं जिसने गम्भीर रूप में देश के भौतिक हितों को प्रभावित किया है । मधेश आन्दोलन भी उसी की एक कड़ी है । यह भी सच है कि मधेश के नाम पर यह पहला आन्दोलन नहीं है । इससे पहले भी इसने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी आवाज पहुँचाने का सफल प्रयास किया है । लेकिन यह आन्दोलन चूँकि लम्बा चल रहा है और अद्र्ध नाकाबन्दी के दौर से भी गुजर रहा है और इसका अन्तर्राष्ट्रीयकरण करने में नेपाल की सरकार भी कोई कसर नहीं छोड़ी है, जिससे न केवल आम लोगों का जीवन प्रभावित हुआ है बल्कि देश की अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित हुई है और देश का समग्र विकास की दर भी प्रभावित हुई है । इन सारी नकारात्मक अवस्थाओं ने लगभग पूरे विश्व का ध्यान अपनी ओर खींचा है और वे मधेश की समस्याओं से अवगत हुए हैं । इसका एक सकारात्मक पक्ष तो देखा जा सकता है कि आज राजनीति की चाल और कुचालों के बीच चाहे जीत किसी भी पक्ष की क्यों न हो मगर इतना साफ है कि अगर मधेश के मुद्दों का समाधान नहीं हुआ तो कल के दिनों में यह नेपाल के लिए अन्तर्राष्ट्रीय दबाब का आधार हो सकता है । सरकार चाहे किसी भी दल का क्यों न हो, वह वह पूरी तरह इसकी अवहेलना नहीं कर सकती क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था का एक मुख्य आधार विदेशी सहयोग भी है ।
इस बात को चाहे हम मन से मानें या बेमन से लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि नेपाल की राजनीति पर भारतीय कूटनीति का गहरा प्रभाव रहा है । इससे निकलने के लिए चाहे जितनी करवटें मारी जाए लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी जड़ें इतनी गहरी है कि इससे निकल जाना असंभव नहीं तो गैर मुश्किल जरूर है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मधेश अब इन मुद्दों पर भारतीय दृष्टि का खुलेआम पक्षधर है । इसके जो विभिन्न पारम्परिक आधार हैं, उसे तोड़ पाना किसी भी सरकार के लिए असंभव है । आज अवस्था यह है कि राजधानी या उसकी संवेदना से जुड़े लोग भारत की चाहे जितनी तीखी आलोचना क्यों न करे लेकिन मधेश उतना ही उसका प्रबल समर्थक के रूप में स्वयं को स्थापित करता जा रहा है । आज के सन्दर्भ में यह तो कहा ही जा सकता है कि भारत की विदेशनीति के संचालनकर्ता नेपाल के इस सामाजिक और राजनैतिक यथार्थ को समझने लगे हैं । यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि अपनी पहली नेपाल यात्रा में जहाँ भारतीय प्रधानमंत्री ने ‘मधेश’ शब्द तक का उच्चारण नहीं किया था, आज मधेश आन्दोलन को संबोधित करने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारत सरकार नेपाल सरकार पर दबाब डाल रही है । यह सच है कि नेपाल का संस्थापन पक्ष उसकी लगातार आलोचना कर रहा है, यहाँ का समाचारतंत्र इस विरोध को अपना मिशन बनाए हुए है लेकिन इन सबके बावजूद मधेश के नेताओं को दिल्ली बुलाया गया और उच्च स्तरीय मुलाकातों के द्वारा उनकी समस्याएँ सुनी गई । इस तरह इस आन्दोलन ने प्रत्यक्ष रूप में भारत को अपने नैतिक समर्थक के रूप में स्थापित किया है ।
