पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र द्वारा शक्ति परीक्षण का पासा विज्ञप्ति के रूप में : डा.मुकेश झा

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डा.मुकेश झा , जनकपुर , २४ दिसम्बर | कड़ाके की ठण्ड में नेपाल की राजनीति में गर्माहट आई जब देशवासिओं के नाम पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र ने विज्ञप्ति जारी किया। विज्ञप्ति में उन्होंने राजनैतिक पार्टीयों पर दोष लगाते हुए गलत तत्व का परिचायक बताया। ज्ञानेन्द्र को नेपाल का मसीहा साबित करने वालों ने उनकी टिप्पणी की उत्साहपूर्वक सुना, ग्रहण किया और उस पर आगे बढ़ने के लिए तत्पर सा दीख पड़े। नेपाल के जनता को पुनः राजतन्त्र के डोरी से बाँधने की प्रयास के साथ ही सारी तैयारियां होती दिख रही है। अगर पिछले कुछ समय की समीक्षा करें तो आशंका की सुई उसी तरफ मुड़ रही है। कुछ समय पूर्व नेपाली सेना प्रमुख ने सेना को “किसी भी परिस्थिति के लिए तैयार” रहने का निर्देश दिया था। वह “किसी भी परिस्थिति” का आशय क्या था ? क्या नेपाल पर कोई देश आक्रमण कर रहा है ? या नेपाल किसी दूसरे देश पर कब्ज़ा करने का निर्णय ले सकता है ? शायद नहीं। तो फिर गणतांत्रिक देश के सेना प्रमुख द्वारा देश के राष्ट्रपति के अनुमति और निर्देशन बिना अपने सेना को किस परिस्थिति के लिए तैयार रहने को कहा गया  ? नेपाली सेना के वक्तव्य के कुछ समय बाद ही दो गुटों में बंटे पूर्व पंचायतीओं की पार्टी राप्रपा का कुछ ही दिनों में एकीकरण होना भी शायद संयोग नही है। वैसे साधारण राजनीति में पार्टी का टूटना और मिलना एक आम अभ्यास के तहत लिया जाता है परन्तु मंजे हुए और दशकों से राजनीति के खेल में समय बिताये हुए खिलाड़ियों का इतनी आसानी से एक होना भी पर्दे के पीछे कुछ पकने का संकेत दे रहा है।

जहाँ नए नए राजनीति में आए हुए मधेसवादी दलों को एक होने की कोई सम्भावना नही दिख रही वहीँ राजनीति के दिग्गज खिलाड़ियों की पार्टी राप्रपा सहसा एक हो जाना किसी जादू से कम नही। अब अगर राप्रपा के एकीकरण की विंदू पर नजर डालें तो दोनों राप्रपा की दो धारायें थी। पशुपति समशेर द्वारा संचालित “हल” बाले गणतन्त्र, संघियता और धर्म निरपेक्षता को ले कर चल रहे थे तो कमल थापा के अध्यक्षता में संचालित “गाई” वाले हिन्दू राष्ट्र, राजतन्त्र समर्थक एवम् संघियता विरोधी  के भूमिका निर्वाह कर रहे थे। दोनों के एकीकरण का मिलन विंदू हिन्दू राष्ट्र नेपाल रहा जबकि राजतन्त्र और संघियता का निर्णय उन्होंने आने वाले अधिवेशन के लिए छोड़ दिया है। पार्टी एकीकरण के बाद अगले अधिवेशन में जनमत जिस ओर जायेगी पार्टी उसी को अपनाकर आगे बढ़ेगी। अगर समर्थक की समीकरण को देखें तो कमल थापा के “गाई” के सांसदों की संख्या ज्यादा है इससे यह अंदाज लगाया जा सकता है कि अधिवेशन में भी कमल थापा के “राजतंत्र” का प्रस्ताव ही पारित हो। इस बीच कुर्सी, प्रभुत्व और शक्ति के होड़ में लगे गणतन्त्र और संघियता समर्थक पार्टीयों से वास्तव में देश की जनता पीड़ित सी अनुभव कर रही है।

