पृथ्वनिारायण शाह का राष्ट्र एकिकरण भी एक धोखा है,एकिकरण की मान्यता किसने दी ?

कैलाश महतो,परासी,१४ जनवरी |

हमारे समाज मेें बच्चे गुड्डा गुड्डी के खेल खेलते हैं, जिसमें एक पक्ष लडके तथा दुसरे पक्ष लडकी बालों के होते है । लडका लडकी दोनों का निर्माण किसी टुटा फुटा लकडी या फटेचिटे कपडों को कई बार लपेटकर बनायी जाती है । उनके नाम भी रख दी जाती है । उन काल्पनिक गुड्डे गुडियों की शादी हमारे बच्चे बडे धुमधाम से करबाते हैं । कभी कभी तो हमारे बच्चे बाराती और शराती दोनों हो जाते हैं । कभी कभी तो कई प्रकार के व्यञ्जनों सहित के भोज भी हम बचपने में कर चुके हैं । शादी हो जाती है, भोज भी खाया जाता है, आननद भी लिया जाता है । कभी कभी ऐसा भी होता है कि वास्तविक लडके लडकियों के शादियों से भी ज्यादा मस्ती लेते हैं उन गुडडों की शादी में भाग लेने बाले । मगर क्या वह शादी वैसी ही शादी है, जो किसी जीवन जिने बाले लडके और लडकी बीच की शादी होती है ?

prithvinarayn shah

एक तरफ कुछ लोग पथ्वीनारायण शाह को नेपाल के एकिकरणकर्ता और राष्ट्रनिर्माता के नाम से पूजा करना चाहते हैं तो वहीं कई लोग तथा सारे के सारे तटस्थ इतिहासकार यह कहने से कोई परहेज नहीं करते कि वे राष्ट्र निर्माता नहीें हैं । उनका मानना है कि उन्होंने कोई या किसी राष्ट्र का निर्माण या सृजना नहीं, अपितु वे बदले के भावना से प्रेरित होकर अपने अठारहवीं शताब्दी के सबसे छोटा राज्य को बिस्तार करने, अपने गरीबी को दुर करने तथा अपने उपर अन्य राजाओं द्वारा हुए अवहेलना का बदला लेने का प्रतिशोधात्मक कार्य किया था ।
कुछ इतिहासकार तो यहाँ तक कहते हैं कि वे यहाँ तक नहीं जानते थे कि आदमी शौचालय में शौच करने लगे थे, और जब वे एक बार बुटबल के राजा गन्धर्व सेन, जो उनके नाना भी थे, के शौचालय में शौच को गये और शौच के उपर ही गन्दा कर दिए तो उनको लोग मजाक का पात्र बनाये थे । वे काफी बेइज्जती महशुश किए थे । वैसे ही मकवानपुर नरेश हेमकर्णसेन की बेटी ईन्द्रकमारी के साथ शादी होने के तुरन्त बाद जब वे अपनी पत्नी को अपने साथ लेकर गोर्खा जाना चाहे तो मधेश की परम्परा के अनुसार गौना नहीं होने तक बेटी की विदाई न होने की बात पर मकवानपुर और गोर्खा दोनों पक्ष के बीच मनमुटाव पैदा हुआ था । एक साल बाद पूनः पृथ्वीनारायण शाह गौना कराने के लिए मकवानपुर गए, मगर ईन्द्रकमारी की उम्र कम होने के कारण दुसरी बार भी गौना होने की बात नहीं बन पायी । उनके कमजोर वस्त्र तथा भेष–भूषाओं को देखकर मकवानपुर के सैनिकों ने भी मजाक उडायी थी । जुता खोले बिना उन्होंने शाह को सलाम किया था, जिससे चिढकर पृथ्वीनारायण शाह ने कुछ सैनिकों को मार डाला । जब यह बात मकवानपुर युवराज दिग्बन्धन सेन को पता चला तो गुस्से में आकर वे पृथ्वीनारायण शाह को मारने भी जा रहे थे, मगर मौका ए बारदात पर राजा हेमकर्ण सेन के पहुँच जाने से उनकी जान बच गयी ।

