पे्रम की डोर कहीं टूट ना जाय

                                                         रहिमन धागा प्रेम का मत तोडो चटकाई,
                                                            जो टूटे फिर ना जुडÞे, जुडÞे गाँठ पडिÞजाई।।
कञ्चना झा:लेकिन दर्ुभाग्य यह बात कुछ लोग नहीं समझते और समझना भी नहीं चाहते और धागा टूट जाता है। पछिले दिनों एक बार फिर यह धागा टूटते-टूटते बच गया। धन्यवाद के पात्र हैं, नव नियुक्त नेपाल के लिए भारतीय राजदूत महामहिम रञ्जित रे। उन्होंने स्थिति को बहुत जल्दी ही भाँप लिया और कुशल कुटनीतिक क्षमता का पर््रदर्शन किया। जिसका परिणाम एक बार फिर धागा टूटते टूटते बच गया। nepal-indian-PM_I nepal india relation
महामहिम रे ने गोरखा जिला में आयोजित एक कार्यक्रम में स्पष्ट रुप से कह दिया, बर्दिया घटना की गम्भीरता के साथ छानबीन होगी और दोषी अधिकारियों के ऊपर कारवाही की जायेगी। राजदूत रे की इतनी सी प्रतिबद्धता ने माहौल को बदल डÞाला। एक दिन पहले तक नेपाल की कुछ राजनीतिक पार्टर्ीीउनके भ्रातृ संगठन और विभिन्न संघ-संस्थाएं जो भारत के विरोध में नाराबाजी और पर््रदर्शन कर रहे थे, अचानक शान्त हो गये। सामाजिक सञ्जाल फेस बुक में भारत विरोधी बात लिखना बन्द हो गया। आम लोगों का गुस्सा भी कम हो गया।
वैसै तो बात भी छोटी नहीं थी। एक राष्ट्र की र्सार्वभौमसत्ता की बात थी। अगर कोई दूसरा राष्ट्र र्सार्वभौमसत्ता के ऊपर आक्रमण करे तो एक सच्चा देशभक्त चुप नहीं बैठ सकता और बैठना भी नहीं चाहिए। दरअसल  बर्दिया में जो हुआ, उसे सही नहीं कहा जा सकता। भारत के कुछ पुलीस अधिकारियों ने हथियार के साथ नेपाली भू-भाग में प्रवेश किया। बर्दिया के गुलरिया -८ स्थित मञ्जूर प्रसाद श्रेष्ठ के घर पर छापा मारी। भारतीय पुलिस अधिकारियों का कहना था कि मञ्जूर ने एक अपराधी को छुपा रखा है, जिसपर भारत मेंे एक पुलिस की हत्या करने का आरोप लगा हुआ है। बात इतनी ही हर्ुइ लेकिन उसी दिन नेपाल के सभी राजनीतिक दल, उनके भ्रातृ संगठन, सञ्चार क्षेत्र और र्सवसाधारण भारत के विरोध में खुलकर नाराबाजी और विरोध करने लगे। सभी का कहना एक ही था- अपराधी को सजा मिलनी चाहिए लेकिन अपराधी पकडÞने का भारत का तरीका ठीक नहीं हुआ।
भारत उत्तर प्रदेश गाजियावाद के रसल झा भी ऐसा ही सोचते हैं। और कहते हैं कि कभी-कभी दोनो देशो की सुरक्षा इतनी महत्वपर्ूण्ा हो जाती है कि प्रशासन प्रोटोकल भूल जाता है। बर्दिया में भारतीय पुलिस ने जो किया उसे सही तो नहीं कहा जा सकता लेकिन उनकी नियत खराब नहीं थी। वह आगे कहते हैं- भारतीय पुलिस की छापा हो या गौमत बुद्ध के जन्म को लेकर चलाये गये विवाद दोनों राजनीतिक फायदे के लिये किया जा रहा है।
बर्दिया घटना को लेकर नेकपा माओवादी के नेता मोहन वैद्य ने स्पष्ट रुप में कह दिया- भारत बारम्बार हम लोगो को आँख दिखा रहा है, जो कतई सहनीय नहीं। नेपाली काँग्रस, नेकपा एमाले, एकीकृत माओवादी, राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टर्ीीेपाल लगायत नेपाल के जितने भी छोटे और बडे दल हंै सभी का कहना यही था। संविधान सभा चुनाव मंे जा रहा इस राष्ट्र के नेताओं को  इससे अच्छा मौका कहाँ मिलता।
