प्रकृति के बल पर ही तो हम हैं !

करुणा झा:मानव सभ्यता का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही पुराना है मानव से प्रकृति का रिस्ता। अपने अस्तित्व में आने के साथ ही मानव ने प्रकृति की गोद में सभ्यता और विकास की यात्रा शुरु की। प्रकृति की गोद में खेलकर बडÞा हुआ मानव प्रकृति से ही खेलवाडÞ करने लगा। हमारी पृथ्वी ने हमें तमाम संसाधन दिए है, जिसके बलबूँते पर हम विकास कर सके है। प्रगति के इस क्रम में हमने प्रकृति को पहले तो सहभागी बनाया, लेकिन बढÞती हर्ुइ स्वार्थी लालसाओं के साथ हमने इसका शोषण प्रारम्भ कर दिया। अपने दामन में अपार खनिज सम्पदा समेटे पर्वतमालाएँ हमारे लिए वरदान के समान थीं।

चारों तरफ फैली हर्ुइ इन मूलभूत संपतियों का महत्व जानेबिना मनुष्य ने इनका अन्धाधुन्ध दोहन किया। मानव और प्रकृति का रिस्ता सदियों पुर ाना है। प्रकृति मानव को सदियों से पालती पोषती आ रही है। उदंड मानव प्रकृति को सदियों से नुक्सान पहुँचाता रहा है। प्रकृति अक्सर हमारे अपराधों को क्षमा करती रहती है। लेकिन कई बार मानव की ज्यादतियों के कारण क्षुब्ध होकर प्रकृति मानव पर पलटवार भी करती है। इस पलटवार से मानव को भार ी क्षति पहुँचती है। प्रकृति ने भी अपने साथ हुये अन्याय का जबाब देना शुरु कर दिया है। लगातार बढती ग्लोबल वार्मिंङ -वैश्विक उष्णता) आज अन्तर्रर्ाा्रीय स्तर पर पर्यावर णविदों की चिंता का प्रमुख कारण है। एक शोध के अनुसार ग्रीन हाउस गैंसों के कार ण पृथ्वी का तापमान लगातार बढÞ रहा है। बादल लगातार गर्म होते जा रहे हैं।

और परि णामस्वरूप तूफान, सुनामी, वर्फपिघलना, बाढÞ का कहर भोगने के लिए हम विवश हैं। और हम कहते हैं कि यह प्रकृति क्यों मानव जीवन के साथ ऐसा कर रही है – हम र्व्यर्थ ही प्रकृति को कहर के दोषी ठहराते हैं। जिस तरह हम प्रकृति से खिलवाडÞ करते हैं, इस विषय पर आत्मावलोकन कर खुद महसूस कर सकते हैं। उदाहरण के लिए दर्ुगापूजा को सबसे बडÞे त्यौहार के रूप में हम मनाते हैं। और जब दसवें दिन दर्ुगा की प्रतिमा पानी में बिर्सजन करते हैं तो खण्डित मर्ूर्ति पूजन सामग्री सब किनारे पर ही रह जाती हैं, जो जल और जमीन दोनों को प्रदूषित करती है। कई लोग तो कितने मन धान और तेल भी पूजा पाठ के नाम पर नदियों मे बहा देते हैं, जिससे जल प्रदूषण होता है। इसी तरह दीपावली के मौके पर ली पूरे देश में करोडों अरबों रूपये की आतिशबाजी होती है। सारा आसमान धुँवा से भर जाता है, जो हमारे वायुमण्डल में जा कर हमारे पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुँचाते है। आँक्सीजन की कमी तो होती ही है, साथ ही आर्थिक नुकसान भी कम नहीं होता।

एक शोध के मुताबिक ग्रीन हाउस गैसों के कारण विश्व का तापमान लगातार बढÞ र हा है। पिछले १०० सालों में धरती के औसत सतही तापमान में ०.७४ ड्रि्री से. की बढÞोत्तर ी हर्ुइ है जो अगले कुछ सालों मे १.५ से ४ प्रतिशत तक बढ जाने की आशंका है। यह स् पष्ट हो चुका है कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए ६० प्रतिशत जिम्मेबार कार्बन डाइअक्र्साईड गैस है। लगातार बनों की कर्टाई ग्लोबल वार्मिंग के कारक तत्व के रूप में सामने आ रही है। सात महादेशों से सजी धरती पर कैसा लगेगा अगर इस धरती का मानव प्यासा रह जाए तो -! आँकडो की मानें तो पहले जमीन से पानी लेने के लिए जहाँ २०-२५ फीट तक ही खुदाई कर नी होती थी, अब वहीं धरती का जलस्तर ६०- ७० फीट नीचे जा चुका है। लगातार कम होती बरसात भी इसका एक कारण है। नदियाँ या तो सूख चुकी हैं या प्रदूषित हैं। कभी सोना उगलने वाली धरती धीरे-धीरे बंजर हो रही है। उप सहारा और मध्य एशिया में हुए ताजा र्सर्वेक्षण के अनुसार भूमि के बढÞते दोहन से भूमि बंजर होती जा रही है। यानी कि हम विकास की जितनी भी सीढियाँ चढÞते जा रहे हैं, उतनी ही मात्रा में प्राकृतिक विध्वंश का हम शिकार होते जा रहे हैं। पृथ्वी नाराज है और यह बात वह समय-समय पर प्राकृतिक आपदाओं के रूप में चेताती रहती है। अगर हम अब भी न संभलें तो परिणाम घातक होंगे और इसका दोष किसी और के सर नहीं अपने को बुद्धिमान मानेवाला मानव के सर होगा।

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