पुरानी सोच पर नए दौर की शुरुआत

vidyadevi bhandari

राष्ट्रपति विद्या भण्डारी

अत्यन्त सीमित भूमिका किन्तु अत्यन्त गरिमामय पद है राष्ट्रपति का पद । इस मायने में एक महिला का इस पद पर आसीन होना गौरव की बात हो सकती है किन्तु इस एक बात से अगर नेपाल की महिला वर्ग यह उम्मीद करेगी कि इससे महिलाओं की स्थिति में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन होने वाला है, तो उन्हें निराश ही होना पड़ेगा ।
डॉ. श्वेता दीप्ति:नेपाल की राजनीति में एक नए इतिहास की शुरुआत हुई है । नारी सशक्तिकरण के दौर में नेपाल के सबसे अधिक गरिमामयी पद पर एक महिला को स्थान मिलना यकीनन ऐतिहासिक है । किन्तु यह वह पद है जिसमें राजनीतिक प्रतिस्पद्र्धा के लिए स्थान नहीं होता और नहीं यह जननिर्वाचित होता है । कमोवेश यह तय था कि अगर एमाले की सरकार बनती है तो प्रधानमंत्री केपी ओली और राष्ट्रपति के पद पर विद्या भण्डारी आसीन होंगी । यह सोलह बुंदीय समझौते के आधार पर पूर्व निश्चित था । यह अलग बात है कि भद्र सहमति में कुछ अड़चनें सामने आई । किन्तु इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है । यह राजनीति है, जहाँ सिर्फ कुर्सी, पद और शक्ति पर नजरें होती हैं और सारा खेल इसी से जुड़ा होता है । एक पल में लोग गाली देते हैं और दूसरे ही पल गले मिल जाते हैं और देखते ही देखते समीकरण बदल जाता है ।
जहाँ तक राष्ट्रपति के पद की बात होती है, तो यह वह पद है जहाँ जो भी व्यक्ति आसीन होता है, उनसे ज्यादा उम्मीद जनता को नहीं होती और होनी भी नहीं चाहिए क्योंकि राष्ट्रपति एक निरपेक्ष पद होता है और जिसकी भूमिका और जिम्मेदारी संविधान में वर्णित है और बहुत ही सीमित है । सर्वोच्च पद होने के बावजूद देश की जनता की अपेक्षाओं से यह पद बिल्कुल निरपेक्ष है । ऐसे में नवनिर्वाचित राष्ट्रपति से देश या जनता सिर्फ उनसे निरपेक्षता की उम्मीद करती है, किसी पक्षपातपूर्ण रवैए की नहीं । संविधान के अनुसार राष्ट्रपति के द्वारा किए जाने वाले
तकरीबन तीन महीनों से जारी आन्दोलन के सन्दर्भ में १ नवम्बर को मोर्चा और सरकार के बीच हुई वार्ता कुछ गम्भीर दिखी थी । लगा कि कुछ निष्कर्ष सामने आनेवाला है । आन्दोलनरत मधेशी मोर्चा ने भी सकारात्मकता दिखाई थी । किन्तु कुछ ही घन्टों में सरकार के द्वारा उठाए गए कदम ने सभी आशाओं पर पानी फेर दिया । रात के सन्नाटे में पुलिस बल का प्रयोग कर के जिस तरह आन्दोलनकारी और उनके टेन्टों पर कार्यवाही की गई, उसने एक बार फिर स्थिति को नियंत्रण से बाहर कर दिया है
सभी कार्य मंत्रीपरिषद् की सम्मति और सिफारिश या फिर संवैधानिक परिषद् जैसे निकायों के सिफारिश में होते हैं । प्रधानमंत्री की नियुक्ति में भी राष्ट्रपति का पद सिर्फ शपथ ग्रहण करवाने तक ही सीमित है, उक्त पद के लिए चुनाव संसद के दलीय समीकरण पर निर्भर करता है । जाहिर सी बात है कि राष्ट्रपति सिर्फ एक निमित्त है । नेपाल का संविधान कई मामले में राष्ट्रपति पद के लिए अनुदार भी है । संसदीय प्रणाली वाले देश में राष्ट्रपति को संविधान के कार्यकारी शीर्षक के अन्तर्गत ही रखा जाता है और राष्ट्रपति