वास्तव में देखा जाय तो नेपाल और भारत के बीच एक अजीब संबन्ध है। यह संबन्ध कोई आज का नहीं। शास्त्र गवाह है, जनकनन्दिनी सीता जी का विवाह अयोध्या के राजकुमार रामचन्द्र जी के साथ हुआ। भगवान गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के कपिलवस्तु में हुआ लेकिन ज्ञान की प्राप्ति हर्ुइ बोधगया में । अभी भी देखा जाय तो तर्राई क्षेत्र के अधिकाँश परिवार में नेपाल भारत के बीच पारिवारिक संबन्ध है। कितनों ने बटी की शादी भारत में की है तो कितनों ने भारत से बहू लाया है। नेपाल और भारत के बीच राजनीतिक तौर पर क्या संबन्ध है, उनको पता नहीं । उनके बीच तो पारिवारिक संबन्ध है।
व्यवहार में भी देखा जाय तो दो देशों का संबन्ध तो तब बनता है जब दो देश के दो व्यक्ति के बीच संबन्ध बनाता है। जब दो देश के व्यक्ति रिश्ते में बंधते हैं तो एक नयां संबन्ध बनता है। फिर वह जुडÞता है। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दौर से और भावात्मक रूप से। दूर देश की बात हो तो जुडाव उतना नहीं होता लेकिन जब बात होगी नेपाल भारत की तो यहाँ से जुडÞाव स्वाभाविक है। क्योकि यह हमारे सबसे निकटतम पडÞोसी है। जो हमारे हर सुख दुख में साथ रहता है। इन दोनों राष्ट्रों के बीच के संबन्ध को और गहर्राई से समझने की कोशिश करें तो हम पातें है, इक्कीसवीं सदी में भी इन दोनों के बीच कोई सीमा नहीं। लोग बिना पार्सपोर्ट और भिसा के एक दूसरे राष्ट्र में आ जा सकते हैं। पूरव मेची से लेकर पश्चिम महाकाली तक देखें तो लगभग १५ सौ किलोमीटर नेपाली भू भाग भारत से जुडा हुआ है। सीमावर्ती क्षेत्र के लोग एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं। नेपाल की सीमावर्ती गाँव की बात की जाय तो स्थिति और भी अजीब है। लोग खाना खाते हैं नेपाल में और पान खाने के लिए भारत जातें है। लेकिन इतना करीब होने के बाबजूद भी दुराव क्यों – सामान्य जनता को कहाँ है इतनी फुर्सत कि दुराव फैलाए या दोनो के बीच भ्रम की खेती करे। तो फिर आखिर कौन है जो दोनो के बीच भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं, कौन दुराव फैला रहा है –
प्राज्ञ डाक्टर सञ्जिता वर्मा दुराव की बात से बिलकुल सहमत नहीं हैं। उनका मानना है- नेपाल और भारत के बीच तो कोई दुराव है ही नहीं, चाहे सामाजिक, धार्मिक या आर्थिक तौर पर  हो दोनों एक दूसरे से जुडÞे हुए हंै। वह आगे कहती हैं कुछ राजनीतिक लोग कहें या मुठ्ठी भर कुछ लोग है, जो अपने फायदे के लिए खेल खेल रहे हैं, दुराव फैला रहे हैं। वैसे लोग जिधर फायदा देखेंगे, उधर ही झुक जाएंगे।
डाक्टर वर्मा की बातें यथार्थ से बहुत नजदीक हैं। वास्तव में कुछ लोग खेल खेल रहें है और ऐसे लोग दोनो देशों में हंै। अधिकांश लोगो का मानना है कि पुलिसकर्मी, कस्टम वाले, मिडियाकर्मी, बस और ट्रेन के टिकट चेकर और कुछ राजनीतिकर्मी अपने फायदे के लिए दुराव उत्पन्न कर रहे हैं।
पिछली बार ट्रेन से पुणे जाते वक्त लोकेन्द्र केसी को जो दिक्कत आयी वह पर्याप्त है यह समझने के लिए कि आम नेपाली में भारत के प्रति नकारात्मक विचार क्यों है। लोकेन्द्र कहतें है- पूरा पैसा देकर ट्रेन का टिकट लिया मगर टिकट चेकर ने तुम्हारी टिकट गलत है कहते हए बार-बार पैसा एंेठा। दूसरे  मुल्क में था मंै कर भी क्या सकता था। हाँ, लेकिन यह बात केवल भारत में नहीं होता कुछ ऐसा ही आलम नेपाल का भी है।