राजनैतिक शक्तियों का द्वन्द और पार्टियों के अंतर्द्वन्द से देश तहस नहस हो रहा है। बेरोजगारी से युवा पलायन हो रहे हैं, भूकम्प पीड़ित, बाढ़ पीड़ित को राहत नही मिलता,ठंढ के चपेट में इंसान और जानवर बेहाल हैं। राजनैतिक शक्तियों से संरक्षित उच्च ओहदे के अधिकारी अपने स्वार्थ सिद्धि में लिप्त हैं। जनता के आंदोलन और बलिदान को राजनैतिक पार्टीयों द्वारा मजाक बनाया जा रहा है। जनता के साथ किये गए वादों और सम्झौताओं के साथ खिलबाड़ किया जा रहा है। जनता- जनता के बीच वैमनस्यता का बीजारोपण कर के देश में विखण्डन का वातावरण बनाया जा रहा है। दुर्भाग्य है कि इस सब में अपने आपको प्रजातंत्रवादी या गणतंत्रवादी कहने वाली पार्टियां और उसके केन्द्रिय नेतृत्व ही आगे हैं। देश की वर्तमान अवस्था से वाकई जनता परेशान है और विकल्प का आश एवम् तलाश कर रही है। इस अवस्था का ही फायदा उठाकर पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र ने पुनः अपनी शक्ति परीक्षण का एक पासा विज्ञप्ति के रूप में फेंका है, जिससे जनता के मनोभाव को समझा जा सके।ज्ञानेन्द्र ने ऐसा करने का दुस्साहस सिर्फ इस लिए किया क्योंकि उसे पता है नेपाली सेना उसके जेब की सेना है जो आज भी देश भक्त से ज्यादा “राजभक्त” है। स्मरण रहे जिस परिवार ने २५० साल नेपाल पर एकाधिकार जमा कर बैठा वह इतनी जल्दी हार कैसे मान सकता है। हो सकता है, जनता की बदहाली, सेना से समर्थन का संकेत, राजतन्त्र के भक्तो की पार्टी राप्रपा का एकीकरण, राजनैतिक पार्टीयों में अंतर्द्वन्द, पार्टीयों के अंदर अंतरकलह इन सब बातों का अध्ययन कर ज्ञानेन्द्र के मन में एक बार पुनः “राजमुकुट” पहनने की लालसा जग उठी। अगर देश और जनता का भला ही ज्ञानेन्द्र का लक्ष्य रहता तो राजपद से च्युत होने के बाद समाजसेवी का रूप ले सकते थे, लेकिन हुकूमत करने वाला व्यक्ति कभी सेवक नही बन सकता। ज्ञानेन्द्र ने देश की ऐसे ही बदहाल स्थिति का बहाना बना कर पहले भी “देश का हित” के लिए गद्दी सम्हाला था, परन्तु जनता ने उसके मनोकांक्षा को नकार चूका है और वह पूरा पूरा असफल हो चुके हैं। जनता जिस बन्धन को एक बार पहचान चुकी है वह पुनः उसी उसी बन्धन में बंधने के लिए कतई तैयार नही होगी। अगर सत्तासीन होने के लोभ में ज्ञानेन्द्र द्वारा संक्रमण काल में रहे देश को और भी संक्रमित करने का प्रयास करके अपने आपको देश भक्त प्रमाणित करने की कोशिस की जाती है तो वह वास्तव में राष्ट्रघात ही होगा। पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र द्वारा दिया गया वक्तव्य अगर आम नागरिक की तरह अपना मनोभाव प्रकट करने के लिए ही है तो निसन्देह स्वागत योग्य है परन्तु अगर इसके पीछे सत्ता स्वार्थ छिपा है तो उनको यह समझ लेना चाहिये की जनता ने उनको तिस्कृत और वहिष्कृत कर चुकी है। अगर इतना पर भी चेत नही आया तो विश्व इतिहास राजाओं के देश से निर्वासित किए जाने की किस्सों से भड़ी पड़ी है। राजतंत्र के समर्थक पार्टीयों को यह समझ लेना चाहिए कि नेपाल अब एक पूर्ण रूपसे गणतंत्र देश है और अगर गणतंत्र के ऊपर कोई संकट खड़ा करने वाली कदम उठाया गया तो वैसी पार्टियों पर प्रतिबंध भी लगाया जा सकता है।

 

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