प्रचंड प्रतापी भूपति, अब शायद राष्ट्रवाद का साईकल पंचर हो गया लगता है : बिम्मी शर्मा

बिम्मी शर्मा, काठमांडू, १ अगस्त |

हम सभी अपने बचपन में बड़े मनोयोग या बाध्यता से “श्रीमान गंभीर नेपाली प्रचण्ड प्रतापी भूपति” गाया करते थे । अब श्रीमान गंभीर तो निर्मल निवास में सिमट कर अपने बांकी बचे दिन निर्मल करने मे लगे हुए है । पर प्रचंड प्रतापि भूपति की अभी पांचो उंगली घी में और सर कडाही में है । प्रचंड गर्मी की तपिश अभी थोड़ी कम हुई है । पर राजनीति और सिंह दरवार में कमरेड प्रचंड और उनकी पार्टी की प्रचंडता चारो तरफ छायी हुई है । वह नरम कमल के पुष्प से कठोर हो कर प्रचंड इसी लिए तो बने है कि देश कि राजनीति ठोस हो या तरल वह बाढ़ की तरह अपने पूरे बहाव में बहते रहें ।

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लोगों की स्मरण शक्ति इतनी कमजोर हो चुकी है कि कमाउनिष्ट प्रचण्ड का साइकल प्रेम शायद सब भूल गए हैं । वह पिछले साल राष्ट्रवाद से ओतप्रोत हो कर साईकल से देशाटन करने की अपने विरोधीयों को चुनौती देते थे । वह पेट्रोल और डिजल के देश में किल्लत होने पर साईकल में ही दुनिया घूमने और चांद पर पहुंचने की बात करते थे । पर अब शायद उनका राष्ट्रवाद का साईकल पंचर हो गया लगता है । अब वह साईकल छोड़ कर पजोरो में देशप्रेम दिखा रहे है । वह देश के प्रधानमंत्री जो बनने वाले है । केपी शर्मा ओली महोदय मुहावरों की बाढ़ ला कर चले गए अब प्रचंड प्रतापिभूपति किस चीज की बाढ़ ले आएँगें यह देखना बांकी है ।

जब आठ साल पहले सावन के इसी हरे भरे महीने में जब कमरेड प्रचंड पहली वार देश के प्रधानमंत्री बने थे । तब उन्हे सावन के अंधे की तरह हर जगह हरा ही हरा दिखाई देता था । पर तत्कालीन प्रधान सेनापति रुक्मागंत कटवाल ने उन के इस हरेपन को काला में बदल दिया था । अभी भी सावन का महीना है और चारों तरफ हरियाली है । देखते है इस हरियाली को प्रचण्ड कैसे पचा पाएँगें ? या बकरे की तरह सारी हरियाली या घांस को चबा जाएँगें ?

अपनी माओवादी पार्टी के समर्थन में ओली को नौ महीने तक प्रधानमंत्री की कुर्सी मे कब्जा जमाया हुआ देख कर प्रचंड के मुँह से लार टपक रहा था । पर ज्यादा लार टपका कर लोभी की मानिंद पिएम ओली को टुकुर टुकुर ताकने से अच्छा है सरकार का अपनी पार्टी का दिया हुआ समर्थन वापस ले कर पिएम ओली को उस कुर्सी से ही धड़ाम से गिरा दिया । अब राजनीति का यह सिद्धांत है कि जो गिराता या पछाड़ता है सत्ता का हकदार वही होता है । बेचारे ओली कुर्सी से गिरने के बाद अपने सर को सहलाते हुए कोने मे दुबक कर दडे हो गए । उन के तरकश से सारे मुहावरे खत्म हो चूके हैं ।

१० साल तक जंगल में छुप कर कमरेड प्रचंड ने युद्ध किया और सारा देश और देश का अमंगल किया । जंगल का यह सियार जब शहर में घुस गया तो चारो तरफ अफरा तफरी मच गई । शुरु में इस सियार से जो डरे हुए थे इसकी नकली खाल और दांत को पहचानने के बाद इस से अब डरते नहीं है । जिस विभेद के विरुद्ध कमरेड प्रचंड ने १० साल तक जन युद्ध किया था । उसी विभेद को वह अपने परिवार और अपनी पार्टी में अंदर तक जडेंÞ जमाने के लिए सींच रहे है । जातीय राज्य की मांग को हवा दे कर प्रचंड और उनकी माओवादी पार्टी ने सारे देश में जातियता की आग लगा दी ।