को सीमित और प्रधानमंत्री को उत्तरदायी कार्यकारी अधिकार दिया जाता है । किन्तु नेपाल के संविधान में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पद को अलग शीर्षक में रखा गया है । अत्यन्त सीमित भूमिका किन्तु अत्यन्त गरिमामय पद है राष्ट्रपति का पद । इस मायने में एक महिला का इस पद पर आसीन होना गौरव की बात हो सकती है किन्तु इस एक बात से अगर नेपाल की महिला वर्ग यह उम्मीद करेगी कि इससे महिलाओं की स्थिति में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन होने वाला है, तो उन्हें निराश ही होना पड़ेगा ।
नवनिर्वाचित राष्ट्रपति विद्या भण्डारी का पदीय मार्ग ज्यादा दुरुह नहीं है क्योंकि संक्रमण काल का परावसान हो चुका है । पिछले सात वर्ष की गणतांत्रिक यात्रा में निवर्तमान राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव प्रतिकूल एवं विवादास्पद अवस्था के बावजूद संस्थागत एवं व्यक्तिगत दोनों हैसियत से राष्ट्रपति पद की मर्यादा को बनाए रखने में सफल रहे हैं । उन्होंने जिस समय इस पद को सम्भाला था उस वक्त उनके समक्ष कोई संस्थागत अनुभव नहीं था । एक जटिल परिस्थिति में संविधान के उद्देश्य और उसके मर्म, दलों के साथ परामर्श और अपनी सूझ बूझ के साथ उन्होंने अपने कार्यकाल को सम्पन्न किया । किन्तु नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के समक्ष ऐसी कोई स्थिति नहीं है, उनके सामने विगत का उदाहरण और अनुभव दोनों है । किन्तु एक बात तो है कि आज की परिस्थिति में विद्या भण्डारी अब सिर्फ एमाले की नेतृ नहीं हैं, अब वो समग्र नेपाली की राष्ट्राध्यक्ष हैं । एमाले की सरकार है और एमाले के अध्यक्ष प्रधानमंत्री, यह स्थिति अगर उनके लिए सहज है तो उतनी ही असहज भी । एमाले नेतृत्व उनसे अपने पक्ष की भूमिका खोजना चाहेगा और यही उनके लिए असहजता की परिस्थिति का निर्माण करेगा । प्रधानमंत्री के निर्णय पर प्रश्न करना और उसके विपक्ष में जाना यह दोनों स्थिति उनके सामने आ सकती है और इस भूमिका का निर्वाह उन्हें बिना पक्षपात करना होगा, जो निःसन्देह ही उनके लिए असहज होगा ।
महिला राष्ट्रपति के साथ ही एक और महत्वपूर्ण पद महिला खाता में ही गया है और वह है सभामुख का पद । ओनसरी को नेपाल की पहली महिला सभामुख बनने का गौरव प्राप्त हुआ है जो निःसन्देह महिलाओं के लिए एक गर्व की बात है । सामान्य किसान परिवार में पैदा हुई ओनसरी को एमाओवादी कोटा में से सभामुख बनने का अवसर मिला है । जनयुद्ध में सक्रिय भूमिका का निर्वाह उन्होंने किया है । सशस्त्र युद्ध के समय घर्ती माओवादी सेना के भीतर कमाण्डर थीं । शिक्षा अधिक नहीं है, किन्तु युद्ध का अच्छा अनुभव है क्योंकि इन्होंने दर्जनों सैन्य आक्रमण का नेतृत्व बखूवी किया था । किन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अभी जो दायित्व मिला है उसमें धैर्य की आवश्यकता होती है । वैसे यह अलग बात है कि सभाभवन भी कभी कभी युद्ध स्थल में ही परिणत हो जाता है किन्तु ऐसे समय में भी सभामुख विचलित नहीं होता । अब देखना यह है कि ओनसरी यहाँ अपनी भूमिका का निर्वाह कहाँ तक कर पाती हैं । वैसे एक साधारण परिवार की पृष्ठभूमि से लेकर युद्धभूमि और वहाँ से लेकर सभामुख तक के सफल सफर के लिए उन्हें बधाई है और यह शुभकामना भी कि सभामुख का कार्यकाल भी सफलता के साथ सम्पन्न कर सकें ।
