प्द्मावत एक अमूल्य कृति

डा. श्वेता दीप्ति:हिन्दी साहित्य के इतिहास में जायसी और उनकी ‘पद्मावत’ को अत्यन्त ही महत्वपर्ूण्ा स्थान प्राप्त है।
‘पद्मावत’ में जायसी ने एक पंक्ति लिखी है(‘धन्य पुरुष जस कीरत जासू, फूल मरै पै मरै न वासू।’
फूल मुर्झा जाते हैं, पर उसकी सुगन्ध दिगन्त में शेष रह जाती है। ठीक उसी तरह मनुष्य काल की निर्मम धारा में बह जाता है, पर उसकी कर्ीर्ति कौमुदी युग-युगान्तर तक मानवता का पथ पर््रदर्शन करती रहती है।
जायसी का पद्मावत सम्पर्ूण्ा काव्य यात्रा में ऐसा ही आलोक स्तम्भ सिद्ध हुआ है।
पद्मावत की जिस काल में रचना हर्ुइ वह काल संक्रान्ति काल था। इस समय भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक स्थिति अत्यन्त ही शोचनीय थी। सम्राट अकबर की साम्राज्यवादी नीति ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। फलस्वरूप उसके काल में जो शान्ति का व्यवस्थित रूप देखने को मिल रहा था, वह शाहजहाँ अथवा औरंगजेब के समय में नहीं था। सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियाँ सिद्धों और नाथों की वजह से अत्यन्त दुरूह, संकर्ीण्ा और संकुचित हो गई थी। हिन्दू राज्यों के भग्नावशेष पर मुसलमानों का आधिपत्य था। हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं पर कुठाराघात हो रहे थे, फलस्वरूप इनकी मनोवृत्ति अत्यन्त संकुचित हो गई थी। सिद्ध पर्ूर्वी भाग और नाथ पश्चिमी भागों में बढÞते चले जा रहे थे। कुछ मतभेदों के साथ इनका बोलबाला हिन्दू एवं मुसलमान दोनों पर छाता जा रहा था। उस डाँवाडोल परिस्थिति में धर्म के लोकरंजनकारी भावनाओं के द्वारा जो लोकहित के कार्य किए जा सकते थे, वह सिद्धों और नाथों के चलते नहीं हो सकता था।र्
धर्म का प्रवाह कर्म, ज्ञान और भक्ति तीन धाराओं में चलता है। एक के अभाव में दूसरा अपंग हो जाता है। कर्म के बिना लूला लंगडÞा, ज्ञान के बिना अंधा और भक्ति के बिना समाज निष्प्राण हो जाता है। समाज की यही स्थिति उस समय थी। सिद्धों और नाथों ने जनता को लोक कल्याण से दूर कर दिया था और रहस्य लोक के करीब ला दिया था। गुह्य, रहस्य एवं सिद्धि ही उनका लक्ष्य था। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि उनका प्रभाव सब पर समान रूप से था। कुछ शास्त्रज्ञ विद्वान ऐसे भी थे जो इनके प्रभाव से अछूते थे। ब्रहृमसूत्रों, उपनिषदों एवं गीता आदि पर वाद-विवाद चल रहे थे, तथा भक्ति पक्ष के नए रूप सामने आ रहे थे। र्सवप्रथम महाराष्ट्र के नामदेव ने हिन्दू एवं मुसलमान दोनों को एक सामान्य भक्ति मार्ग का आभास दिया। उसके पश्चात् कबीर ने उस मार्ग को और प्रशस्त किया। नाथ पंथियों ने जो अन्तःसाधना पर जोर दिया था वह हृदय पक्ष से शून्य था। रागात्मक तत्व से रहित साधना से मनुष्य की आत्मा तृप्त नहीं हो सकती। अतः भारतीय वेदांत का सहारा लेते हुए कबीर ने सूफियों का प्रेम तत्त्व लिया और अपना निर्गुण पंथ चलाया। कबीर तथा अन्य निर्गुण पंथी के द्वारा रागात्मिका भक्ति और ज्ञान का योग तो हुआ पर कर्म का पक्ष यों ही पडÞा रहा। इसी कर्म के अभाव की पर्ूर्ति के लिए रामभक्ति शाखा का प्रादर्ुभाव हुआ।