पुस्तक समीक्षा “वीरगन्ज मेरो शहर को कथा”

वर्षों पहले जब राजीवगांधी जिंदा थे तब उन्हाने कोलकाता शहर भ्रमण के बाद इस शहर को “मरता हुआ शहर” घोषित कर दिया । सारे कोलकातावासी राजीवगांधी के इस बयान से तिलमिला उठे और उन्होने खुल कर इस का विरोध किया । तब राजीवगांधी ने कोलकाता शहर से माफी मांगते हुए अपना बयान फिर्ता लिया । पिछले ६ महीनों मे मधेश आंदोलन के दौरान वीरगंज शहर को भी क्या कुछ नहीं कहा गया । पर हम वीरगंजवासी द्रौपदी के चीरहरण के समय विवश और शर्मिंदा पांडवो की तरह चुपचाप बैठे रहे । अपनी जन्मभूमि पर खून की होली खेली गई पर हम चुप रहे ।
हमें जनम देने वाली मां और हम जिस शहर में पैदा हुए उसको अगर को ही गाली दे तो गुस्सा तो गाली स्वाभाविक रूप से आएगा ही । मधेश आन्दोलन के दौरान अपनी जन्मभूमि वीरगंज को जब सभी ने नोचा और गालियां दी तब भावुक हृदयी पत्रकार एवं वृतचित्रके निर्देशक गिरिष गिरी ने अपने गुस्से के इस आवेग को रचनात्मक माध्यम से अपनी पहली किताब “वीरगन्ज मेरो शहर को कथा” में अभिव्यक्त किया है । अपने २५ साल लंबे पत्रकारिता के अनुभव को इस किताब में उढ़ेल दिया है । इस किताब में पत्रकारिता के उन के अनुभव और कला को अपनी जन्मभूमि के स्नेह के रूप में शब्द चित्र का भावनात्मक प्रस्तुतिकरण किया है । Mero sahar ko katha
किताब के शुरुआत में ही वीरगंज में ही पैदा हुए मदन पुरस्कार विजेता साहित्यकार ध्रुवचन्द्र गौतम की वीरगंजशहर के बारे मे लिखी गयी कविता से होती है । “मर्निगँशोज द डेज”की उक्ति की तरह इस कविता से ही यह किताब कितना मूल्यवान और पठनीय है हम अनुमान कर सकते हैं । वीरगंज शहर नेपाल में अब तक हुए हरेक क्रान्ति की उर्वर भूमि है । चाहे वह २००७ हो या २०६३ या २०७२ का मधेश आन्दोलन ही क्यों न हो । देश के आर्थिक मेरुदंड और प्राण वायु के रूप में यह शहर जाना जाता है । पर इसी का प्राण जब संकट में पड़ने लगा तो बचाने के लिए कोई नहीं आया । सिर्फ राजस्व संकलन की दृष्टि से ही राज्य के निकाय द्वारा इस शहर को देखने के कारण ही इस शहर का यान्त्रिकीकरण होने के साथ ही मानवीय करण का क्षय हुआ है । इसी बात को मद्धेनजर रखते हुए पत्रकार गिरीश गिरी ने अपनी जन्मभूमि के ऋण को चुकाने की कोशिश की है ।
तत्कालीन राणा प्रधानमंत्रीवीर शमसेर द्वारा ईस्वी संवत १८९७ में बसाए जाने के कारण ही इस शहर का नाम वीरगंज पड़ा । नेपाल में टेलिफोन, पुलिस और रेल सेवा वीरगंज से हो कर ही शुरु हुआ था । अतीत में यह शहर क्रान्ति और विकास का पर्याय रहा है । पर मधेश आंदोलन मे इस शहर का जिस तरह से तेजोवध किया गया । सभी को लगने लगा था कि यह शहर अब उठ नहीं पाएगा । पर इस शहर को जीवन देने वाले जो मूल तत्व हैं वह अभी पूरी तरह खतम नहीं हुआ था । पत्रकार गिरी ने इस शहर के गुण और दोष दोनों की पड़ताल करते हुए यह किताब लिखी है । क्योंकि वह इस शहर के नस नस से वाकिफ हैं । वैसे गिरी ने यह किताब दो साल पहले ही लिखना शुरु कर दिया था पर मधेश आंदोलन को देख कर और अपनी जन्मभूमि की पीड़ा देख कर वह इस किताब की प्रसव पीड़ा करवाने के लिए अपनी पूरी शक्ति और मनोयोग से तैयार हो गए ।
