पाप और पुण्य

रवीन्द्र झा ‘शंकर’
पाप और पुण्य की सीधी परिभाषा यह है कि जिस भावना या क्रिया से परिणाम में अपना तथा दूसरों का अहित होता हो, वह पाप है और जिस भावना या क्रिया के परिणाम में अपना तथा दूसराें का हित होता है, वह पुण्य है । जिससे दूसरो का हित नहीं होता, उससे अपना हित कदापि नहीं होगा और जिससे दूसरों का हित होता है, उससे अपना कभी अहित नहीं होगा । यह सिद्धान्त निशारुप से मान लेना चाहिए । हमारी वास्तविकता दूसरों के हित में ही समायी है । जो मनुष्य ऐसा मानते है कि हम दूसरों का अहित करके या दूसरों के हित की अपेक्षा करके अपना हित करते हैं या कर लेंगे, वे वस्तुतः बडेÞ मुर्ख हैं । वे अपना हित कभी कर ही नहीं पाते । यह मान्यता ही भ्रम है कि दूसरे के हित की या उनकी अहित करने से हमारा हित हो जाएगा । अर्थात वे मनुष्य बड़े ही अभागे है, जो दूसरों के अहित में अपना हित और दूसरों के दुःख में अपना सुख समझते है । ऐसे मनुष्य ही असुर–मानव है, जिनका जीवन दूसरों की बुराइ में ही लगा रहता है । वे दूसरों की बुराई करने जाकर अपनी ही बुराई करते हैं ।
संसार में सधारणतया नौ प्रकार के मनुष्य होते हैं–
१. जो दूसरों के हित में ही अपना हित समझते हैं, अत एवं जीवनभर प्रत्येक क्रिया दूसरो के हित के लिए ही करते हैं । अपना नुकसान करके भी दूसरों को लाभ पहुँचाया करते हैं ।
२. जो दूसरों के हित को प्रमुख मानते हैं और अपने हित को गौण, अतः जहाँ दूसरों का हित होता हो, वहाँ अपने हित की चिन्ता छोड़ देते है ।
३. जो दूसरों का हित चाहते हैं, करते है, परन्तु अपना नुकसान सहकर या अपने हित की चिन्ता छोड़ कर नहीं ।
४. जो दूसरो का हित तो चाहते हैं और करते भी हैं, परन्तु वही चाहते–करते है, जहाँ अपना भी लाभ समझते हैं, नहीं तो नहीं करते । अर्थात् अपने लाभ के लिए ही दूसरों का हित करते हैं ।
५. जो केवल अपना ही हित देखते है, दूसरों के हित का विचार ही नहीं करते ।
६. जो अपने हित के लिए दूसरों के हित की जान–बुझकर उपेक्षा करते हैं ।
७. जो अपने हित के लिए दूसरो का अहित सोचते हैं और करने में नहीं हिचकते ।
८. जो अपने को बचाकर दूसरों को अहित ही करना चाहते हैं और दिन–रात उसी में लगे रहते हैं ।
९. जो अपना अहित करके भी दूसरों का अहित करने में लगे रहते हैं । इन नौ में प्रथम सर्वश्रेष्ठ है ओरु नवम् सबसे नीच अधम ।
प्रथम वस्तुतः दूसरों को पराया मानते ही नहीं । वे तो सब को अपना स्वरूप ही मानकर सब के सुख–दुख में स्वयं सुख–दुख का अनुभव करते हैं । उनका ‘स्व’ अखिल जगत के प्राणियों में प्रसारित होकर पवित्र हो जाता है । ऐसे ही लोगों के लिए श्री भगवान ने भगवद गीता में कहा है–
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्चति योऽर्जुन
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः
(६।३२)
