पा“च पीढिया“

सरोज सिन्हा
निवेदिता ने पोती को पलने पर रखा और मायके जाने की तैयारी कर रही बहू के कमरे में झाँका। तीन विशाल विदेशी सूटकेसों को देख कुछ संकुचित हो कर बोली- ‘बेटा, सामान अधिक है। अतिरिक्त भार का विशेष शुल्क लग जायेगा। सोनल के दो कम्बल और सात-आठ कपेडÞे ही ले जाओ, बाँकी छोडÞ दो। एक सूटकेस कम हो जाएगा। आखिर कुछ ही दिनों के लिये तो जा रही हो।’ मानिनी पुत्रवधू को मायके में अपने जीवन स्तर का पर््रदर्शन करना था और पडÞोसियों की प्रशंसा भी बटोरना था कि वह अपनी बेटी को बहुत अच्छी तरह रखती है। सामान बँधा- पति और पुत्र ने एयरपोर्ट पर पाँच हजार रुपये अतिरिक्त शुल्क दे माँ बेटी को विदा किया।
घर खाली था। पोती को बैर्ठाई हर्ुइ जगह पर निवेदिता की आँखे रुक गयी और पचास वर्षपर्ूव के दृश्य उस चादर पर चलचित्र की भाँति उभरने लगे। वह करीब बारह वर्षकी थी और प्रायः अपनी दादी को अस्वस्थ माँ के गर्भ में पलते बच्चे की बात करते सुनती थी। पिता प्रातः निर्विकार भाव से अपनी दैनिक क्रिया से निवृत्त हो भोजन के लिये बैठते और चुपचाप भोजन कर दूकान के लिये निकल जाते। घर शायद उनके लिये खाने और सोने की जगह मात्र थी। बेटियों से भी कम ही बातें हुआ करती थी। वे प्रतिदिन कुछ रुपये दादी के हाथ में रखते पर ६ सदस्यीय परिवार के भोजन, वस्त्र, घर की साफ-सफाई वृद्धा व बच्चों की सेवा सुश्रूषा सब माँ के ही जिम्मे थी। जेष्ठ पुत्री थी- स्कूल से आकर माँ के घरेलू कार्यो में हाथ बटाती रहती थी। चूल्हे के लबडी पर खाना बनाती अपनी माँ के सुन्दर चेहरे को आग की लपटों में दमकते हुए देखती पर उल्लसित हास्य तो दूर की बात सहज मुस्कान तक उसने उसके अधरों पर उभरते कभी नहीं देखा। रिश्तेदारों और पडÞोसियों की बातों से उसे यह भान हो गया था कि तीन पुत्रियों को जन्म देकर उसकी माँ ने कोई बहुत बडÞा अपराध किया था और चौथी पुत्री होने की आशंका में उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता था। वहीं एक उम्मीद भी थी शायद इस बार पुत्र होगा। वह नहीं जानती थी कि वह क्या करे अपनी माँ की पुत्रप्राप्ति के लिये। केवल गुमसुम सी माँ का मुख निहारा करती थी।
भादो का महीना था। तेज बारिश हो रही थी। एक कमरा खाली कर दिया गया था, जहाँ माँ अकेली जमीन पर लेटी कराह रही थी। कुछ घण्टे बाद एक नवजात शिशु के रोने की आवाज आई। दादी ने रोते हुए दूसरे छज्जे पर जा दरवाजा बंद कर लिया। उसने कमरे में झाँका। उसकी माँ ने अपनी साडÞी में उस नवजात शिशु को लपेट लिया था और प्रायः निर्वस्त्र सी ठिठुर रही थी। माँ ने उसे देखकर कहा- ‘तूँ इस कमरे में मत आना। जा …!’ कुछ घण्टे बाहर बैठी वह माँ के लिये कुछ न कर पाने पर अपाहिज सा अनुभव करने लगी। तभी पान चवाती नाइन आई और यन्त्रवत् बोलने लगी- अरे घर में सब को खिला कर ही तो आती ! कौन बेटा हुआ है जो नेग न्योछावर किया जायेगा। तब निब्बो ने राहत की साँस ली कोई तो माँ के पास है। उस दिन के बाद उसने माँ को कभी सीधे चलते नहीं देखा। गठिया से पीडित वह घिसटते हुए घर के सारे काम करती। दो वर्षबाद भाई भी हुआ पर उन चार बहनों ने जन्म लेकर माँबाप के जीवन-बगिया पर वो तुषारात कर दिया था कि उनके जीवन में फिर कभी खुशियों की कोपलें नहीं खिलीं।