इस किताब की सबसे बड़ी विशेषता है इसे आगे, पीछे या बीच से जहां से भी पढेÞं यह सब को समझ में आ जाता है और नया लगता है । हर अध्याय में वीरगंज से जुड़ी अलग–अलग सच्ची कहानी और साथ मे ट्रैक में चलता हुआ मधेश आंदोलन का ज्वार । खाने के स्वाद के लिए मशहुर यह शहर इस किताब में भी अपना वही जायका और खुशबु पाठकों को लवरेज करता है । अपने बचपन में सुने हुए इस शहर से जुडेÞ हुए हरेक किस्से को इस खूबसूरती से गिरी ने लिखा है कि पाठक भी उनके साथ बच्चा बन कर अपने बचपन की गलियों मे घूम आता है । अध्याय १० पढ़ने के बाद भारतीय साहित्यकार फणिश्वर नाथ रेणु लिखित उपन्यास मारे गएगुलफाम (तीसरी कसम ) की याद ताजा हो जाती है । रक्सौल से अपने ननिहाल रेल में जाते हुए रास्तों और रेल में मिले विभिन्न रूप रंग के लोगोें की और टांगे की सवारी की जिस तरह से गिरी ने इस किताब में वर्णन किया है । उसे पढ़ने के बाद हर कोई जरुर चाहेगा एकबार इस जगह कि यात्रा करने की । एक ही अध्याय मे आंसू और हंसी का जो बेजोड़ कंबिनेशन गिरी ने किया है वह काबिले तारीफ है ।
वीरगञ्ज मरा नहीं है जिंदा है और यहां के मधेशी भी उतने ही इमानदार और मेहनती है जितने पहाड़ी या देश के अन्य भागों में रहने वाले लोग । यहां रहने वाले हरेक को इस शहर के भविष्य की चिंता है यह इस किताब को पढ़ कर अच्छी तरह मालूम हो जाता है । कुछ नेताओं के भ्रष्ट होने और राजनीति के कलुषित होते ही शहर और उस में रहने वाले लोग खराब नहीं हो जाते । यही इस किताब का मुख्य संदेश है और अपना संदेश देने मे यह किताब बखूबी सफल रहा है । यह शहर जीवंत है क्योंकि यहां के लोग अभी मरे नहीं है ।
मधेश आंदोलन में शहर की छाती मे चली बंदूक की प्रत्येक गोली पर पत्रकार गिरी का मन आहत हुआ है । अपने शहर के प्रति लोगों के तीव्र आक्रोश को देखते और सहते हुए इस किताब को इसी आंदोलन का बिम्ब बनाया गया है । बहुत सालों बाद अपने शहर में लंबे समय तक बैठ कर गिरी ने आंदोलन के समय में यहां की नाड़ी, दिल और आत्मा सभी को छूने की कोशिश की है ।
वीरगंज शहर कैसा था और कैसा हो गया और बन रहा है इसी में केन्द्रित हो कर यह किताब लिखी गई है । मधेश में आग की लपट की तरह उठे मधेशियों की समस्या और पहचान को किताब ने प्रमुख रूप से उठाया है । वीरगञ्ज शहर ६ संस्कृति और भाषाओं का शहर है । नेपाली के अलावा यहां भोजपुरी, मैथिली, हिन्दी, मारवाड़ी, मुस्लिम और सिक्खाें की संस्कृति और भाषा में यह शहर भी गता आया है । वीरगंज शहर की दिपावली हो या होली ये दोनों त्योहार देश में सब से ज्यादा हर्षोल्लास से मनाया जाता है । पर मधेश आंदोलन और उस का समुचित संबोधन न होने के कारण यह शहर लकवाग्रस्त हुआ है । इस शहर के थकने और बीमार पड़ने से इस का असर देश के अन्य शहर और वहां के जनजीवन पर पड़ता है । इस देश को जीवन देने वाला जीवन रेखा सा यह शहर कंही मृत शहर न बन जाए यह किताब इस बात की देश के सभी वर्गों के लोगों को चेतावनी भी देता है । वीरगंज शहर को समझने और समझाने मे यह किताब पूरी तरह कामयाब हैं और नेपाली भाषा में आंचलिकता पर लिखी गई बहुत कम किताबो में से एक होने के कारण यह किताब“मील का पत्थर” साबित होगी ।
– बिम्मीशर्मा

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