इस प्रकार देश में सगुण और निर्गुण के नाम से भक्ति काव्य की दो धाराएं विक्रम की १५वीं शताब्दी के अन्तिम भाग से चल पडÞी। भक्ति के इस उत्थान काल में कबीर का निर्गुण पंथ ही पहले आया, यही निर्गुण धारा दो शाखाओं में विभक्त हर्ुइ- ज्ञानाश्रयी शाखा और शुद्ध प्रेममार्गी शाखा। इसी प्रेममार्गी शाखा के अर्न्तर्गत प्रेमाख्यानक काव्य लिखे गये। इनमें कुतुबन की ‘मृगावती’, मंझन की ‘मधुमालती’ और जायसी की ‘पद्मावत’ अत्यन्त ही महत्वपर्ूण्ा मानी जाती है।
‘प्ाद्मावत’ प्रेम काव्य है, परन्तु एक प्रश्न उठता है कि इसमें वणिर्त प्रेम का स्वरूप लौकिक है या आध्यात्मिक या फिर जायसी ने इसमें लौकिक प्रेम एवं सौर्न्दर्य के माध्यम से अलौकिक सत्य की व्यंजना की है। अथवा यह अलौकिक सत्य प्रसंगवश जायसी के मुख्य प्रतिपाद्य का एक अंग मात्र बन कर सामने आया है। हिन्दी के अधिकांश आलोचक पद्मावत में निरुपित प्रेम को अलौकिक या आध्यात्मिक मानते हैं और इसी कारण से पद्मावत में वणिर्त सौर्न्दर्य को भी अलौकिक सौर्न्दर्य सिद्ध किया जाता रहा है। इस दृष्टिकोण से पद्मावत को रूपक काव्य कहा गया, और सिंहललोक वाली कथा को ही मुख्य माना गया।
इसके विपरीत ऐसे आलोचक भी हैं जिन्होंने दिल्ली और चित्तौडÞ वाली कथा को ही जायसी का मुख्य कथ्य मानकर इस काव्य को अर्द्घ-ऐतिहासिक प्रबन्ध काव्य माना है। आदर्श और यथार्थ की इस टक्कर में प्ाद्मावत का महाकाव्यत्व गौण होता चला गया है। पद्मावत महाकाव्य है या प्रबन्ध काव्य या फिर रूपक काव्य ये सवाल हमेशा से उठता आया है। सच तो यह है कि पद्मावत की कथा आदर्श और यथार्थ को साथ लेते हुए लोक और परलोक के  बीच सफर करता है। इस लोक और परलोक के बीच जो मध्य बिन्दु है, वह है सिंहललोक की राजकुमारी पद्मावती।
प्ाद्मावती लोक और परलोक को जोडÞने वाली सेतु है, इसलिए पद्मावत की कथा को अखंड माना जा सकता है। जायसी ने अत्यन्त ही कुशलता के साथ लोक और परलोक की वास्तविकता और यूटोपिया को एक कथा रूप में अनुस्यूत किया है। यही वजह है कि पद्मावत की कथा एक सूत्रीय हो गई है। अगर पद्मावत की कथा को दो खंडों में बाँटकर विचार किया जाता है तो कई भ्रान्तियाँ और असंगतियाँ उत्पन्न होती हैं। इसलिए कथा की समग्रता में ही पद्मावत का सौर्न्दर्य और उजागर होता है।
