पुरुषों से ज्यादा काम करती महिलाएं

हिमालय क्षेत्र में प्रति हेक्टेअर प्रतिवर्ष एक पुरुष औसतन 1212 घंटे और एक महिला औसतन 3485 घंटे काम करती दिखती है हल चलाना शुरू कर दें, 100 फीसद श्रम की हकदार होंगी महिलाएं

फूड एंड एग्रीकल्चर ऑग्रेनाइजेशन (एफएओ-संयुक्त राष्ट्र) के हालिया अध्ययन से पता चला है कि हिमालयी क्षेत्र में प्रति हेक्टेअर प्रतिवर्ष एक पुरुष औसतन 1212 घंटे काम करता है, जबकि एक महिला औसतन 3,485 घंटे काम करती है यानी महिला व पुरुष के काम का अनुपात 294 : 101 है। कृषि में महिलाओं का योगदान 60 से 80 फीसद व अन्य गतिविधियों में 70 से 80 फीसद तक है। अध्ययन में महिलाओं को मिलने वाले मानदेय पर भी चिंता व्यक्त की गयी है। महिलाओं के श्रम को बराबरी की अहमियत नहीं मिल रहा है। अध्ययन कहता है कि महिलाओं की मौजूदगी पलायन रोकने के साथ सामाजिक ताने-बाने को बिखरने से बचाने के भी काम आती है क्योंकि महिलाएं ही बुजुगरे व बच्चों की देखभाल करती हैं। कृषि में सबसे अधिक भागीदारी हिमाचल की, उसके बाद उत्तराखंड का नंबर आता है। बांस आधारित उद्योगों के आधार पर उत्तर-पूर्वी राज्यों- नगालैंड व मिजोरम आदि की महिलाओं को सर्वाधिक प्रगतिशील माना गया है। इस काम से कम श्रम देकर अधिक आय हासिल की जा सकती है। अध्ययन में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद व नेशनल सैंपल सव्रे ऑफिस (एनएसएसओ) के आंकड़ों का भी हवाला दिया गया है। इसके मुताबिक, 23 राज्यों में कृषि, वानिकी और मछली पालन में कुल श्रम- शक्ति का 50 फीसद भाग महिलाओं का है। छत्तीसगढ़, बिहार और मध्य प्रदेश की महिलाएं श्रम में बढ़े हिस्से की साझीदार हैं। पंजाब, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु व केरल में यह अनुपात 50 से कम है। बुवाई-रोपाई-कटाई तक का दारोमदार महिलाओं पर है। सामान्यत: अस्थायी रोजगार के वास्ते प्रवास पर गए पुरुष जुताई के समय गांव आते हैं लेकिन बाकी समय महिलाएं ही खेती का काम करती हैं। वे हल चलाना भी शुरू कर दें तो उनकी भागीदारी सौ प्रतिशत हो जाएगी। पर्वतीय क्षेत्रों में जंगली सूअर, बंदर और लंगूरों का आतंक है इसीलिए फसलों की रक्षा के रूप में भी महिलाओं का योगदान है। अध्ययन यह भी सुझाव देता है कि यदि महिलाओं को आधुनिक उपकरण व वैज्ञानिक सलाह दी जाए तो न सिर्फ श्रम व समय की बचत होगी बल्कि उत्पादन भी बढ़ाया जा सकता है। खासकर, दुधारू पशुओं के बारे में कहा गया है कि महिलाओं की दिनचर्या का ज्यादातर समय चारा खिलाने, चारा लाने, दूध निकालने व पशुधन की साफ-सफाई में लग जाता है, लेकिन उस मात्रा में दूध का उत्पादन नहीं होता। अत्यधिक श्रम के कारण महिलाओं की सेहत ठीक नहीं रहती। अधिकतर महिलाओं में एनीमिया की शिकायत है। सुनीता भास्कर

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