पापनाशिनी गोर्साईकुण्ड

हिमालिनी संवाददाता:प्राकृतिक खजाने का मालिक है नेपाल, देवताओं और ऋषि मुनियों की भूमि है नेपाल । ऊपर वाले ने अपरिमित सौर्ंदर्य दिया है नेपाल को । कण-कण मेर्ंर् इश्वर हैं और इसी क्रम में गोर्साईंकुण्ड की भी चर्चा होती है । यह रसुवा जिले में अवस्थित है । यहार्ँर् इश्वरीय सौर्न्दर्य और शांति प्राप्त होती है मानव को । पर्यटन, नैर्सर्गिक सौदर्य और धर्मस्थल के रूप में  गोर्साईकुण्ड जाना जाता है । यहाँ तक पहुँचने के लिए आत्मबल और्रर् इच्छाशक्ति दोनों की आवश्यकता है क्योंकि रास्ता सहज नहीं है ।
काठमांडू से जाने के लिए बालाजु से बस द्वारा अथवा अपनी निजी सवारी से नुवाकोट, त्रिशूली होते हुए धुन्चे नामक जगह पर पहुँचना पडÞता है । यहाँ तक की दूरी लगभग ११७ किलोमीटर की है, जिसे तय करने में ८ से ९ घंटे लगते हैं । रात्रि विश्राम धुन्चे में करना पडÞता है उसके बाद का सफर पैदल तय करना होता है । सीधी चढर्Þाई चढÞनी होती है । खन्दी, ढिमसा से चन्दनबारी पहुँच कर एक रात वहाँ भी गुजारनी पडÞती है । तीसरे दिन च्योलांगपाटी, लौरीविना उकाली, बुद्ध डाँडा से होते हुए कुण्ड पहुँचा जाता है । यहाँ तक पहुँचने में ६ से ८ घंटे पैदल चलना पडÞता है । इस तरह यहाँ तक पहुँचने में तीन दिन लग जाते हैं । पहाडÞी रास्ता होने के कारण कठिनाई तो होती है फिर भी हिमालय के सौर्न्दर्य को निहारते हुए रास्ता सहज हो जाता है । रास्ते में जगह-जगह पर रहने और खाने पीने की व्यवस्था है । कभी-कभी बारिश की वजह से पहाडÞ से मिट्टी या चट्टान के गिरने से रास्ता बाधित हो जाता है तब यात्री को पैदल ही रास्ता तय करना पडÞता है ।  वैसे तो सुन्दरीजल होते हुए ठाडेपाटी, र्सर्ूयकुण्ड के रास्ते से भी गोर्साईंकुण्ड जाया जा सकता है लेकिन इससे ज्यादा अच्छा रास्ता धुन्चे वाला है । यहाँ दैनिक दो हजार तक रूपए खर्च हो जाते हैं । बस की सुविधा नहीं होने के कारण सामान ढोने के लिए खच्चर मिल जाते हैं । वृद्धों और असमर्थों के लिए घोडÞे की सवारी उपलब्ध है ।
हिन्दु धर्मशास्त्र में गोर्साईंकुण्ड को भगवान शिव से सम्बन्धित माना जाता है । कहा जाता है कि जब देव और दानव में युद्ध हुआ तो दानवों की विजय हर्ुइ । फलस्वरूप अत्याचार का बोलवाला हो गया । अंततः देवगण भगवान विष्णु के पास पहुँचे और अपनी समस्या सुनाई । तब भगवान विष्णु ने उन्हें दानवों के साथ समुद्र मंथन की सलाह दी । देवताओं ने लोक कल्याण हेतु बहला फुसला कर दानवों को समुद्र मंथन के लिए तैयार कर लिया । जब मंथन हुआ तो कई बहुमूल्य वस्तु समुद्र से निकला । उसी क्रम में विष भी मिला, जिसके पान से देव और दानव मरने लगे । उनकी सुरक्षा हेतु भगवान शिव ने विष पान किया । जिसके बाद उन्हें प्यास लगी । प्यास बुझाने के लिए उन्होंने त्रिशूल से पहाडÞ में प्रहार किया जिससे गंगा का पानी निकला जो कुण्ड में संचित हुआ और वही  गोर्साईंकुण्ड कहलाया ।  