प्याराडाइम सिफ्ट

Randhir Chaudhary

रणधीर चौधरी

अँङग्रेजी शब्द प्याराडाइम सिफ्ट के लिये हिन्दी शब्दकोष में “प्रतिमान विस्थापन” शब्द दिया गया है । जिसका सरल अर्थ इस प्रकार से समझा जा सकता है ।  “प्रति” का अर्थ एक प्रत्येक,  मान का अर्थ महत्व और विस्थापन का अर्थ अपने स्थान से हिल जाना अथवा पहले की अवस्था मे परिवर्तन आना । अप्रील २५ के महाभूकम्प ने नेपाल को झकझोर कर रख दिया है, खासकर पहाड़ी इलाकों को ।  धन–जन की क्षति को देखा जाय तो, पुनर्निर्माण के कार्य को नेपाल अपने बूते पर कर सकता है ऐसा प्रतीत नही होता । लेकिन इस लेख का टारगेट थोड़ा अलग है । सतही रूप मे दिखने वाले भूकम्प के असर से थोड़ा अलग हमारी कोशिश है, भुकम्पीय पर्दे के ओट मे खिल रहे गुलाें को, सुक्ष्म पाराडाइम सिफ्ट और पड़ने वाले असर को हिमालिनी के पन्नो के मार्फत बाहर लाना ।  Earthquack 9
पहाड़ से नीचे
अप्रील १२ के भूकम्प ने पहाड़ को जिस तरीके से तबाह किया है, सबका का दिल विचलित हो उठा है । परंतु प्रश्न आता है, क्या भूकम्प के कहर ने सिर्फ पहाड़ को हिलाया ? काठमाण्डौ में घर बनाकर रहने वालों पर ही भूकम्प का असर पड़ा है ? बिल्कुल नहीं । इस महाप्रलय ने देश को दो तरीकों से प्रभावित किया है ? प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष । काठमााण्डौ लगायत अन्य पहाड़ी जिलो में प्रत्यक्ष असर दिखा है । वहीं मधेश लगायत देश के कई अन्य जिलों के खास समुदाय जिनका राज्य मे कोई पहुँच नहीं है उनमे ७.९ म्यागनीच्यूड का जोरदार अप्रत्यक्ष असर पड़ा है । जिस को अनदेखा किया जा रहा है राज्यद्वारा । जापान, हाइटी, चिली, श्रीलंका लगायत कई देशाें ने नेपाल जैसी तबाही को झेला है । इन देशो की तबाही का इतिहास देखा जाय तो तबाही के बाद दिखने वाली चुनौती के अन्र्तगत “इन्टरनली डिसप्लेसड पीपुल” (आइ.डी.पी) अर्थात आन्तरिक रूप में विस्थापित लोगाें की समस्या का हल निकालना एक अहम चुनौती के रूप में लिया गया और लिया जाता है । क्या नेपाल मे भूकम्प के बाद आइ.डी.पी की समस्या नहीं दिखाई दे रही है ? मई २४ की यू.एन.डी.पी और मई २६ के महिला एवं बालबालिका आयोग में बैठे दोनो मीटिङ ने मुझे चौंका दिया था । दोनों मीटिङ में– भूकम्प के बाद पुनर्निर्माण एबं व्यवस्थापन में संभाबित क्राइसिस और चुनौती पर अपना विचार प्रकट करना था ।  सब को सुनने के बाद जब अन्त में मैंने पहले आई.डी.पी की समस्या को रखा । विचार रखने के क्रम में मैंने अनुभव किया कि सबकी वक्र दृष्टि मेरी ओर थी और यह दोनों बैठकों में देखने को मिला । भूकम्प के बाद हजाराें की  तादाद में मधेसी, दलित, आदिवासी, जनजाति, मुस्लिम लगायत अन्य सीमान्तकृत वर्ग काठमाण्डू से विस्थापित हुए हंै ।  दिन भर अपना श्रम बेचने के बाद दो वक्त की रोजी रोटी का उपाय करके जीने बाले इन समुदाय के लोगों के पुनस्र्थापना के लिये सरकार के पास क्या योजना है ? सम्भवतः कुछ नही ।  जिसको बयाँ करता है उपर लिखित दोनो मीटिङो का मेरा अनुभव ।  