भारतीय पुलिस की ही बात नहीं नेपाल पुलिस भी कम नहीं। पिछले कुछ दिनों की बात है भारत गुजरात के एक परिवार देवों का देव महादेव के दर्शन के लिए पशुपति नाथ आये थे। भीडÞ भाडÞ में चोरों ने एक महिला का सोने का चेन झपट लिया। महिला के पति पशुपति परिसर स्थित पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करने गया। वह चोर भी वहीं पहुँच गया और बोला पाँच हजार रुपया खर्च करो तुम्हार चेन मिल जायेगा। महिला ने चोर को पहचान लिया, अपने पति को बताया और पति ने पुलिस को। परिणाम यह हुआ कि चोर और पुलिस दोनो मिल के उस परिवार को पीटने लगे। बडÞों की तो बात ही न करें पशुपति परिसर की उस पुलिस ने १३ और १४ वर्षके उनके बेटे बेटियों  को भी नही छोडÞा। बाँस की लाठी से बहुत पीर्टाई की। जब काफी हल्ला हुआ तो बहुत सारे लोग इकठ्ठे हो गये और उस बेचारे गुजराती परिवार की जान बच गयी। गुजराती तर्ीथ यात्री कह रहा था- भारतीय कह कर हम लोगों के साथ दर्ुर्व्यवहार किया गया। अब कभी नहीं आना इस देश में जहाँ पुलिस भी चोरों का साथ देती है।
नेपाल घर होकर भारत की राजधानी नई दिल्ली में एडुकेसनल कन्सलटेन्सी चला रहे सुधीर कुमार ठाकुर का भी मानना है कि  दोनो ही मुल्कों की जनता में काफी भाइचारा है। लेकिन दोनों देशों के मुठ्ठी भर अवसरवादी लोग संबन्धो को विगाडÞने में लगे हैं। खास कर नेपाल में जब राजनीतिक उथल-पुथल का मौसम रहता है तो ऐसी घटनाएं तूल पकडÞ लेती हैं।
वास्तव में कुछ ऐसे ही लोग दोनो राष्ट्रो के बीच दुराव उत्पन्न कर रहे हैं। ऐसे लोग दोनो राष्ट्रों में हैं। अगर भारत की राजधानी नई दिल्ली की बात की जाय तो वहाँ नाइट गार्ड, होटल मजदूर और दरवान अधिकांश नेपाल के हैं। उनका भी नाम है, एक अलग पहचान है, लेकिन दर्ुभाग्य की बात है- उन को नाम से नहीं बहादुर, कान्छा और गोरखा के नाम से बुलाया जाता है। नेपाल की बात करें तो भारतीय नागरिक के लिए  धोती, भैया लगायत का शब्द प्रयोग किया जाता है। शब्द कोई अच्छा या खराब नहीं होता लेकिन जिस भाव से इसका प्रयोग हो रहा है, निःसन्देह यह दोनों देशों के लिए अच्छा नहीं।
कुछ माह पहले नेपाली काँग्रेस के सभापति सुशिल कोइराला भारत गए थे तो वहाँ उनका भब्य स्वागत हुआ था।  कोइराला ने नेपाल भारत संबन्ध तो युगों युगों का है, बताया था तो भारत के नेता गण ने भी दोनो के संबन्धों को विशिष्ट माना है । लेकिन सिर्फभाषणबाजी से संबन्ध सुमधुर और विशिष्ट नही बनते। दैनिक जीवन की छोटी-छोटी समस्या जिनको हम अनदेखा कर देते है, वही धीरे-धीरे नासूर बन जाता है। और जब उस नासूर को अन्त्ा करने की सोचते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
नेपाल और भारत के बीच क्षेत्रफल और आबादी के हिसाब से बहुत भिन्न है लेकिन यह एक ध्रुव सत्य है कि दोनो राष्ट्र पडÞोसी हैं। पडÞोस में शान्ति नहीं, खुशी नहीं समृद्धि नहीं तो आप भी कभी खुश और शान्त नहीं हो सकते। प्रभाव तो पडÞेगा ही। ऐसी स्थिती में दोनो राष्ट्रों को चाहिए कि सिर्फबडÞी बडÞी समस्या के बारे में नहीं सोचें। बडÞी बडÞी समस्याओं का समाधान तो तुरन्त हो जाता है।
समाज में सबसे विशिष्ट संबन्ध माना गया पति पत्नि के संबन्ध को। लेकिन वहाँ भी जब विश्वास कम होता है, छोटी छोटी बातों को जब नजरन्दाज करते जातें है तो धीरे-धीरे वहीं विवाद पैदा हो जाता है। एक दिन ऐसा आता है कि सामंजस्य बिठाना ही मुश्किल हो जाती है और नौबत आ जाती है तलाक तक की। बेहतर यही होगा कि बात वहाँ तक पहुँचे ही नहीं। िि

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