भगवान शिव ने उसी जल से अपनी ताप मिर्टाई और प्यास बुझाई तत्पश्चात् स्वयं उस कुण्ड में विराजमान हो गए । जिसकी वजह से इस कुण्ड की अत्यधिक महत्ता है । कहते हैं इसमें एक बार स्नान कर लेने से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है । यह रोचक कथा पुराणों में उपलब्ध है । तामांग समुदाय के लिए भी गोर्साईंकुण्ड की अत्यधिक महत्ता है । हिन्दुधर्मावलम्बी और बौद्ध धर्मावलम्बी दोनों के लिए यह स्थान पवित्र धर्मभूमि है । जेष्ठ माह में होने वाले गंगा दशहरा और श्रावण पूणिर्मा में हिन्दु धर्मावलम्बी कुण्ड में स्नान करने के लिए आते हैं । तामांग समुदाय भी श्रावण पूणिर्मा में झाँकी लेकर नाचते-गाते वहाँ जाते हैं । उनका विश्वास है कि सेसे बोन्पो गीत गाने से मनोकामना पर्ूण्ा होती है । वैदिक तामांग शास्त्र में ‘गो’ का अर्थ सिर होता है और ‘सा’ का अर्थ मिट्टी है अर्थात् हिमालय भूमि में यह कुण्ड अवस्थित होने के कारण इसे गोर्साईं कुण्ड कहा गया है । तामांग भाषा में कुण्ड को कार्पुछोकेर -सफेद कुण्ड), ग्यो, ह्वे आदि भी कहा जाता है । तामांग समुदाय के ही गोले वंश के लोग कुण्ड में नहीं जाते हैं । स्थानीय लोक संस्कृति और गीत नृत्य सब का मन मोह लेते हैं । विदेशी पर्यटकों के लिए यह सबसे आकर्षा का केन्द्र होता है । बुद्ध चैत्य से ऊपर पहुँचने पर अन्नपूर्ण्ाा और कई हिमालय श्रृंखलाओं का अवलोकन होता है । बर्फसे आच्छादित चोटियाँ ऐसी लगती हैं मानो चाँदी के गहनों से उसने स्वयं को ढँक लिया हो । चाँदनी का आवरण, तो कहीं र्सर्ूय की किरणों से स्वणिर्म होता आकाश मन को सम्मोहित कर लेता है । दृश्य ऐसे कि नजरें ना हटें । गोर्साईंकुण्ड के समीप ही कई कुण्ड हैं, भैरवकुण्ड सीताकुण्ड आदि जिनकी महत्ता भी गोर्साईंकुण्ड की ही तरह हैं । धार्मिक आस्था का तो यह केन्द्र है ही, पर्यटकीय दृष्टिकोण से भी यह अद्भुत है ।
गोर्साईंकुण्ड जाने के लिए पूरी तैयारी की आवश्यकता होती है । गरम कपडÞे, स्लिपिंग बैग, बरसाती, छाता, र्टार्च, नीचे बिछाकर बैठने के लिए प्लास्टिक सीट, ऐसे जूते जो न फिसले आदि वस्तुएं अपने साथ जरूर रखनी चाहिए । र्सतर्कता के लिए प्राथमिक उपचार की सामग्री भी रखनी चाहिए । तरल पदार्थ का सेवन अच्छा होता है । रास्ता हडÞबडÞी में तय नहीं करना चाहिए ऐसा करने से अस्वस्थ होने की संभावना अधिक हो जाती है । बहुत सावधानी के साथ ऊपर चढÞना चाहिए । रास्ते में ज्यादा बातें भी नहीं करनी चाहिए । अगर उल्टी का अन्देशा हो, चक्कर आए, तुरन्त-तुरन्त लघुशंका या दर्ीघशंका जाने का मन करे तो घबराना नहीं चाहिए । ऐसा ऊँचाई पर चढÞने के कारण होता है । किन्तु अगर ज्यादा परेशानी हो तो नीचे आ जाना चाहिए ।
भक्तों की गलत आदतों की वजह से कुण्ड में भी प्रदूषण होने लगा है । कुण्ड के आसपास होटल होने के कारण गंदगी फैलने लगी है । अच्छा होता कि वहाँ सिर्फमंदिर होते और होटल बुद्ध डाँडा में ही होते । आसपास कचरे की अधिकता हो गई है, जिसका उचित व्यवस्थापन अत्यावश्यक है ।
गोर्साईंकुण्ड से सौगात के रूप में चौरी गाय के दूध से बने याक चीज, मक्खन, छर्ुर्पी आदि लिया जा सकता है । यहाँ का चीज और आलू काफी प्रसिद्ध है । चीज का व्यापार तो काफी अच्छा है । धुन्चे में रसुवा का आलू, निहुरो, लालीगुराँस का जूस, वाइन, तामांग टोपी, झोला आदि भी खरीदा जा सकता है । अगर आत्मबल हो तो एक बार गोर्साईंकुण्ड की यात्रा अवश्य करनी चाहिए ।

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