पाण्डेजी की आलू पार्टी
मुकुन्द आचार्य

सर रामकुमार पाण्डे नामधारी एक निहायत हीं सज्जन पुरुष हैं। वे साहित्यकार हैं, प्रोफेसर हैं, सज्जन तो कहना ही पड न। औरों की नजर में वे क्या हैं, मुझे क्या पता ! लेकिन मेरी नजरों में वे पक्के सज्जन हैं।
मैं पाण्डे जी को वर्षों से झेलता आया हूँ। इधर कुछ वर्षों से वे आलू पार्टी आयोजना करते हैं, और साहित्यकारों को आलू की भेराइटी भिडकर भगा देते हैं। मैं भी गाहे-बगाहे आलू पार्टीशोभा बढाने के लिए सिर के बल दौडÞकर वहाँ पहुँचता हूँ और आलू के चप-समोसे, खीर, अचार उदरस्थ करके लौटता हूँ। मजा आ जाता है।
आलू पार्टी चाहे भालू पार्टी, जिस पार्टी साहित्यकार पहुँचते है, मेरे लिए तो वह एक पवित्र तर्ीथस्थल हो जाता है। मैं अपना साहित्यिक ‘बैट्री-चार्ज’ ऐसे ही शुभ अवसरों पर कर लिया करता हूँ, मैं अवसरवादी जो ठहरा। वैसे यह आलू पार्टर्ीीचडिÞया घर के पास में होती है। बहुत सारे कवि तो डर के मारे आते हीं नहीं है।
एक पुराने परिचित कवि जी से मैंने पूछा, आप भी मेरी तरह प्रत्येक साल इस आलू पार्टर्ीीें चार चाँद लगाने पहुँच हीं आते हैं ! कोई खास वजह –
वे कवि महोदय, जो पहले किसी ऊँचे सरकारी पद पर बैठकर नीचे की कमाई खूब खा चुके थे, धीरे से मेरे नजदीक खिसक आए और मेरे कान में फुसफुसाए- किसी से कहिएगा नहीं ! इस कार्यक्रम को सञ्चालित करने के लिए पाण्डे सर हर साल र्स्वर्ग से एक परी को ले आते हैं। आचार्य जी ! मैं तो उस परी की एक-एक अदा पर दिलो-जान निसार करता हूँ। बर्ना आजकल के साहित्यिक कार्यक्रमों में क्या रखा है। हास्य कवि गोष्ठी के नाम पर हास्यास्पद कविताएँ सुनकर बोर होना पडÞता है। साहित्यिक सरिता में सरसता रुपी नीर न हो तो आलू की खीर कौन सा तीर मार लेगी – आलू पार्टर्ीीे बजाय इसे अप्सरा पार्टर्ीीहा जाय तो अच्छा होगा। हो सके तो पाण्डे सर एक अपसरा के बजाय सहभागी हर साहित्यकार के लिए एक एक चाँद सी अप्सरा मुहैया करते और सिर्फश्रृंगार रस में कविता वाचन होता तो समा कुछ और ही बँध जाता। पर पाण्डे सर को कौन समझावें ‘ वे तो आलू के पीछे मजनू बनकर दौडते रहते हैं। कवियों के सीने में भी उछलता हुआ, लपलपाता हुआ दिवाना दिल होता है ! इस बात का एहसास उन्हें कब होगा ! मुझे तो लगता है साठ के बाद वे सठिया गए हैं। आप भी तेजी से बूढÞा रहे हैं। कुछ समझाते क्यों नहीं उनको !
मैनें कवि मित्र को डांट लगाई- राम ! राम !! भैया, आप ये क्या कह रहे हैं ! हास्यरस के माहौल में जबरन श्रृंगाररस को ठूस रहें है। पाण्डे सर हास्यरस को जिन्दा रखने के लिए जमीन आसमान एक कर रहे हैं और आप लगे श्रृंगार रस के राग अलापने ! तौबा ! तौबा !! बेसौसम की सहनाई मत छेडिÞए ! जरा अपनी भी उमर का लिहाज कीजिए !
भूतपर्ूव सरकारी नौकर अब बिलकुल नंगे हो गए, लगे मुझे डांटने, देखिए आचार्य जी ! आलू की भेराइटी खाने के लिए भले ही आप जैसे कुछ भुक्खडÞ कवि आ जाय, यह अलग बात है। हम लोग तो खातेपीते आदमी है ओस चाटने से हमारी प्यास नहीं बुझती। जिस पार्टर्ीीें कबाब और शबाब कुछ न हो वहाँ पर हम क्या भ+mख मारेंगे। हम तो मरते है, इन चार पर नाज पर, अंदाज पर, शबाबे पर। कबाब पर।
इतने में आलू अपना भेष बदल कर, अर्थात् बहुरुपिया बनकर प्लेट में सजधज कर सामने उपस्थित हुआ और कबाब-शबाब रटने वाले कवि जी खाने में टूट पडÞे, जैसे भूखा नेता देश के खजाने पर टूट पडÞता है। मन ही मन मैने खुदा से दुआ मागी- हे खुदा ! आलू की कीमत बढने न देना। नहीं तो हम गरीब लोग साहित्यिक बैट्री कैसे चार्ज कर पाएंगे। ‘आलू पार्टर्ीीके लिए गालिब का एक शेर याद आ गया-
तुम सलामत रहो हजार बरस !
हर बरस के हो दिन पचास हजार !!

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