पद्मावत में एक लम्बी कथा कही गई है, जिसका सम्बन्ध कवि के मानस में अवस्थित सिंहललोक से लेकर इतिहास की कथा चित्तौडÞ और दिल्ली तक से है। यह सम्पर्ूण्ा कथा अपनी अन्विति में एक समरस तन्मयता के साथ आगे बढÞती है। जायसी के समग्र दृष्टिकोण को अगर समझना है तो इस कथा को पर्ूवार्द्घ और उत्तर्रार्द्घ में बाँटकर समझना उचित नहीं होगा। इस कथा का अंत पद्मावती के जौहर से होता है, अर्थात् कवि का उद्ेश्य पद्मावती के सतीत्व पर््रदर्शन में ही सन्निविष्ट है। इसमें राजा रत्नसेन और हीरामन तोता का संवाद, पद्मावती का जन्मोत्सव, यौवन वर्ण्र्ाा रत्नसेन का सिंहलगढÞ में घुसना, सात समुद्रों को पार करने का दुस्साहस, राजा को फाँसी देने की साजिश, रत्नसेन और पद्मावती का विवाह, नागमती का विरह-वर्ण्र्ाा रत्नसेन का अपने दल-बल के साथ समुद्र मार्ग से प्रस्थान, उसका समुद्र में बह जाना, समुद्र और लक्ष्मी की कृपा से रत्नसेन और पद्मावती का चित्तौडÞ वापस जाना, राघव चेतन की शैतानी, अलाउद्दीन का चित्तौडÞगढÞ पर आक्रमण, गोरा बादल की वीरता, देवपाल और रत्नसेन का परस्पर युद्ध और वीर गति पाना ये सारी कहानी अत्यन्त विस्तृत रूप में कही गई है।
लेकिन इन सभी कथाओं का उद्ेश्य है पद्मावती के शुद्ध सात्विक प्रेम को रत्नसेन की चिता पर चढÞाकर उसे लोकोत्तर दिव्यता प्रदान करना। यह तो र्सवविदित है कि पद्मावत प्रेमकाव्य है पर इसकी तुलना मुल्लादाउद, मज्जन अथवा कुतुबन के प्रेम काव्यों से नहीं किया जा सकता है। यह वह प्रेम कथा है,
जिसमें नायिका के प्रेम की आग में तत्कालीन इतिहास की हिंसा और क्रूरता भी जल जाती है। पद्मावत की कथा अपने सम्पर्ूण्ा रूप में विस्तृत भी है और उदात्त भी है। इसमें मुख्य कथा के साथ-साथ प्रासंगिक कथाओं को भी बुना गया है, जो मुख्य कथा के उद्ेश्य का ही पोषण करती है। इस कथा में इतिहास, कल्पना और लोक जीवन सबका समावेश हुआ है।
पद्मावत की शैली के ऊपर भी प्रश्न उठता आया है। कई विद्वान, आलोचक यह मानते हैं कि पद्मावत पर मसनवी शैली का प्रभाव है। यह विचार काफी हद तक सही भी है, परन्तु इसे सम्पर्ूण्ाता के साथ स्वीकारा नहीं जा सकता। पद्मावत के आरम्भ में परमात्मा का गुणानुवाद करके कवि ने मोहम्मद साहब तथा इनके चार यारों का स्मरण किया है। फिर तत्कालीन बादशाह दिल्ली के सुल्तान शेरशाह की प्रशंसा की है। साथ ही पीर एवं गुरू, जन्मस्थान, काव्य का निर्माण काल और अपने चार मित्रों आदि से सम्बन्धित कुछ बातों का उल्लेख किया है। यही कारण है कि पद्मावत को मसनवी शैली में लिखा गया माना जाता है। किन्तु, इसकी गहर्राई में जाने पर यह भी स्पष्ट ही दिखाई देता है कि इसमें भारतीय परम्परा का भी मणिकांचन योग हुआ है। जायसी ने दोनों पद्घतियों का बहुत ही सुन्दर सम्मिश्रण किया है।
प्रेम की चार पद्घतियाँ मानी गई हैं(
१. शादी के बाद का प्रेम, जो जीवन के संकटमय क्षणों में अपना उग्र रूप एवं परिपक्व रूप दिखाता है, जैसे( राम और सीता का प्रेम।
२. एक प्रेम वह है जो शादी से पर्ूव होता है और वियोग में उसकी तीव्रता का अनुभव होता है और फिर संयोग की घडÞी भी आती है और उनकी शादी होती है, जैसे- दुश्यन्त और शकुन्तला का प्रेम।
३. तीसरे प्रेम में निम्नता होती है। इसकी उद्भावना घर में, रंगमहलों आदि में होती है। यह पुरुष की स्त्रैणता का परिचय देता है, जैसे( कपूर मंजरी आदि का।
४. यह प्रेम श्रवण, स्वप्न आदि के कारण होता है, जैसे- उषा और अनिरुद्घ।
ज्ाायसी का प्रेम इस चौथे प्रकार का है। मसनबियों की कथा सर्गों में विभक्त नहीं होती। केवल प्रसंगवश शर्ीष्ाक दे दिए जाते हैं। पद्मावत के आरम्भ में भारतीय काव्यों में चिराचरित मंगलाचरण योजना की काव्य रूढि का पालन किया गया है। यही नहीं कवि ने अन्य विभिन्न रूढियों यथा( द्वीप वर्ण्र्ाा गढÞ वर्ण्र्ाा राज प्रासाद वर्ण्र्ाा नगर वर्ण्र्ाा सेना वर्ण्र्ाा युद्घ वर्ण्र्ाा सौर्न्दर्य वर्ण्र्ाा हाट बाजार, समुद्र वर्ण्र्ाा प्रकृति वर्ण्र्ााआदि का भी परम्परागत अनुशरण किया है। अतः यह न्रिर््रर्ाा रूप से कहा जा सकता है कि पद्मावत भारतीय आख्यान काव्यों की ही परम्परा में आता है।
ज्ाायसी ने पद्मावत की रचना एक मात्र चौपाई दोहा शैली में की है। इस कृति में साद्यान्त चौपाई छन्द की सात अर्द्घर्ाायों के पश्चात् एक दोहे का क्रम रखा गया है। आर्या या श्लोक और गाथा का जो स्थान प्राकृत में है वही स्थान दोहा छन्द को अपभ्रंश में प्राप्त है। दोहा अपभ्रंश का प्यारा छन्द रहा है।
च्ौपाई-दोहा छन्दों के माध्यम से आख्यानक काव्य लिखने की परम्परा र्सवप्रथम अपभ्रंश में मिलती है। अपभ्रंश के प्रायः सभी चरित काव्य कडवकबद्घ हैं। पद्घडिया, अरिल्ल, बदनक, पारणक जैसे पन्द्रह या सोलह मात्रा प्रतिपाद वाले छन्द की कतिपय पंक्तियाँ लिखकर अन्त में एक धत्ता रखने की परम्परा अपभ्रंश में प्रचलित थी। उसे कडवक शैली कहा जाता है। पद्मावत में इसका प्रभाव कहीं-कहीं मिलता है। जायसी की चौपाईयों में मात्राओं की न्यूनाधिकता भी मिलती है। सामान्यतया चौपाई का शास्त्रीय नियम यह है कि उसके प्रत्येक चरण में सोलह मात्राएं होती हैं तथा अन्त में गुरू, लघु नहीं होते। किन्तु जायसी ने पद्मावत में १४, १५, १६, १७ मात्रा प्रतिपाद वाले छन्दों का भी प्रयोग किया है। इसका यह अर्थ नहीं है कि जायसी छन्द के शास्त्रीय नियम से अनभिज्ञ थे। वस्तुतः जिस प्रकार अपभ्रंश की कडवक शैली में विभिन्न मात्रा वाले छन्दों का कडवक के मुख्य कलेवर में प्रयोग होता था, ठीक उसी प्रकार जायसी ने भी किया है।
ज्ाायसी ने चौपाई -चतुष्पदी छन्द) का प्रयोग द्विपदी की भाँति किया है। तथा दोहों का अवलोकन करने पर भी यह पता चलता है कि जायसी ने कई जगहों पर नियमों का उल्लंघन किया है। दोहों का शास्त्रीय नियम है कि इसके विषम चरणों में तेरह तथा सम चरणों में ग्यारह मात्राऐं होती हैं। किन्तु पद्मावत के दोहों में यह नियम नहीं मिलता है। इसकी वजह से जो व्यक्ति इन छन्दों को दोहा मानना चाहते होंगे उन्हें जायसी की यह कमी अवश्य खलेगी पर जिन्हें अपभ्रंश के चरित काव्यों में कडवक के अन्त में आने वाले धत्ता में प्रयुक्त विविध छन्दों की जानकारी है वे इसे प्राचीन छन्द रूढÞी का अनुशरण करने की प्रवृत्ति ही मानेंगे।
