पुत्रदान !

बिम्मीशर्मा, काठमांडू ,७ मार्च |

पौराणिक काल से कन्या यानी पुत्री का दान होता आया है । सभी जाति के लोग पूण्य कमाने के लिए अपनी बेटियों का दान गाय की तरह करते आए हैं । पर किसी ने आज तक अपने बयल या सांढ जैसे बेटे का दान अर्थात पुत्रदान नहीं किया । क्योंं दहेज की वलि वेदी पर चढ़ने के लिए सिर्फ कन्याओं का ही दान होता है बेटों का क्यों नहीं । बेटे यानी पुरुष जाति भी यह समझे की अपने जनम घर को सदा के लिए त्याग कर के पति के घर में बेटियाें का जा कर रहना कैसा लगता होगा ?knyadan-2.png-2

वह नजारा सच में कैसा होगा जब किसी की बेटी सज धज कर दूल्हन बन कर फूलों से सजी कार या घोड़ी में बारातियों के साथ बड़े ठाठ से दूल्हे के घर के चौखट पर जाती है शादी के लिए । और अगले दिन बड़े गर्व से अपने दूल्हे के साथ गठजोड़ कर के घर वापस आती है । आहा कितना सुंदर दृश्य है । एक क्यारी में उग कर किसी दूसरे मौसम और मिट्टी में फिर से जड़ें जमाना और फलफूल देना । एक पेड़ के जैसे ही नियति है हमारे समाज में महिलाओं की ।

फिर भी महिला खुश रहती हैं । सृजन करती है अपने कोख से आने वाले कल की आशाओं को । प्रकृति की वरदान जहां इन्हीं महिलाओं को मिला है । वहीं समाज ने दहेज का कोप, निसंतान होने का दर्द और लांछना । डायन का आरोप लगा कर महिलाओं को अपने गाँव द्धार से सरे आम बेईज्जत कर के निकाला जाता है । विधवा को अपशकुनी कहा जाता है । तब भी महिला अपने बच्चे और परिवार के लिए सब कुछ सहती है । इतना सब पुरुषों को सहना पडे तो वह कमण्डल उठा कर हिमालय में चला जाएगा । इसी लिए औरत के कठिनाईयो को जानने के लिए भी पुत्रदान जरुरी है ।

अभी तक कहा जाता रहा है “अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आँखों में है पानी ।” पर यह २१ वीं शताब्दी है । जीवन के सारे दुख सिर्फ महिला ही क्यों सहे ? पुरुषों को भी तो इस दर्द का हिस्सेदार बनना चाहिए । जब तक मर्द महिलाओं के दर्द को अपने गर्दन पर टंगी तलवार की तरह नहीं लेगा तब तक महिलाएं ही जीवन के कुरुक्षेत्र में अकेली ही लड़ती रहेगी । इसी लिए महिला के दर्द को समझने के लिए अब बेटों का दान होना चाहिए न कि बेटियाें का ।

बेटियाँ हर क्षेत्र में आगे आ रहीं हैं तो उनका कन्यादान कर के उनकी आशाओं का गला क्यों घोटा जाए ? जब घर से लेकर सीमा मे भी औरत की निगाहें दुश्मनों की चौकसी कर सकती है । तब वह दुसरे दर्जे की बन कर क्यों रहे ?क्यों अपने बच्चो की परवरिश अच्छी तरह करने के बाद भी नागरिकता मां के नाम से नहीं मिलती ? क्यों सरकार और समाज को यह डर सताता है कि मां के नाम सें नागरिता देने पर यह देश भारत या अन्य देशों के लिए मामा घर बन जाएगा ?

यदि प्राचीन काल से ही पुत्रदान होता आया होता तो किसी सीता को भूमि में शरण नहीं लेनी पड़ती । न राम को जंगल जाना पड़ता न कैकेयी ऐन वक्त पर अपने बेटे को राजा बनाने के लिए दशरथ पर दवाव डालती । न अचानक ही राजा दशरथ के प्राण पखेरु उड़ जाते । क्योंकि तब सीता जी बारात ले कर अयोध्या जाती और अपने साथ डोली मे भगवान श्रीरामचन्द्र को जनकपुर ले आती । तब आज की तरह नेपाल, भारत का सम्बन्ध न बिगड़ता  और हमलोग नेपाल, भारत सम्बन्ध को  रोटी बेटी की जगह “रोटा बेटा” का सम्बन्ध कह कर गर्व से पुकारते ।

पर कन्यादान का खेल शुरु कर के हमारे पूर्वजों ने सब खेल बिगाड़ दिया । आखिर पुराण लिखना हो या वाचन करना हो सभी में पुरुषों का ही आधिपत्य रहा है । समाज भी पुरुषों के बनाए हुए नियम कानून से ही चल रहा है । लडका या मर्द लड़की की देहरी पर जिंदगी बिताना अपनी शान के खिलाफ समझता है । उसे लगता है कि वह औरत के सामने झुकेगा और उसकी बात मानेगा तो दूसरे दर्जे का ईंसान कहलाएगा । पुरुषवादी इसी सोच ने एक मां को अपने बच्चों के लिए नागरिकता अपने नाम से बनाने के आड़े आया । यह एक मां का ही नहीं समस्त नारी जाति का अपमान है ।

दहेज की आग पर जलने वाली  उन अबोध महिलाओं का क्या कसूर था ? यदि लड़की ब्याह कर के लड़के को अपने ही घर में ले आएगी तो कम से कम वह दहेज के राक्षस से तो बचेगी । बेटी के माता पिता अपने दमाद के साथ वह सलुक तो नहीं करेगें जो उनकी बेटी के साथ ससुराल यानी दामाद के घर में दहेज न लाने पर होगा ? घर जमाई रहना कोई बुरी बात नहीं है । जब सभी लड़के और बेटे को मां बाप राजी खुशी अपने घर से शादी कर के विदा करेगें तब “घर जमाई” शब्द कोई गाली अपमानजनक बात नहीं होगी । सभी धीरे, धीरे इसमे ढलने लगेगें और घर जमाई बनना शान की बात होगी । तब बेटियाँ अपने मां, बाप का ख्याल बेहतर तरीके से रख सकेंगी ।

लोग गौ दान करते हैं, भूमिदान करते है और जीती जागती अपनी बेटिंयों का दान भी किसी पशु या वस्तु की तरह आराम से करते है । क्या उन्हे थोड़ी सी भी लज्जा नहीं होती ? वैसे कहा जाता है कि किसी स्त्रीलिगीं पशु को काटना और उसका मांस खाना अपराध है । कानून में यह निष्द्धि है । पर किसी जीते जागते स्त्रीलिंगंी इन्सान को शादी के नाम पर दान करना और उन्हें वेश्याओं की कोठी पर बेच देना क्या यह ठीक है ? लड़कियाँ माँस का लोथड़ा नहीं जीती जागती सांस लेती और जिंदगी को अपने दम से आगे बढ़ाती हुई एक इंसान है ।

क्यो सहे वह समाज और कानून के अत्याचार ? वह खुद पढ़ लिख कर आर्थिक रूप से सक्षम बन कर अपने लिए कायदे, कानून बनाएगी । अपना मन चाहा हासिल करेगी और खुश रहेगी । इसी लिए अब बेटियों का कन्यादान नहीं होगा अब बेटों का पुत्रदान होगा और वह डोला पर बैठ कर इज्जत के साथ अपने ससुराल आएँगें और गर्व और खुशी के साथ अपनी पत्नी के घर जीवन बिताएगें । (व्यग्ंय)

 

 

 

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