अर्जुन जो अपने ही समान सम्पूर्ण प्राणियों में समदृष्टि रखता है और सबके सुख या दुःख को भी समता से देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है ।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक पयुंपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कुटस्थमचलं ध्रुवम ।।
संनियम्येन्द्रियग्रांम सर्वत्र समबुद्धय ।
ते प्राप्तुवन्ति मामेव सर्व भूतहिते रता ।
(गीता १२।३–४)
जो पुरुष अपनी सारी इन्द्रियों को भलीभाँति नियन्त्रण में रखते हमें, समस्त प्राणियों के हित में रत रहते हैं और सब में समवृद्धि रखते हैं, वे अचिन्त्य सर्वव्यापी, अनिर्देश्य, कटस्थ, नित्य, अचल, अव्यक, अक्षर ब्रह्म की उपासना करते हुए मुझको (भगवान का) प्राप्त होते हैं । ऐसा भ्रम अपने इन्द्रिय–सुख या अपने किसी पृथक सुख के लिए कैसे प्रयत्न करेगा ? उसे तो इसकी कामना ही नहीं होगी । सब का सुख ही उसका सुख होगा ।
वस्तुतः विश्व में जब इस प्रकार के आदर्श ज्ञानी या भक्तों का समाज बनेगा, तभी यहाँ यथार्थ सुख–शान्ति होगी । आज का समाज तो सचमुच बुहत गिर गया है । या गिर रहा है, जिस में ऐसे व्यक्ति भरे है, जो इन्द्रियों के गुलाम है, मन के दास है, दिन–रात मौज शौक भोग विलास में रहना चाहते हैं, अपने इन्द्रिय–सुख के लिए दूसरों के दुःख या अहित की परवाह ही नहीं करते, अपने को ही सुखी बनाने की धुन में सदा लगे रहते है और इसके लिए दूसरों का प्रत्यक्ष अहित करते रहते है । इस स्थिति को मिटाने के लिए भगवान के आदर्श वाक्यों के अनुसार एक नवीन विश्व का निर्माण होना चाहिए । जिसमें प्रत्येक व्यक्ति उपर्युक्त ज्ञानी या भक्त के आदर्श जीवन से सम्पन्न हो । यह तभी होगा, जब मानव दूसरो को ऐसा बनाने की चिन्ता न कर के पहले स्वयं ऐसा बनना चाहेगा और इसके लिए पूरा प्रयत्न करेगा ।
आज का मानव दिन–रात गला फाड़कर और कलम चलाकर दूसरों को उपदेश करता है, पद–पद पर उनकी भूले बता कर उन्हें भूल सुधारने का आदर्श देता है, पर स्वयं न अपनी भूलो को देखता है और न उन्हें सुधारने का ही प्रयत्न करता है । स्वयं दिन–रात आसुरी सम्पदा के सेवन में, लगा रहकर ही जगत को देव बनाने की बातें किया करता हैं । इससे दम्भ बढने के सिवा और कुछ नहीं होता । सच कहा जाए तो आज का मानव उन्नत नहीं हो रहा है । भले वह विज्ञान में तथा अर्थ पेशा व्यवसाय में ऊँचा चढ़ गया हो । बल्कि अपने आदर्श मानवीय गुणों की जो उसे देवता बनाने में समर्थ हैं, अवहेलना करके दिनों दिन असुरत्व की ओर पतन की ओर जा रहा है ।
इसी से उपर्युक्त नवम् प्रकार के मनुष्य भी आज मानव समाज में उत्पन्न हो गए है । जो अपना नुकसान करके भी अपना अहित करके भी दूसरों को नुकसान पहुँचाने या दूसरो का अहित करने में ही सुख का अनुभव करते हैं, ऐस नारायम जगत का अकल्याण ही करते है ।
जो लोग अपना वास्तविक हित चाहते है और यथार्थ में अपना, कल्याण चाहते हैं तो दूसरों को अपना समझे और उनके हित में ही अपना हित समझ कर क्या करे ऐसा होेन पर जीवन में संयम, सदाचार, सेवा आदि सद्गुण अपने–आप ही आ जाएगा । पाप से मुक्त हो कर पुण्य का भागी बनेंगे ।

Loading...
%d bloggers like this: