पृथ्वीनारायण शाह का एकिकरण से लेकर ओबामा का बहिर्गमन तक : कैलाश महतो

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कैलाश महतो, परासी, १३ जनवरी | अनेकानेक छोटे बडे राज्यों में विभक्त भारतवर्ष को एकत्रित करने बाले अंगे्रजों के नाम पर भारतीय एकता दिवस क्यूू नहीं मनाया जाता ? भारत आजादी के बाद सरदार बल्लभ भाई पटेल को ५६५ भारतीय विरासतों को पूनः एकीकरण क्यू करना पडा ?

हकीकत यह है कि विभिन्न विरासतों में खण्डित भारत वर्ष मेें अंगे्रजाें ने अपना हुकुमत फैलाया था, एकता नहीं कायम की थी । सारे राज्यों पर लूट का गिद्ध नजर डालकर औपनिवेशिक शासन फैलाना और कुछ भारतीय चाटुकारों को मिलाकर भारतवर्ष के राज्य, जनता और राष्ट्र को लूटना ही उसके मुख्य उद्देश्य थे । भारत को यदि उन्होंने एक की होती तो मूल अमेरिकीयों द्वारा मूल से अंगे्रज रहे जर्ज वासिङ्गगटन को अपना राष्ट्रपिता मानने जैसा ही भारतीय लोग भी अंगेजोंं को अपना राष्ट्रपिता मान लिए होते । अंग्रेजों ने भारतीयों में  फूट डालकर भारत पर सिर्फ दोहनपूर्ण एकत्रित शासन किया । सन् १८३५ में इसिलिए तो लॉर्ड मैकियावेली ने कहा था कि भारतीय एकता को तोडकर ही भारत पर शासन कायम रखा जा सकता है ।
वैसे पृथ्वीनारायण शाह के बारे में मुझे कोई चर्चा नहीं करना चाहिए था । क्यूँकि उनसे हमारा कुछ लेना देना है ही नहीं । लेकिन कुछ गणतान्त्रिक नेताओं के कृयाकलाप और मधेशी नेता द्वारा भी काल्पनिक एकीकरण को स्वीकारने के अभिप्रायों के कारण कुछ लिखने को बाध्य हूँ । एक दिन पहले अमेरिका के राष्ट्रपति बाराक ओवामा द्वारा दी गयी बिदाई भाषण ने भी मुझे प्रेरित किया है ।
बाराक ओबामा के करीब एक घण्टे के विदाई भाषण में उन्होंने अमेरिका की आनतरिक सुरक्षा, गृहयुद्ध, आपसी द्वन्द और जनता की विकास की बात नहीं, अपितु बाह्य असुरक्षा, आतंकवाद, विश्व अर्थनीति, विश्व पर्यावरण जैसे विषयों पर अमेरिकी जनता को ध्यानाकर्षण कराया । उनके भाषण पर सिकागो के उस विदाई कार्यक्रम में भाग ले रहे लोगों ने दर्जनों बार अपने अपने आसनों से खडे होकर उनके सम्मान में तालियाँ बजाती रही । ओबामा ने देश में विकास, आरक्षण, सडक, नौकरी, तालिम, भाग बण्डा आदि की बात नहीं (क्यूँकि वहाँ दैनिक सख सुविधा की हर चीज मौजद हैं), बल्कि जर्ज वासिङ्गगटन से लेकर आम अमेरिकीतकों का उच्च देशभक्तिपूर्ण व्यक्तित्व, आपसी प्रेम, राष्ट्रिय एकता और अमेरिकी प्रजातन्त्र जैसे बातों पर गर्व से चर्चा की ।
उन्होंने कहा कि संविधान अपने आप में कोई  शक्ति नहीं रखता, बल्कि वह जनता ही है जिसके कारण संविधान शक्तिशाली बनता है । उनके भाषण के सर्वश्रेष्ठ पाठ यह है कि किसी भी देश के जनता को एकता में बाँधने के लिए नेताओं के नेतृत्व में एक रहस्यमय बन्धन होना आवश्यक है । उन्होंने यह भी उजागर किया कि जनता का काम सिर्फ मत देकर किसी को नेता मान लेना ही नहीं होता । पिछे बैठकर नेताओं कोे गाली देना ही जनता का काम नहीं, अपितु वे किसको क्यूँ भोट दे रहे हैं, उसका भी परीक्षण अपने आप में करने को कहा । समग्र में ओबामा का यह सन्देश रहा कि विकास विचार से निर्माण होता है । विचार ही कर्म को प्रोत्साहित करता है ।

