पुष्पा बस्नेत सपने को मिला सहारा

कविता दास:नेपाल में सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाली एक और महिला को अन्तर्रर्ाा्रीय स्तर पर सम्मान हासिल हुआ है। अनुराधा कोइराला को सीएनएन हिरो की उपाधि मिलने के बाद यहाँ के लोगों को सम्मान के बारे में ना सिर्फमालूम हुआ बल्कि इसका महत्व भी पता लगा।
इस बार सीएनएन हिरो की उपाधि जीतने में सफल रही पुष्पा बस्नेत। कारागार में बन्दी जीवन बीता रहे कैदियों के बच्चों के लालन-पालन से लेकर उनकी पढÞाइ-लिखाई तक की जिम्मेवारी संभालने वाली काठमांडू की पुष्पा बस्नेत को जब से इस उपाधि के लिए नोमिनेट किया गया था, उसी समय से वह सर्ुर्खियों में आ चुकी थीं।
अमेरिका के लाँस एंजिल्स में हुए एक विशेष समारोह में आँनलाइन बोटिंग के जरिए ९ प्रतिस्पर्धी को पीछे छोडÞते हुए पुष्पा ने सीएनएन हीरो का खिताब जीता। जैसे ही आयोजक द्वारा उनके नाम की घोषणा की गई वह काफी भावुक हो गईं और उनकी आँखों से खुशी के आँसू छलक आए। भावुक अंदाज में ही पुष्पा ने इस सम्मान को उन्हीं बच्चों को समर्पित किया, जिसके लिए उन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी ही र्सर्पित कर चुकी हैं।
महज २८ वर्षकी पुष्पा ने कहा कि “मेरे सपने मैं विश्वास रखने वाले और उसे साकार करने वालों के प्रति मैं आभारी हूँ। पुष्पा ने अपने सम्बोधन में कहा कि जो बच्चे अपने माता-पिता के कारण जेल की चारदिवारी के भीतर जीने के लिए मजबूर हैं, मैं उनको उनका हक दिलाने का काम करती हूँ। उन्हें भी जीने का हक है, पढÞने-लिखने का हक है, आजादी के साथ खुली हवा में साँस लेने का हक है।
इस उपाधि के साथ ही पुष्पा को सीएनएन की तरफ से २ लाख ५० हजार अमेरिकी डाँलर पुरस्कार स्वरुप मिला। इससे पहले उत्कृष्ट १० में पहुँचने पर उन्हें ५० हजार डाँलर मिल ही चुका था। यह रकम पुष्पा के सपनों को साकार करने के लिए मदत कर सकती है।
जब पुष्पा ने इस नेक काम की शुरुआत की तो उसके घरवालों ने भी उसका विरोध किया था। काठमांडू के एक संभ्रान्त परिवार में जन्मी पुष्पा के माता-पिता चाहते थे कि वह पढÞ-लिख कर डाँक्टर बने, लेकिन पुष्पा के सपने कुछ और ही थे।
यह घटना करीब सात वर्षपहले की है। सेन्ट जेवियर्स काँलेज में समाजशास्त्र विषय का अध्ययन करने के क्रम में उन्हें एक प्रोजेक्ट वर्क मिला था, जिसके दौरान पुष्पा को जेल का भ्रमण करने का मौका मिला। वहीं पर उन्होंने देखा कि माता-पिता के बन्दी जीवन के साथ उनके नन्हे बच्चों को भी बन्दी जीवन बिताना पडÞ रहा है। उनका वचपन यदि जेलों में गुजरेगा तो उनके मानस पटल पर क्या असर पडेÞगा – उनकी पढर्Þाई-लिखाई नहीं हर्ुइ, सही से लालन-पालन नहीं हुआ तो उनकी जिन्दगी कैसी होगी – ये कुछ ऐसे प्रश्न थे, जिसने पुष्पा को अन्दर से झकझोर दिया और उसने कुछ अलग करने की ठान ली। एक रोचक घटना यह भी है कि जेल में कैदी के बच्चों का उद्धार करने के लिए उसे क्लास बंक करना पडÞा। बिना सोचे समझे उसने अपनी पीरियडÞ छोडÞी और जेल से बच्चों को अपने साथ ले आई। लेकिन सेन्ट जेभियर्स प्रशासन ने क्लास बंक करने के लिए पुष्पा को काँलेज से बाहर निकाल दिया था।
पहले तो माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों ने उसका मजाक उडÞाया। उसे इस काम के लिए सहयोग नहीं दिया। लेकिन जेल के भीतर बच्चों की आँखों के पीछे का छुपा दर्द पुष्पा को चैन से सोने नहीं देता था। आखिरकार उन्होंने अकेले ही आगे बढÞने का फैसला किया। पुष्पा ने अपने गहने बेचे और जवरन अपनी माँ से कुछ पैसे उधार लिए। कूल ७४ हजार रुपये के बल पर बच्चों को ले आई और बाल विकास केन्द्र की स्थापना कर उनकी देखभाल शुरु कर दी।
सभी बच्चे पुष्पा को मामू -माँ) बुलाते हैं। अविवाहित पुष्पा को इतने सारे बच्चे जब माँ कहकर बुलाते है तो यकीनन उन को काफी खुशी और गर्व का अनुभव होता है।

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