वस्तुतः चौपाईयों के उपरान्त आने वाले ये छन्द दोहा जैसे दिखलाई अवश्य देते हैं किन्तु दोहा हैं नहीं। इसलिए इनमें १३, ११ मात्रा के स्थान पर १२, १२ या १३, १३ या १४, ११ या ११, १३ या १४, १२ या १४, १३ आदि के नियम भी मिलते हैं। इन्हें जायसी की असावधानी या अनभिज्ञता का परिणाम स्वीकार करना सही नहीं है। इनकी योजना जायसी ने जानबूझ कर की है और वह अपभ्रंश के चरित काव्यों की छन्द योजना के अनुसार ही है। इसलिए यह स्पष्ट है कि जायसी ने पद्मावत में भारतीय परम्परा का ही अनुशरण किया है और इस आधार पर पद्मावत को पूरी तरह मसनवी शैली पर आधारित नहीं माना जा सकता है।
पद्मावत की भाषा अवधी है। अवधी भाषा का जैसा ठेठ रूप और मर्मस्पर्शी माधर्ुय इसमें मिलता है, वैसा अन्यत्र दर्ुलभ है। अवधी भाषा के इस उत्तम काव्य में मानव जीवन के चिरन्तन सत्य प्रेमतत्व की उत्कृष्ट योजना है। पद्मावत में दोहा चौपाई का जो सौष्ठव रूप देखने को मिलता है वह अवधी भाषा में ही सम्भव था, अन्य किसी भाषा में नहीं। पद्मावत की जिस समय रचना की गई, उस समय की एक विशेषता देखने को मिलती है। उस समय जो भी प्रेम कथा लिखी गई, उसे लिखने वाले प्रायः मुसलमान कवि थे। इन्होंने हिन्दुओं की कथा इन्हीं की भाषा में कह कर यह साबित कर दिया कि मानव मन एक ही तार से जुडÞा हुआ है। जिसे छूते ही मनुष्य सारे बाहरी रूप-रंग के भेदों की ओर से ध्यान हटा कर एकत्व का अनुभव करने लगता है।
जायसी के प्रेम काव्य की एक और विशेषता है जो अत्यन्त ही स्पृहणीय है। यह कथानक प्रेम पर आधारित है परन्तु स्थूल प्रेम का कहीं भी आभास नहीं मिलता है। जायसी ने मानसिक व्यापार ही अधिक दिखाया है जो संयोग के कम वियोग के अधिक हैं। यद्यपि जायसी में विरह वर्ण्र्ााका प्राधान्य है किन्तु बिहारी की नायिकाओं के समान इन्होंने अपनी नायिका को नहीं बनाया है। पद्मावत में जीवन गम्भीरता से उपस्थित हुआ है। जायसी के पास न तो सूर और तुलसी की तरह दार्शनिक और सुधारवादी दृष्टिकोण है और न ही रीतिकालीन कवियों की तरह मनोरंजन के तत्त्व। उन्होंने तो आदर्श और यथार्थ का समन्वित रूप पद्मावत में प्रस्तुत कर डाला है जो निश्चय ही श्रेष्ठ है। पद्मावत की कथा मानवीय व्यापारों के प्रति एक पीडÞा है, और यही पीडÞा मनुष्यता की विभूति बन कर समस्त मानव जाति को मान-   वता और आदर्शवाद का संदेश दे जाती है। निःसंदेह पद्मावत हिन्दी साहित्य जगत की एक अनुपम और अमूल्य कृति है। त्र

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