प्रकृति और मानव

umranisinghघर का बगीचा मन को अत्यधिक सुकून देता है । जब कभी मन उदास हो, या अपने आप को अकेला महसूस करें तो अपने घर के बगीचे में एक बार घूम जाईए, बगीचे की हरियाली मन में उतर आएगी । बगीचे की तरह मन भी हरा भरा हो जाएगा । ऐसा लगता है, पेडÞ-पौधे हमसे बातें करते हैं ।
कहते हैं, कृष्ण भगवान जब ब्रज में थे, तो गोपियों को प्रकृति हरी भरी दीखी थी, चन्द्रमा शीतलता प्रदान करता था, और जब कृष्ण भगवान मथुरा चले गए तो वही प्रकृति सूखी और नीरस नजर आने लगी, चन्द्रमा अग्नि बरसाने वाला और शरीर को जलाने वाला नजर आने लगा । सत्य है, हमारे मन की उदासी और आनन्द का प्रभाव प्रकृति पर भी पडÞता है । अपना मन उदास हो तो प्रकृति, उदास दिखती है, अपना मन आनन्दित हो तो प्रकृति भी आनन्दमयी दीखती है । मतलब, मन ही प्रमुख है ।
कबीरदास ने सही ही कहा है-
मन के हारे हार है मन के जीते जीत, कह कबीर पिउ पाइए,
मन ही की परतीत मतलव मन के अटूट विश्वास से हमर् इश्वर को भी पा सकते हैं । किसी कवि ने मन को ‘चंचल मन’ की संज्ञा देते हुए लिखा है-
मन तुम्हारे रूप कितने –
ओ अचंचल, शान्त सागर,
और चंचल मृग सरीखे,
एक पल ही मस्त, कोमल,
और सब फिर रिक्त, फीके !
तुम मन्दिर, मृदु रूप सजते,
रात के आँचल में सपने !
मन तुम्हारे रूप कितने –
तुम विचरते मुक्त नभ में
फिर कदम धरते जमीं पर
तुम अगर चाहो कहीं तो,
र्स्वर्ग भी उतरे वहीं पर !
जब मनुज का भाल चूमे,
क्षण बने हर नित्य अपने
मन तुम्हारे रूप कितने –
कल्पतरु, तुम अमरवल्ली,
मनोवांछित फल हो देते
तुम न विचलित हो कभी भी
दृढÞ बनो, रवि-दीप्ति लेते !
घोर उलझन की घडÞी में,
भी तुम्हंे हैं, कुसुम चुनने
मन तुम्हारे रूप कितने –
मन तुम्हारे रूप कितने –
रात्रि का तम
रात्रि का तम छा रहा है
सो रहा निस्तब्ध जग है,
मौन, जनरब हीन जग है
किन्तु उर के तार झंकृत
कोई मन में गा रहा है
रात्रि का तम छा रहा है ।
बन गई नीरव प्रकृति है,
सृष्टि यह, किस की सुकृति है –
कौन है वह शक्ति, जो सन्देश
नित नव का रहा है ।
दीखता वह क्यों नहीं है –
शक्ति उसकी तो कहीं है
नयन विहृवल, मिलन को हैं,
कुछ नहीं क्यों भा रहा है –
रात्रि का तम छा रहा है !!
मन विकल, आतुर बना है
पीर मानस में घना है
किन्तु स्वप्निल स्वर कहीं से,
ही निरन्तर, आ रहा है
रात्रि का तम छा रहा है !
बीतती है, रात जब,
आता बिहंसता प्रात तब
कौन है, वह सूत्रधार –
क्यों पट बदलता जा रहा है –
रात्रि का तम छा रहा है !
तो यह है- प्रकृति और प्रभु का रहस्यमय रूप और मनुष्य पर उनका पडÞता हुआ प्रभाव । इस सत्य को कोई नकार नहीं सकता है । मैं कह रही थी, अपने घर के बगीचे के सम्बन्ध में । एक चित्र देखिए- घर के सामने, प्रांगण में रगं-विरंगे, गेंदा-गुलाब, और अनेक प्रकार के मनोहारी फूल पौधे । दाहिने किनारे केला, आम, अमरुद, अनार, नीबू की कतार । बाएँ किनारे और पिछवाडे में अनेक तरह की साग, सब्जियाँ, जिनका आनन्द ही कुछ अनुपम होता है । प्रांगण के दाहिने बगल में तुलसी का चौरा, उसके बगल में कुंआ । और दीवाल से सटे पूरव दिशा में, दो धाराओं के बीच अहर्निश प्रवाहित होती हर्ुइ, हरिद्वार और ऋषिकेश का स्मरण दिलाती हर्ुइ नदियाँ और उनकी मोहक कल-कल धाराएँ रात्रि के मौन को तोडÞती हर्ुइ, रात्रि के अन्धकार पंक्षियों की चर्चा के बिना बगीचे की चर्चा अपर्ूण्ा ही होगी । कवि सुमित्रानन्दन पन्त कहते हैं-
प्रथम रश्मि का आना रंगिनी,
कैसे तूने पहचाना यहाँ-कहाँ –
हे बाल विंहगिणी ! कहाँ कहाँ –
हे बाल विंहगिणी पाया यह,
स्वर्गिक गाना !
कवि पन्त मनुष्य से ज्यादा पंक्षियों को जागरुक मानते हैं । उषाकाल की प्रथम रश्मि के फूटते ही पक्षीगण कलरव करने लगते हैं, पंक्षियों के छोटे-छोटे बच्चे चहचहाने लगते हैं । मनुष्य जो चेतनशील प्राणी है, वह पंक्षियों के जगने के बाद ही जगता है । मानों पक्षीगण चहचहा कर मुनष्य को जागरण का सन्देश देते हैं ।
तो हमारे बगीचे में उषाकाल से ही विभिन्न प्रकार के पक्षीगण आकर अपने कलरव से हमें जगा जाते हैं । कौआ, मैना, चरमुन्नी और कितने प्रकार के पक्षी, जिनका नाम भी नहीं बता सकती, प्रांगण में विखरे अन्न के दानों को चुगते रहते हैं । बगल में पडÞोसी ने परेवा पाल रखा है । वे भी आ जाते हैं और दाने चुगते रहते हैं ।
हमने दो कुत्ते पाल रखे हैं । एक कोने में उनका एक छोटा-सा घर है । कभी कभी ये पक्षी गण, जब कुत्ते बाहर होते है, तो इनके घर में चले जाते हैं, वहाँ भी इन्हें दाना मिल जाता है ।
मैं निर्विकार भाव से कर्ुर्सर्ीीर बैठकर प्रांगण में पढÞती-लिखती रहती हूँ और इन सब की गतिविधियों को तौलती रहती हूँ । सब की गति अलग-अलग है र्।र् इश्वर ने मनुष्य के साथ-साथ कितने तरह के जीव-जन्तुओं की रचना की है, यह सोच-सोच कर आर्श्चर्य-चकित होती रहती हँू । मनुष्य की गति भी सब की अलग-अलग है । तो गतिशीलता और विविधता इन दो गुणों से इस सृष्टि की रचना की है, उस परम पिता परमेश्वर ने ।

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