जहाँतक पृथ्वीनारायण शाह के बहादुर होने की बात है तो सारे के सारे विदेशी तथा नेपाली इतिहासकारों के अनुसार भी वे ज्यादातर राज्यों को छल, कपट तथा चोरी छुपी के साथ ही जिते हैं । एक अब्बल लडाकू तथा सही क्षत्री के जैसे आमने सामने होकर लगभग एक भी लडाई जित नहीं पाये । मधेश के एक भी इञ्च जमीन को वे कभी जित नहीं पाये, क्यूँकि बाइसे चौबिसे राज्य में मधेश के आधा इञ्च भी जमीन पडने की बात नहीं है । सूक्ष्म रुप से अध्ययन करने पर पृथ्वीनारायण शाह का बहादुरी, राष्ट्र निर्माण तथा राष्ट्र एकिकरण के कार्यों पर सवाल इन आधारों पर खडा किया जा सकता है ः
१. वे कोई बहादुर नहीं, अपितु भगौडे और फिरङ्गी गैर नेपाली और गैर मध्य देशीय थे ।
२. अगर वे बहादुर होते तो लडने के डर से उनके पूर्खे बेबिलोन, मेसोपोटामिया, कश्यप पर्वत, कश्पियन सागर तथा कस्साइट्स जैसे जगह, पर्वत, सागर के किनार तथा स्थानों से भागते हुए भारत वर्ष के रास्ते वर्तमान के नेपाल भू–भाग में शरण लेने नहीं आए होते ।
३. अगर वे बहादुर ही होते तो ज्यादातर राज्यों को छल, कपट और जाल झेल से नहीं जिते होते ।
४. बाइसे और चौबिसे राज्यों को जितकर विशाल नेपाल बनाने का गर्वशाली इतिहास बनाने बाले उन बाइसे चौबिसे राज्यों का पूर्ण विवरण क्यूँ नहीं देते ?
५. मधेश के कोई भी हिस्सा गोर्खा या नेपाल के होने का कोई पूख्ता प्रमाण नेपाली या अन्य किसी ने देने का काम नहीं किया है ।
६. मधेश के एक भी इञ्च जमीन को गोर्खालियों ने कभी जित नहीं पायी । उल्टे उनके हजारों सेनाओं की जानें चली गयी मधेशी सेना के साथ के युद्ध में और खुद पृथ्वीनारायण शाह के प्राण को मधेशियों ने दान दी ।
७.नेपाल का नामाकरण आज से करीब २२१६ वर्ष पहले यानि २७१ बि.सी पूर्व हुआ था और नेपाल देश की राजनीतिक पृष्ठभूमि जम्मा २४७ वर्ष का है । जबकि मध्यदेश का राजनीतिक पृष्ठभूमि हजारों वर्ष का है । मध्य देश का सीमांकन बिना के राजा पृथु से लेकर राजनीतिक सीमांकन करने बाले मधेश का प्रथम सम्राट वैवस्वत मनु के राजकीय काल से इक्ष्वाकु तथा उन से लेकर सम्राट हरिश्चन्द्र, राजा हरिश्चन्द्र के सुर्यवंशी पुत्र राजा रोहिताश्व से रघु प्रथम होते हुए रघु द्वितीय से राजा अज, राजा अज से सम्राट दशरथ, उन से लेकर राजाये कुश (अयोध्या) तथा लव (श्रावस्ती) से तक्षक, राजा शिरध्वज जनक, रामायण काल से महाभारत कालतक, राजा कन्स से लेकर राजा, भगवान् तथा दार्शनिक कृष्ण तक, कौरवों से लेकर पाण्डवों तक, राजा विराट से लेकर राजा शुद्धोदन तक, बुद्ध से लेकर चाणक्य तक, सम्राट चन्द्रगुप्त से लेकर चक्रवर्ती सम्राट अशोक तक, राजा सहलेश से लेकर राजा दंगीशरण तक, सादत अलि खान से लेकर बेगम हजरत महल तक, लोहांग सेन से लेकर पृथ्वीपाल सेन तक, राजा हरिसिंह देव से लेकर जयप्रकाश मल्ल (ठाकुर) तक के राजा महाराजा सब के सब मधेशी, मनु वंश और रिश्तेदारों के रहे ।