मई २० को ‘द काठमाण्डू पोस्ट’ में प्रकाशित जोन वेभन के लेख “बियोन्ड द भ्याली” को आधार माना जाय तो सिर्फ रौतहट जिला में लगभग दस हजार जनसंख्या आन्तरिक रूप में विस्थापित हुए हैं ।  तराई मानव अधिकार रक्षक संजाल (थर्ड एलायन्स) द्वारा आई.डी.पी पर रिपोर्ट बनाने का जिम्मा मुझे सौंपा गया है । इसी सिलसिले में मंैने कई लोगों के विचारों को लिया । फुलबरिया–२, सप्तरी के रहने बाले कमलेश प्रशाद शाह जो की पिछले ५  साल से काठमाण्डू में इलेक्ट्रीसियन का काम कर अपने परिवार (आठ सदस्य) का सहारा बना हुआ है । भूकम्प के बाद कमलेश को अब उतना काम नहीं मिल रहा है काठमाण्डू में जिससे कि अपने घर के लिए रोटी का उपाय कर सके । ऐसे कहानियाें का पात्र कई हैं, जहाँ सरकार की नजर पहुँचनी चाहिये  ।
पर्दे के पीछे
महाभूकम्प के बाद हर एक का अपना–अपना स्वार्थ सामने आता दिखा और दिख रहा है । पर्दे के बाहर जितनी ईमानदारी दिखी, पर्दे के भीतर देखने के बाद कुछ अजीब सा लगना अस्वाभविक नहीं । हम राजनीतिक रूप से कितने पीछे हैं उस पर कोई अनुसन्धान की आवश्यकता नहीं ।  थोड़ी बहुत राजनीतिक कन्सर्न से इसको समझा जा सकता है  । जैसे कि, भूकम्प के बाद पुलिस और सेना की सनसनी तारीफ । भूकम्प के बाद इनके द्वारा दिखाई गई कार्यगत अग्रसरता की सराहना हमें करने हीं चाहिये ।  साथ साथ हमें यह नही भूलना होगा कि पुलिस और सेना का असल काम इसी समय तो पड़ता है ।  आम जनता के टेक्स से ही तो इन सभी का खर्चा पानी चलता है । किसी भी राष्ट्रीय क्राइसिस के समय हमे बहुत क्रिटीकल होने की आवश्यकता पड़ती है, खासकर राजनीतिक हिसाब से । अप्रील २५ की महाभूकम्प के बाद ऐसा लगने लगा था कि नेपाल को चलाने का जिम्मा नेपाली सेना, पुलिस और कुछ विदेशियों को सौपा गया है । राजनीतिक असफलता स्पष्ट दिख रही थी देश में और यह बिलकुल खतरे से भरी बात है ।  नेपाली छापा में भी पुलिस, सेना द्वारा उनको सौंपे गए कार्य करने के बाद अधिक से ज्यादा कवरेज दिया जा रहा था और यह प्रक्रिया अभी भी रुका नही है । जरुरी नही नेपाल में ऐसा ही हो ,परंतु ऐसा कई बार देखा गया है कि  राष्ट्रीय संकट के बाद आम जनता की भावना को हिप्नोटाइज कर थोड़ा बहुत बल प्रयोग कर सत्ता अपने हाथ मे सेना ने ले लिया है ।
नेपाल के अन्तरिम संविधान मे संघीयता शब्द को जगह मधेसियाें ने दिलाया, ये सर्वविदित है । क्या ऐसा नही लगता कि अब संघीयता शब्द भी भूकम्प के बाद संघीयता विरोधियाें के एजेन्डा तले दब गया है ? वैसे भी संविधान सभा—२ के बाद इस शब्द का आकर्षण कम होने लगा था और जिसका कारण था मुदा विसर्जनवादी माओवादी के सहारे मधेशवादी दलों के राजनीतिक पथ की शुरुआत । आज देश–पुनर्निर्माण की चर्चा चल रही है । हमें अवश्य पता होना चाहिये की यह निर्माण सारे देश की नहीं बल्कि उस १४ जिलाें की होगी जो भौतिक रूप से बिखर गए हैं । जहाँ १४ जिलों को स्वर्ग बनाने की बात चल रही है वही आन्तरिक रूप में विस्थापित मधेसियाें के लिये क्या योजना है सरकार के पास ?  मधेसी नेताओ के राजनीतिक एजेन्डाओं में यह मुद्दा शामिल हुआ है की नही ? अनजान मधेशी आज भले ही नहीं, परन्तु समय आने पर स्थाई सत्ता के व्यापारियाें से हिसाब किताब जरूर करेगी ।  भले ही वह काठमाण्डू का ठेकदार हो या फिर चुनाब जीतने के बाद काठमाण्डौ को अपना निर्वाचन क्षेत्र मानने वाले मधेशी नेता ।
