पान खाए सैंया हमार, हमारे देश के सैंया सिर्फ पान ही नहीं कमिशन भी खाते हैं

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बिम्मी शर्मा, वीरगंज ,२७ मार्च | ईस युग के सैंया सिर्फ पान ही नहीं खाते और भी बहुत कुछ खा और पी जाते हैं । बिडी, सिगरेट, सूर्ती, खैनी, गुट्का, सिगार और शराब सभी हजम कर जाते है सैंया । खाने के बाद बडे उदार भाव से ईस युग के सैंया  काली और बदरगं दिवार को लाल बना देते हैं । जैसे उस दिवार और उसके मालिक पर कोई बडा एहसान कर रहे हों कि “मियां तुम्हारे घर की दिवार तो थुकने के भी काबिल नहीं है, वह हम हैं जो यह एहतराम कर देते हैं ।” भले उसी दिवार के बगल में ही डस्टविन क्यों न हो पर पान की पीक को दिवार में थुकने की गुस्ताखी करते हैं यह चश्मे बद्धुर ईस युग के सैंया ।
“सैंया भए कोतवाल तो अब डर काहे का ।” ईसी लिए यह आधुनिक युग के सैंया कानून को अपने पैंट के पकेट की शोभा बना कर हर जगह उसका मखौल उडाते हैं । यह सैंया हर समय कुछ न कुछ खातें या चबाते रहते हैं गाय भैंस की तरह । गाय, भैंस जुगाली करते है और हमारे सैंया पान की गिलौरी मूंह में डाल कर चबर, चबर बतियाते हैं । सैंया पान खाए बिना चैन नाहीं मिलत न ।
ईन सैयाओं के कारण ही तो सरकार के राजस्व में दिन दहाडे प्रगति होता है । ईन बेईमान सैयाओं के कारण ही तो राजकाज बेधडक बेईमानी के रास्ते पर चल रहा है । दारु की भट्टी से ले कर पनवाडी की दूकान तक ईस सैंयाओं का ही बोलबाला है । देश में यदी समानान्तर सरकार या बैठे बिठाए वुद्धि विलास करना है तो चाय की दूकान, पान की दूकानऔर दारु की भट्टी में हर रोज हाजिरी लगाइए । आप घाटे में नही रहिएगा । देश के छुटभैये और मुस्टंडे नेताओं से ले कर राजनीति कि राज की बात आपको यहीं मूफ्त में सुनने और देखने को मिलेगा । यह किताबी ज्ञान कहीं ज्यादा बढ कर है ।
हमारे देश के सैंया सिर्फ पान ही नहीं खाते कमिशन भी खा कर डकार जाते हैं । पान खा कर कम से कम पीक थुकते तो हैं कमिशन खा कर मूंह के अंदर ही हजम कर लेते हैं । यह कमिशन सिर्फ पैसा ही नहीं होता गाडी, सिमेंट, छड, रेत, ईंट, चावल, धान, पानी, शराब या और भी बहुत कुछ हो सकता है । जिसको खाने के बाद हमारे ईन सैयाओं का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता । उल्टे ईन सैंयाओं का दिनदूनी रात चौगूनी प्रगति देखने को मिलेगी । ईनका छोटा सा मकान रातों रात महल बन जाता है और टुटही साईकल मोटर साईकल या कार में परिवर्तित हो जाता है ।
हमारे देश के सैयाओं का जलपान भी बडा महंगा होता है । यह तो पांच सितारा होटल से कम में जलपान करते ही नहीं । हमारे देश की महिलाओं के आंख से जितनी लोर नहीं टपकती है उससे ज्यादातो इर्न सैयाओं के मूहं से पान की पीक या लार टपकता है । हर टोल या महल्ले में आप ईन सैंयाओं का दर्शन कर सकते हैं । जो गले में स्कार्फ बांधे, आंखों में गगल्स लगाए बडी नाजो अदा से हसीन लडकियों को ताकते रहते हैं । अब लडकी तो गाय, भैंस की तरह घांस डालने से तो पटेगी नहीं । तो ईन नेताओं के दूम छल्ले जैसे सैयाओं की दिन कटती है पनवाडी से बतियाने और पानखाने में । पर ईन सैयाओं के पास सभ्यता या मैनर्स नाम की चीज जन्मजात नहीं होती । ईसी लिए पान तो अपने पैंट के पकेट में ले कर चलते हैं पर पिकदानी नहीं । ईसी लिए यह उदारमना हो कर चहूं ओर रंगिन कर देते हैं । कहीं सूर्ती और खैनी थुक कर कहीं सिगरेट का टुकडा और माचिस की तिली जहां तहां फेक कर अपने उच्च नैतिकता और आदर्श को बयां करते हैं । ईन में से ज्यादातर सैंया ही हमारे देश की राजनीति का सिरमौर और हमनागरिकों के लिए शीर का दर्द है ।
ईन सैयाओं के जिते जागते कारनामें देखने हो तो किसी भी सरकारी कार्यालय चले जाइए, प्रत्यक्षदर्शन मिल जाएगा । एक बार न्यूज के सिलसिले में वीरगंज के पर्सा जिल्ला विकास समिति के कार्यालय में गई थी । ईस कार्यालय की सिढीं में वहां आए महानुभावों के पान की पीक से तंग आ कर भगवान की तस्विर चिपकाई गई थी । बिचारे भगवान ईन पान खाए सैयाओं से हैरान, परेशान हो कर कोने में दुबके पडे थे । भगवान भी ईन शैतान रुपी सैयाओं से डरे हुए लग रहे थे ।
ईसी तरह एक बार नारायणी यातायात व्यवस्था कार्यालय जाना हुआ । वहां पर तो मैं दगं रह गई जब ग्रे कलर की स्टिल की आलमारी को मैनें पान की पीक से सराबोर हो कर लाल रगं में परिणत होते हुए देखा । वहां तो हालत ईतनी गयी गुजरी थी कि स्टिल की आलमारी के दरवाजे का हैंडल भी पान की पीक थुकने से एक दम लाल हो गया था । यह कार्यालय तो अव्यवस्था का अजब, गजब नमूना था । ईस कार्यालय के कर्मचारी रुपी सैयाओं ने ही पान खा कर अपने कार्यालय और वहां के माहौल को रंगिन बना दिया था । और जगह तो दिवारे लाल थी पर यहां तो माशाल्लाह आलमारी को भी बख्शा नहीं गया था ।बेचारी आलमारी नववधू की तरह डरी, सहमी खडी थी ।
तो देखा आप ने हमारे देश के सैंया कितने मनचले हैं और अपना छिछोरापन हर जगह दिखाते हैंं । देश के रहनुमाओं द्धारा पालित और पोषित ईन पान खाए सैंया हमारो से देश की तिजोरी राजस्व से भले ही मालामाल हो पर ईनकी ईन ओछी हरकतों से सारा देश शर्म से पानी पानी हो रहा है । पर ईन के आंख में शर्म का पानी नदारद हैं । हां मूहं पर पान की गिलौरी है और होठों से पीक टपक रहा है । जो कहां गिरेगा पता नहीं । ईन पान खाए सैंया हमारों की सुरतियाही सावंला नहीं है मन भी उसी तरह गहरा और काला है । हां बस होंठ लाल, लाल है । होंठ लाल आखिर क्यों न हो मिले तो जनता के खून से लाल कर लेगें और न मिले तो पान खा कर ही लाल कर लेगें यह पान खाने वाले सैंया हमारों ।

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