८. “पश्चिम किल्ला काँगडा, पूर्वमा टिष्टा पुगेथ्यौं” से यह कतई प्रमाणित नहीं होता कि नेपालियों का राज्य वहाँतक कभी बना या चला । क्यूँकि किसी व्यति या समूह के किसी स्थान विशेष तक चले जाने से वह भूमि उसीका नहीं हो जाता है । अगर ऐसा होता तो आज लाखों नेपाली दिल्ली में है तो वे दिल्ली को नेपाल के होने का दाबा क्यूँ नहीं करते ? मलेशिया, दुबई और कतार तथा अमेरिका समेत में वहाँ के मूल निवासियों के संख्या से ज्यादा संख्या में बाहर के लोग रह रहे हंै तो वे उन देशों को अपना ही देश क्यूँ नहीं कह लेते हैं ?
९. पृथ्वीनारायण शाह ने एकिकरण नहीं, विस्तारीकरण, लुटकरण, ईश्र्याकरण तथा बदले की भावनाकरण किया था ।
१०. किर्तिपुर में बारम्बार हार खाने के कारण पृथ्वीनारायण शाहद्वारा किर्तिपुर विजय उपरान्त नेवारों का नाक कान १७ धारनी काटने का इतिहास मौजुद है । उसी किर्तिपर में मधेशी राजा ने शाह को जीवन दान दी थी ।
द्रष्टव्य ः आज पुष २७ के दिन मधेशी जनजाति तथा आदिवासी विरोधी गोर्खाली खस लोग पृथ्वीनारायण शाह को राष्ट्र निर्माता के रुप में पूजा करते हैं, वहीं पर किर्तिपुर के दरबार स्क्वायर में नेवार लोग उनके नाम पर घृणा से थुकने की परम्परा है । क्यूँकि शाह को नेवार जातद्वारा हिंसक गुण्डा का संज्ञा दिया जाता है ।
११. अपने सहयोगी समेत का हत्या तथा सर्वश्व हरण शाह ने किया था ।
१२. विजय उपरान्त शाह ने मगर जात के प्रमुख को छाले छिलकर नमक छिडक कर अनेक यातनाओं के साथ उनकी हत्या की थी ।
१३. भक्तपुर हडपने के बाद उनके विरुद्ध लडने बाले भक्तपुर बासियों के गाँवों और घरों में आग लगाकर कईयों को नृशंस हत्या की थी पृथ्वीनारायण शाह ने ।
१४. जयप्रकाश मल्ल को धोखे तथा कपट के साथ उनके राज्य पर चोर के भाँती रात के समय आक्रमण कर उनका राज्य कब्जा किया गया, जबकि राजा मल्ल सुर्यास्त से पूर्व और सुर्यास्त के बाद लडाई नहीं करते थे ।
१५. नेपाल को हिन्दु राज्य के रुप में जबरजस्तीे घोषणा करने जैसे अक्षम्य दर्जनों अपराध के सूत्रधार रहे पृथ्वीनारायण शाह को राष्ट्र निर्माता के रुप में मानना खस आर्यो के भलाई के अलावा बाँकी जन समुदायों लिए केवल वे एक अपराधी हंै और अपराधी को सजा होनी चाहिए, भले ही उनके अस्थियों को निकाल कर ही क्यूँ न हो ।
राष्ट्रिय एकीकरण का मान्यता किसने दी ? प्रमाण चाहिए । नहीं तो जैसे बच्चों द्वारा गुड्डा गुड्डी की शादी जैसे बस् एक सुन्दर कल्पना है, वैसे ही पृथ्वनिारायण शाह का राष्ट्र एकिकरण भी एक धोखा है । एकीकरण वह होता है, जिसमें एक शासक सबको जोडने का काम करता है । युद्ध का सारा दर्द भूलकर सबको अपना जनता मानता है । भावनात्मक रुप से नहीं जोड सकने और बदले की भावना से अपने अस्तित्व के रक्षा हेतु लडने बाले समदायों को दुश्मन मानकर विभेद कायम करने बाला कोई भी शासक राष्ट्र निर्माता या राष्ट्रिय एकीकरण का मसीहा नहीं हो सकता । वह केवल और केवल अपराधी होता है ।

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