पुलिस हिरासत में दर्र्व्यवहार और यातना

सन्दीपकुमार वैश्य:बर्दिया जिला में रहे गरीब तथा असहाय लोगों की कानूनी सहायता और उनके हक के लिए पैरवी करते आ रहे एडÞभोकेसी फोरम बर्दिया, पिछले सात सालों से पुलिस हिरासत में अनुसन्धान के क्रम में रहे अभियुक्तों के पक्ष में भी वकालत और पैरवी करता आ रहा है। नेपाल के २० जिले में एडभोकेसी फोरम गरीब तथा असहाय व्यtmियों के पक्ष में क्रियाशील रुप में पैरवी करता आ रहा है। पुलिस हिरासत में अनुसन्धान के क्रम में रहे अभियुक्तों से एडभोकेसी फोरम के कानून व्यवसायियों ने प्रत्यक्ष मिलकर बातचीत की थी। ‘हम लोगों को पुलिस ने यातना देने के साथ-साथ दर्ुर्व्यवहार भी किया है’ -बहुत से अभियुक्तों ने बताया।
सन् २०१२ के आंकडे के अनुसार सन् २०११ की तुलना में २.३ प्रतिशत से कम होने पर भी बालवालिकाओं के ऊपर होने वाली यातना तथा दर्ुर्व्यवहार उच्च ही है। इसी तरह बर्दिया जिले में भी पुलिस हिरासत में अनुसन्धान के क्रम में रहे १ सौ २३ अभियुक्तों से एडभोकेसी फोरम के कानून व्यवसायी से प्रत्यक्ष मिलकर बातचीत की थी। जिस में ८८ लोग थे। उन लोगों ने बताया की हम लोगों के ऊपर नियमों के विपरीत यातना और दर्ुर्व्यव्यहार किया गया है।
पुलिस हिरासत में अनुसन्धान के क्रम में रहे अभियुक्तों के ऊपर नियमित रुप में होनेवाली यातनाओं को नेपाल सरकार नहीं रोक पा रही है। नेपाल भर में यातनाओं को निषेध करने का कानून निर्माण करने में नेपाल सरकार असफल है अथवा दण्डहीनता को नहीं रोक पा रही है। न्यायपालिका, राष्ट्रीयस्तर की मानव अधिकारवादी संस्थाएं, गैरसरकारी संस्थाएं और अन्तर्रर्ाा्रीय मानव अधिकारवादी संस्थाओं के अथक प्रयास के बाबजूद भी नेपाल सरकार ने यातना विरुद्ध की महासन्धि अर्न्तर्गत में रहे दायित्वअनुरूप अभी तक भी यातना को फौजदारी अपराध के रुप में स्थापित नहीं किया है।
यातना-विरुद्ध कडÞा कानून बनाने का उद्देश्य प्राप्त न होने से नेपाल के विद्यमान कानून पर्ूण्ा रुप में अपर्याप्त ही हैं और इसके चलते यातना देनेवाले खुलेआम घूम रहे हैं। पुलिस हिरासत में अनुसन्धान के क्रम में रहे अभियुक्तों से जर्ुम साबित कराने के लिए यातना का प्रयोग करने का खुलासा होने के साथ साथ एडभोकेसी फोरम के कानून व्यवसायियों के अनुगमन ने पुलिस हिरासत में अनुसन्धान के क्रम में रहे अभियुक्तों के ऊपर मानवअधिकार के विपरीत ब्यवहार करने के साथ कानून के नियमों का उल्लंघन भी पुलिस द्वारा होने का तथ्य खुलासा हुआ है।
मानव अधिकार उल्लंघन की घटना और यातनाओं का अनुगमन, अनुसन्धान करने के लिए इस वक्त रहे विद्यमान कानून का संयन्त्र प्रभावकारी नहीं है। राष्ट्रीय मानवअधिकार आयोग की क्षमता की अभिवृद्धि के लिए नये कानून का निर्माण होना जरूरी है। यातना विरुद्ध की महासन्धि अर्न्तर्गत के सारे कानून को हमारी सरकार तदारुकता के साथ लागू करे तो कुछ बात बनेगी। इसी तरह महान्यायाधिवक्ता के कार्यालय, नेपाल पुलिस की मानवअधिकार इकाई और विशेष अनुसन्धान की तदर्थ इकाईयों को जनविश्वास जीतने के लिए विस्तृत, स्वतन्त्र और र्सार्वजानिक अनुसन्धान करने में हम लोग सक्षम हैं, ये दिखाना अभी बांकी ही है। नेपाल में फौजदारी न्याय प्रणाली में भी अनेकों बाधा अड्चन हैं। जिससे दोनों पक्ष के बीच में न्याय करने में कठिनाई हो रही है। वर्तमान समय में यातना पीडिÞतों की स्थिति निराशाजनक होते हुए भी यातना देनेवालों का जर्ुम से बचने का सिलसिला चल रहा है। इसलिए एडभोकेसी फोरम ने सरकार समक्ष पीडिÞतों को भयरहित वातावरण में उजुरी करने के निकाय की स्थापना लगायत ११ सूत्रीय प्रस्ताव पेश किया है। एडभोकेसी फोरम बर्दिया ने पिछले ७ सालों में यातनाजन्य कार्य के विरुद्ध कानूनी कारवाही करने के लिए मुद्दा भी दायर किया है। चिन्कु थारु लगायत के व्यtmियों ने मुद्दा दायर किया है, जिस में एडभोकेसी फोरम बर्दिया ने पर्ूण्ा रूप से सहायता की है। द्वन्द्वकाल में बर्दिया जिले में यातना पीडितों की संख्या १ सौ से अधिक थी। बर्दिया जिले में लापताओं की संख्या २ सय ७२, मरने वालांे की संख्या ३ सय ९९, यातना से पीडितों की संख्या ८ सय ५७ है। इसी तरह द्वन्द्व पीडिÞत बच्चों की संख्या करीब ८० है। मगर सिर्फ१२ बच्चों को सहयता मिली है, -एडभोकेसी फोरम बर्दिया के जिला संयोजक काशीराम ढुङ्गानाने बताया।

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