राष्ट्र निर्माता पिता होने के लिए यह जरुरी नहीं कि कई राष्ट्रों को जोडकर एक बडा देश राष्ट्र बनाने बाला शख्स किसी खास राष्ट्र वंश, या समुदाय भाषा के ही हों । जब एक शख्स बहुत सारे राष्ट्र या राज्यों को जोडकर एक देश बनाता है तो उसके घर रहे राज्य के बाहेक अन्य राज्य उसके अपने नहीं, दुसरों का ही रहता है । मगर बाँकी राज्यों को जितकर मिलाकर जब एक बडा कोई देश राष्ट्र बनाता है तो विजित अन्य सारे पूर्व राज्यों की जनता भी उसका अपना हो जाता है । वो सबको समान व्यावहार करता है । जिसने भेदभाव किया, वह और उसका शासन समाप्त होने का ही इतिहास है ।

सन् १४९२ में Columbus द्वारा खोजित अमेरिका में विभेद तथा दोहनपूर्ण राज्य कर रहे अंगे्रजों में से ही एक अंगेज रहे George Washingoton ने मूल अमेरिकनों के पक्ष में आवाज उठाने के कारण अंगे्रज मूल के Washingoton को वहाँ के मूल निबासियों ने अपना राष्ट्र निर्माता÷राष्ट्रपिता मान लिया । वैसे ही सन् १७६२, जनवरी ३१ को स्कटल्याण्ड के Ulva द्वीप में जन्मेंLachlan Macquarie सन् १७७६ में अंगे्रजी सैनिक में दाखिला लेकर विभिन्न चरणों को पार करते हुए सन् १८१० में Australia के South Wales में अंगे्रजों के बन्दी रहे १०,००० अपराधियों पर शासन करने पहँुचे । अपनी पत्नी Elizabeth के सलाहानुसार उस Prison Colony को ही राष्ट्र के रुप में घोषणा करते हुए Australia नाम दे डाले । वेही कैदी लगायत के लोगों द्वारा उनके उदारता के लिए उन्हें राष्ट्रपिता का दर्जा दिया गया । ज्ञातव्य हो कि हर राष्ट्र निर्माता पिता अपने एकल जातीय सोंच और संस्कारों को भूलकर विजित राज्य राष्ट्रों के जनता के साथ सह्दयी व्यवहार करता है जिसके कारण उस राष्ट्र देश को विकास करने होने में सबों कीे सहयोग होती है ।
हमारी नीति शास्त्र कहता है कि शुरुवात जैसा होगा, निर्माण भी वैसा ही होगा । बीज जैसा बोओगे, फसल वैसा ही काटोगे ।

पृथ्वीनारायण शाह ने  अमानवीय रूप से एकिकरण शुरु की । वह एकिकरण राज्य जितने के उद्देश्य से नहीं, दूसरों की सम्पतियाँ लूटन के लिए थी । बाद में उसे राज्य विजय की नाम दी गयी जो एक विकृत राज्य विस्तार कार्य रहा । उसके अन्दर मानवता नाम का कोई धरातल बनने नहीें दिया गया ।

२६ सेप्टेम्बर १७४४ से लेकर ११ जनवरी १७७५ तक पृथ्वीनारायण ने मानवता की जो धज्जियाँ उडाईं, बहसीपना दिखायी–मध्य युग के विश्व में तानाशाह कहलाये जाने बाले हिटलर, मुसोलिनो, स्टालिन आदि को भी छक्के छूडा देने बाला रहा । राम और कृष्ण युग के रावण और कंश भी रो पडते ।

पृथ्वीनारायण शाह ने काठमाण्डौ, ललितपुर, कीर्तिपुर और भक्तपुर के लोगों के साथ शारीरिक निर्ममता बरता तो मकवानपुर के हेटौडा से नीचे मधेश में उन्हें नहीं उतरने देने बाले मधेशियों के साथ काठमाण्डौ में जयप्रकश मल्ल को धोखे से हत्या करने पश्चात् नश्लिय राजनीति, विभेदपूर्ण व्यवहार और मधेशियों को सेना में अघोषित रुप से प्रवेश निषेध कर दी । दुर्भाग्य से मधेशी राज्यों पर साम्राज्य फैलाये अंग्रेजों के अकुशल नीति के कारण मधेश को नेपालियों के जिम्मे रहना पडा ।

पृथ्वीनारायण शाह द्वारा, नश्लभेद और आतंक से शुरु हुए नेपाली राज को उनके उत्तराधिकारीयों से लेकर उनके झोला उठाने बाले खस आर्यों ने आजतक कायम रखा है । वास्तविक नेपाल और काठमाण्डौ लगायत उसके पूर्व के नामों को भी नामाकरण महाभारत कालिन मध्य देश के लोगों ने ही की थी । १ मार्च १७७० के दिन गोरखा से नेपाल अपने राजधानी को स्थानान्तर किए पृथ्वीनारायण ने अपने को नेपाली कहना शुरु किया ।

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