सात आठ सालों के बाद नेपाल की राजनीति ने एक बार फिर नई करवट ली है, जिसमें देश के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र की कोई उपस्थिति नहीं है । नेपाल के परिदृश्य को बदलने में मधेश और मधेश की जनता का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है । किन्तु विडम्बना यह है कि जिस उम्मीद और विश्वास को लेकर मधेश की जनता ने विगत के आन्दोलनों में अपना साथ दिया, जान गँवाई, आज वही उम्मीद और विश्वास को देश की सक्रिय राजनीति ने अनदेखा किया हुआ है । मधेशविहीन संविधानसभा ही इस नई सत्ता के लिए सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है । वैसे यह दीगर बात है कि आज तक इस अग्निपरीक्षा से मधेश और वहाँ की जनता गुजर रही थी किन्तु, अब यह परीक्षा एमाले की सरकार को देनी होगी । ओली सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर एक भी ऐसा चेहरा नहीं दिख रहा जिसकी दूरदर्शिता या नीति पर नेपाल के उज्ज्वल भविष्य को देखा जा सके या एक नए नेपाल की अवधारणा की कल्पना की जा सके । कम से कम सरकार गठन होने के बाद जो परिस्थितियाँ देश के सामने हैं और देश जिस दशा से गुजर रहा है, उसमें सत्तापक्ष का एक भी कदम ऐसा नहीं दिख रहा जिसे कूटनीतिक दृष्टिकोण से, वैदेशिक नीति की दृष्टिकोण से या राजनीति की दृष्टिकोण से उचित ठहराया जा सके । भाषा और व्यवहार आज भी अमर्यादित और अदूरदर्शी ही है । न तो संयम है और न ही शालीनता । सत्तारुढ़ नेता और देश की आधी जनता देश के एक भूभाग के लिए सिर्फ और सिर्फ अपने असंयम को ही प्रदर्शित कर रही है ।
तकरीबन तीन महीनों से जारी आन्दोलन के सन्दर्भ में १ नवम्बर को मोर्चा और सरकार के बीच हुई वार्ता कुछ गम्भीर दिखी थी । लगा कि कुछ निष्कर्ष सामने आनेवाला है । आन्दोलनरत मधेशी मोर्चा ने भी सकारात्मकता दिखाई थी । किन्तु कुछ ही घन्टों में सरकार के द्वारा उठाए गए कदम ने सभी आशाओं पर पानी फेर दिया । रात के सन्नाटे में पुलिस बल का प्रयोग कर के जिस तरह आन्दोलनकारी और उनके टेन्टों पर कार्यवाही की गई, उसने एक बार फिर स्थिति को नियंत्रण से बाहर कर दिया है । जनता आक्रोशित है और शांतिपूर्ण आन्दोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया है । मधेश की लाखों की संख्या में उतरी जनता को बार–बार भारतीय कहकर उनकी भावनाओं को बार–बार भड़काया जा रहा है । मधेश आन्दोलन का असर सिर्फ मधेश में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश में नजर आने लगा है । देश की राजधानी बदहाल है । दुकानों में राशन की कमी, दवाओं की कमी, इन्धन की कमी अब स्पष्ट तौर पर दिखाई देने लगी है किन्तु बधाई के पात्र हैं यहाँ की जनता और सत्ता दोनों ही । सत्ता को जनता की परवाह नहीं है और जनता में धैर्य की कमी नहीं है । इसलिए मंथर ही सही किन्तु देश अपनी गति में साँसे ले रहा है ।

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