अपने लचकदार स्वभाव और बोल कर पलट जाने वाले अंदाज के कारण भी प्रचंड अब कठोर नहीं रहे । ज्यादा लचकने वाली चीजें जल्दी ही टूट जाती है । कमरेड प्रचंड भी अपने कथनी और करनी में अंतर के कारण किसी के नजदीक या विश्वासपात्र नहीं बन सकते । जब ओली पिएम बने थे तब उन के राष्ट्रवाद के मीठी और लुभावनी चाशनी में डूब कर प्रचंड ने भी अपने और ओली के सभी विरोधियों को टुडिंखेल में खूब कोसा और ललकारा था । तब दहाड़ते हुए प्रचण्ड चिड़िया घर से भागे हुए शेर की तरह लग रहे थे । पर अब वही प्रचंड बकरा बनने पर मजबूर हैं । कल शेर बन कर वह दूसरों को हलाल कर रहे थे आज उनको बकरा बना कर कोई दूसरा उनको ही हलाल कर रहा है ।

इसी को कहते हैं कभी पानी के उपर नाव या नाव के उपर पानी । राजनीति करने का मुख्य उद्धेश्य ही सत्ता की प्राप्ति है । कोई भी नेता जोगी बनने के लिए जीवन भर राजनीति नहीं करता । सभी का अभिष्ट ही सत्ता है चाहे वह सीधी तरह मिले या दावंपेच कर के । क्योंकि राजनीति की बिसात पर सभी शकुनी बन कर पाशा फेंकते है । राजनीति मे कभी कोई किसी का स्थायी शत्रु या मित्र नहीं होता । राजनीति मे सत्ता का मद या पद “तीर्थ” है तो इस पद में बहाल होने के बाद मिलने वाली भत्ता या सुख, सुविधा उसी तीर्थ का“प्रसाद” है । इसी लिए सभी राजनीतिक दल और उसके नेता गण सत्ता को मूख्य “धुरी” या तीर्थ मान कर इसी परिक्रमा करते रहते हैं ।

कल तक ओली और प्रचंड उनका राजनीतिक दल और विचार धारा एक ही खेमें में था । आज दोनों विरोधी या विपक्ष बन कर आमने सामने है । अब प्रचंड के सत्ता के शामियाने में नेपाली कांग्रेस शिरकत करने आ चुकी है । कितनी अजीब बात है कि एक शेर (शेर बहादुर  ) एक बकरे को प्रधानमंत्री बनाने के लिए समर्थन कर रहा है । इस शेर का तो जीभ भी ज्यादा भक्षण करने से काठ जैसा हो गया है । वह क्या बोल या कह रहे हैं न उनको न दूसरो को पता चल पाता है । कभी अखंड सुदूर पश्चिम को लेकर शेर और कमल एक दूसरे के विरोधी थे । आज उसी शेर के माथे पर कमल का पुष्प खिल रहा है । भदे ही यह न सुहाता हो पर जनता इनको देखने, सुनने और झेलने के लिए अभिशप्त हैं । राजनीति के आंगन में जो भी आश्चर्य या तमाशा होता है यह कम ही होता है ।

जिस शेर ने कमल के मूंडी का मोल भाव किया था । आज वही शेर उसी कमल के पुष्प को बड़े प्यार से सहला रहा है । जिस शेर ने अपनी गृह मंत्रीकाल में बडे अहंकार से २१ साल पहले जिस माओवादियों की ४० बुंदे माँग को ठुकरा दिया था । उस के बाद उन्हीं माओवादियों ने तत्कालीन सत्ता और राज्य के खिलाफ सशस्त्र युद्ध किया था । आजमोल भाव करने वाला और किसी वस्तु कि तरह मोल भाव होने वाला दोनों एक ही कश्ती में सवार हैं और राजनीति के नौटंकी का खूब मजा भी ले रहे है और दूसरों का भी भरपूर मनोरंजन कर रहे है । इसी को कहते हैं शायद “चोर चोर मौसेरे भाई” । ( व्यंग्य )

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