मधेस, पहाड़ और मीडिया
नेपाल के अन्तिरिम संबिधान के धारा १२ (ङ) के मुताबिक कोई भी व्यक्ति नेपाल के किसी भी कोने मे जा कर बसोबास कर सकता है और यह एक अच्छी बात है । सन्दर्भ है भूकम्प के बाद पहाड़ी जनसङख्या को मधेस में पुनसर््थापन करवाना और इस पर सरिता गिरी और सी.के राउत की प्रतिक्रिया । इस भूकम्प के बाद  हरेक मधेसी के घर से राहत के नाम पर कुछ न कुछ पहाड़ के लिए निकला । थर्ड एलायन्स ने तो “मधेस विथ पहाड़” एक अभियान ही चलाया है  । इसी अभियान के तहत पहाड़ के उस जगह राहत बाँटी गई जहाँ सम्भवतः पहले कोई नहीं पहँुचा था राहत ले कर । जी हाँ, बात है मई ९ की, राहत सामग्री लेकर सिन्धुपालचौक के गोलछे पञ्चायत की जनता को बाँटा गया  । गोल्छे जाने समय रास्ते मे सेना द्वारा भी भौगोलिक रूप मे सुलभ जगहाें पर बाँटा जा रहा था । क्या थर्ड एलायन्सद्वारा किये गये राहत वितरण कार्य को समाचार बनाया गया ? बिलकुल नही ।  समाचार बनाया गया गिरी की टुईट और राउत का बयान को । गिरी के अनुसार भूकम्प पीडि़ताें को मधेस मे पुनस्र्थापन करबाना महेन्द्र नीति को निरन्तरता देना है । राउत के अनुसार अगर पहाडि़यो को मधेस में बसाया गया तो गृहयुद्घ हो सकता है ।  इस दो अभिव्यक्ति को नेपाली मीडिया मे जोर शोर से उठाया गया ।
कितनी अजीब बात है नेपाली मीडिया कभी कुछ विश्लेसणात्मक समाचाार क्यों नही बनाती ।  धारा १२ (ङ) को इन्डोर्स करते हुए यही लगता है कि किसी भी समुदाय को कही पुनस्र्थापन करवाने से पहले उन लोगों से पूछना चाहिये कि क्या आप को कल्चरल ग्याप पसंद है ? जीयोग्राफिकल ग्याप पसंद है ?
आवश्यकता भावुकता से बाहर आने की
हर्वार्ड विश्वविद्यालय के अनुसन्घानकर्ता ए.अलेसिना और रेइच के अनुसार—“ राष्ट्र निर्माण एक प्रक्रिया है जहाँ हरेक नागरिकों को अपने स्वार्थ, लक्ष्य और प्राथमिकता के प्रति साझा और बराबरी की बिशेषता महसूस करने का माहौल बनना चाहिये । ताकि उन लोगाें में अलग होने की इच्छा भी पैदा न हो ।  राज्य के मठाधीसों को इस परिभाषा पर अमल करना चाहिये । भूकम्प से प्रत्यक्ष प्रभावित भले ही पहाड़ी जिला है, परंतु इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव और दूरगामी असर पर सरकार की नजर नहीं गई तो अन्जाम क्या होगा यह तो समय बतायगा । यह एक पाराडाइम सिफ्ट ही है कि संघीयता के मुद्दो को दबाया जा रहा है । जाग कर रहना होगा मधेसी जनता को । समय है भाव और प्रभाव से हटकर स्वभाव में रहकर अपना राजनीतिक मुद्दाें को जीवित रखना ।  भूकम्प के नाम पर भावुकता में बहना खतरा से खाली नही ।
कहते हैं कि, गिरना भी अच्छा है, औकात का पता चलता है । बढ़ते हैं जब हाथ उठाने को, अपनाें का पता चलता है ।

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