आज वह समझ सकती है, दादी पौत्र क्यों चाहती थी। पौत्र वंशवृद्धि करेगा, उनके उपार्जित घर का उपभोग करेगा, खानदानी पेशे से धनोपार्जन करेगा, बाप का सहारा होगा, पिता की अन्त्येष्टी करेगा, आपनी बहनांे का पिता की तरह संरक्षण करेगा और शायद बडÞा आदमी बन खादान का नाम रौशन करेगा।
निवेदिता ने विवाहपश्चात् अपने सास की एकल पुत्र की पत्नी होने के नाते गृहणी का सारा धर्म उसी तरह निभाया। जैसा उसकी माँ करती थी। पर गर्भवती होने पर वह भी पुत्र की ही कामना करने लगी थी। नौकरी पेशा पति का विदेशो में अध्ययन, काठमांडू का परिवेश, सभ्य संस्कृत नौकरी पेशा, लोगों का साहचर्य, दूर्रदर्शन पर देश विदेश की सामाजिक व्यवस्था की जानकारी- यह सब उसकी सोच को कुछ भी तो न बदल पाए। उसकी और बहनों के विवाह मंे पिता को कोई विशेष परेशानी भी तो न हर्ुइ थी। हाँ ! काँलेज के प्रांगण में पैर रखने से पर्ूव ही सब का विवाह कर दिया गया था। सौभाग्य से उन्हें दो पुत्र रत्नों की ही प्राप्ति हर्ुइ। पर यदि वे दो पुत्रियां होतीं तो – उसका जीवन भी माँ और पिताजी के जीवन की तरह अभिशप्त बन जाता। सुरक्षा के लिये बेटियों को बाहर खेलने न देती। उन्हें नौकरों और रिश्तेदारों पर नहीं छोडÞती। बेटों की तरह उच्च शिक्षा दिलाने पर भी उनके लिये दहेज की चिंता करती रहती। दर्ुभाग्य से दकियानूस सोच वाले परिवार मंे बेटी गई तो आहत होती रहेगी। जब वे अपने जीवन की निराशा उनकी फूल सी बच्ची पर उतारते।
पुत्रबधू के गर्भवती होने पर फिर वही भय ! वह नहीं चाहती थी कि आधुनिक समाज के आदर्शों पर चलनेवाले उसके सरल पुत्र के कन्धांे पर बेटी के पालन-पोषण का कठोर दायित्व आ पडÞे। वह नहीं चाहती थी कि उसकी चंचल हिरण सी पुत्रवधू की निर्झरणी सी हँसी लुप्त हो जाये।
अब वह एक पढÞी लिखी, परिपक्व और साधन सम्पन्न महिला है। उसका अध्ययन, विवेक, र्सर्वेक्षण और विश्लेषण यह मानने को तैयार नहीं कि आर्थिक कारणों से भ्रूणहत्या, यौन उत्पीडन अथवा तलाक जैसे अभ्यासों को अघोषित मान्यता दी जा रही है। आर्थिक असमानता के फलस्वरुप पुरुष प्रधान समाज में ही हजारों पुरुष कृषक मजदूर आत्महत्या कर रहे है। पाँच पीढिÞयों के अनुभव से उसने यह सत्य स्वीकार कर लिया है- प्रकृति ने ही स्त्री और पुरुष की संरचना में भिन्नता बना रखी है। उनका सम्बन्ध ही आकर्षा-विकर्षा, पाचक-दाता और सहयोगीर्-कर्मयोगी का है। फिर वे ‘यशोदा हरि पालना झुलावें’ वाली ही पृथ्वी पर जीवन की निरन्तरता बनाये हर्ुइ है। आज एक सुशिक्षित, सुसंस्कृत और स्वावलम्बी स्त्री ही मानव समाज को प्रेम के आवरण में सुरक्षित रख सकती है।
योग्यतम चिकित्सक की देख रेख में आधुनिकतम यन्त्रों से पत्रुबधू के परीक्षण होते थे। एक दिन डा. पुत्र ने आकर कहा- ‘माँ तुम्हारी पोती आने वाली है।’ चलो नन्ही परी के स्वागत की तैयारी करनी शुरु कर दें ! ±±±

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