इस आन्दोलन ने एक महत्वपूर्ण सवाल और गहरा रूप से उठाया है कि जो नेता गैरमधेशी दलों और दूसरे शब्दों में कहें तो राष्ट्रीय दलों में रहकर संसद में मधेश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और मधेशविरोधी राजनैतिक दलों के नेताओं के समक्ष मध्यकालीन गुलामों की तरह मधेश विरोधी गलत–सही नीतियों को पारित और कार्यान्वित कराने में ओजविहीन होकर हाथ उठाते नजर आते हैं, उनकी राजनीति की जमीन क्या है ? यह सच है कि आज उन्हें प्राप्त अवसरों को खोने का खतरा है जो उनके स्वाभिमान पर सिर चढ़कर बोल रहा है । उनके लिए इस आन्दोलन ने गहरा सवाल पैदा किया है कि किस मुँह से वे जनता से अपने लिए समर्थन की भीख माँगेंगे ? उनकीे मौन का सबसे बड़ा कारण यह हो सकता है कि वे मधेश के इस अद्वितीय मनोविज्ञान के प्रति आश्वस्त है कि यह ऐसा समुदाय है जो अपने अधिकारों और अपने प्रति हो रहे अन्यायों की बात भी प्रखरता से करता है । विभेद के प्रति आवाज भी उठाता और आन्दोलन भी करता है । सरकारी दमनात्माक कार्रवाइयों में हँस–हँस कर लाठियाँ और गोलियाँ भी खाता है और नाकाबनदी की अवस्था में जब आवश्यक सामग्रियों की किल्लत होती है तो अपनी शाश्वत उदारता का परिचय देते हुए कंधे पर पेट्रोल, डीजल और रसोई–गैस भी पहुँचाता है । मगर ऐसे नेताओं के लिए इस आन्दोलन ने थोड़ी जटिल अवस्था जरूर पैदा कर दी है ।
यह आन्दोलन अ‍ैर इसके समानान्तर चल रहे सरकारी पक्ष द्वारा इसके अवमूल्यन, दमनात्मक कार्रवाइयाँ और उपेक्षा का लम्बा दौर एक तरह से मधेश में अलगावादी चेतना को भी संस्थापित करता जा रहा है । नेता और जनता इसके विकल्प के रूप में अलगाव की बात अब बेहिचक करने लगे हैं । लोग इतिहास के पन्ने कुरेदने लगे हैं और अलगाव के पक्ष में अपनी जमीन और तर्क तैयार करने लगे है जिसका प्रमाण इलेक्ट्रोनिक सामाजिक संजाल पर देखा और पढ़ा जा सकता है । गौरतलब है कि अलगाववादी शक्तियाँ भी देश में क्रियाशील हैं और उसके समर्थक भी आज की धूमिल वातावरण में क्रियाशील हैं । इसकी चेतना धीरे–धीरे ग्रामीण समाज में भी फैलने लगी है । जनमत संग्रह के नाम पर अलग मधेश देश के लिए अभिनयात्मक रूप से जनमत तैयार किया जा रहा है । इसलिए सरकार पर यह उत्तरदायित्वपूर्ण दबाब है कि इस आन्दोलन को यथाशीघ्र सम्बोधित कर इस नकारात्मक चेतना के फैलाव को रोकने का प्रयास करे । इस आन्दोलन की लम्बी उपेक्षा एक तरह से शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की भावना से अलग हटकर एक तरह से अलगाव की भावना को सम्पोषित करना है ।
आज की परिस्थितियाँ जटिल है । सरकार और शासनतंत्र शासन के पारम्परिक मनोविज्ञान से हटना नहीं चाहता और तराई–मधेश उस मनोविज्ञान को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं । इसका प्रमाण उन्होंने विभिन्न आन्दोलनों के द्वारा दिया । नेपाल में प्रजातंत्र की स्थापना के समानान्तर ही विभेद के विरद्ध चेतना प्रवाहित होना प्रारम्भ हुई लेकिन गणतंत्र की स्थापना के बाद इसने ऐसा वेग ग्रहण कर लिया है कि अब उसे किसी भी हाल में रोकना संभव नहीं । शासन अपने कुचक्रों के द्वारा इसे मंथर कर सकता है मगर प्रवाहहीन नहीं कर सकता । जब तक राजतंत्र था, तबतक लोगों की जुबान पर लगाम थी लेकिन आज सारा उपेक्षित समुदाय अपना स्वत्व तलाश रहा है और विभिन्न आन्दोलनों के द्वारा सरकार पर विभेदमुक्त राजनीति, शासन और समाज–निर्माण के लिए दबाब डाल रहा है । दूसरी और राजनीति ऐसी है जिसने अन्तरिम संविधान में प्राप्त अधिकारों को भी कुण्ठित करने की कोशिश की है । लेकिन अब लोगों ने संघर्ष करना सीख लिया है, तर्क और आवाज उठाना भी सीख लिया है । इसलिए कहा जा सकता है कि परम्परागत राजनीति से यह देश अब शासित नहीं रह सकता । अगर ऐसा प्रयास होता है तो प्रकृति का वरदान प्राप्त यह पर्वतीय देश आन्दोलनों का देश बनकर रह जाएगा जहाँ भूख और अराजकता के सिवा और कुछ नहीं रह जाएगी ।

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