प्रचण्ड की रणनीति बदली, पता चलगया साइकिल की सवारी से देश नही दौड़ेगा: श्वेता दीप्ति

फिलहाल प्रचण्ड अपनी परिपक्वता के साथ आगे बढ़ने के मूड में नजर आ रहे हैं और भरत तथा चीन को साथ लेकर बढना चाहते हैं । हिन्दुस्तान टाइम्स में दिए पहली अन्तरवार्ता में उन्होंने कहा है कि विगत में उनसे गलतियाँ हुई हैं, क्योंकि अपने पहले प्रधानमंत्रीत्व काल में वो युद्ध के मैदान से आए थे पर अब लोकतंत्र और राजनीति की परिभाषा उन्हें समझ आ गई है । विगत की गलतियों की पुनरावृत्ति वो नहीं करना चाहेंगे ।

श्वेता दीप्ति, काठमांडू ,२६ जुलाई |

परिवर्तन सृष्टि का नियम है । कल, आज और कल में जिन्दगी चलती है । संक्रमणकालीन नेपाल कई वर्षों से सत्ता और सत्तानशीनों के हाथों, प्रयोग का केन्द्र बना हुआ है । स्थायित्व की कमी ने विकास की सभी सम्भावनाओं को फिलहाल पीछे धकेल दिया है । सत्ता परिवत्र्तन के साथ ही एक नई उम्मीद फिर से जगी है कि, शायद नेपाल के नियंताओं की कूटनीति, विदेशनीति और राजनीति परिष्कृत रूप में सामने आएगी और देश अपनी दिशा पकड़ पाएगा । सपनों की दुनिया में पिछले कई महीनों से जनता विचरण करती आ रही थी किन्तु यथार्थ की कठोर धरातल ज्यों की त्यों है ।

कयासों का वक्त खत्म हो चुका है और अब तय है कि नेपाल का नेतृत्व माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड के हाथों में जाने वाला है । विनाशकारी भूकम्प के पश्चात् अचानक राजनीति के दो विपरीत ध्रुव एक हो गए थे । अप्रत्याशित रूप से प्रचण्ड ने सभी को किनारे करते हुए ओली से हाथ मिला लिया था । उसके बाद आजतक में जो कुछ हुआ उसने देश को जो दिया, वो सर्वविदित है । त्रास और त्राहि की आग में देश का एक हिस्सा आज भी सुलग रहा है । संविधान निर्माण के पश्चात् नए राष्ट्रवादी नेता के रूप में उदीयमान हुए ओली सिर्फ वर्ग विशेष के प्रधानमंत्री बन कर ही रह गए जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा ।

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रोज नए दावे और सपने, उन्होंने यही दिया और राष्ट्रीयता का नारा देकर जनता के बीच अपने स्थायीत्व की भरपूर कोशिश भी की । बहुत हद तक वो अपनी नीति में सफल भी हुए हैं । आज भी इस नारे के साथ अच्छी खासी भीड़ उनके साथ है, किन्तु वो ये नहीं समझ पाए कि इतनी सी भीड़, नेपाल नहीं हो सकता । जहाँ हम मेची से महाकाली और कोशी से कर्णाली तथा सम्पूर्णता के साथ पहाड़, हिमाल और तराई में नेपाल को देखते हैं । किन्तु उन्होंने नेपाल की रीढ़ को ही तोड़ने की कोशिश की जिसका परिणाम उनके सामने है । शायद इसी बात ने उनके समर्थकों को उनके विपक्ष में खड़ा कर दिया । माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड को भी यह बात जल्दी ही समझ में आ गई कि, एमाले का साथ दे कर वो सहयोगी पार्टी के रूप में ही सिमट कर रह गए । एक मजबूत हाथ उन्हें उनकी नीति के कारण पहले ही छोड़ चुका है । ऐसे में उनका बैचेन होना स्वाभाविक भी था । ये और बात है कि इसके लिए उन्होंने भारत पर आरोप लगाया । जनवरी में भारत यात्रा के दौरान उन्होंने खुलकर कहा कि उनकी पार्टी को कमजोर करने के लिए साजिश की जा रही है और इसी के तहत बाबुराम भट्टराई अलग हो रहे हैं । इस सोच से निकलने में उन्हें छः महीने लग गए ।

शंका के समाधान के साथ ही उनकी रणनीति बदलनी शुरु हो गई थी । उन्हें भी लगने लगा कि साइकिल की सवारी की घोषणा कर के देश को दौड़ाया नहीं जा सकता बल्कि ये सोच, मंद गति से चल रहे देश को घसीटने पर ही विवश कर सकता है । आन्दोलन के दौरान हुए नाकाबन्दी में उनके सुर भी ओली के साथ ही मिले हुए थे । राष्ट्रवाद की भावना की आड़ में चाइना कार्ड खेला गया । कुछ देर जरुर लगी, पर इस कार्ड का हकीकी रूप भी सामने आ गया । न तो रेल दौड़ी और न ही घर घर तक पाइप लाइनें बिछीं । सच तो यह है कि ये सारे सपने भी उसी दिन पूरे होंगे जब दक्षिण का साथ और हमारे नेतागण ईमानदारी से देश के विकास की बात सोचेंगे । कुछ बातें या परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं जहाँ समझौता करना ही पड़ता है । नेपाल की भौगोलिक संरचना ही ऐसी है कि इसके विकास की सम्भावनाएँ अगर कहीं से सम्भव हो सकती है तो वो भारत है, चीन नहीं । चीन के साथ विकास के सपने देखना कल्पनाओं में ही हो सकता है । जहाँ से आवागमन सुविधा नहीं जिसकी राहें वर्ष के छः महीने बर्फ से ढकी होती हैं, जो छोटी सी शक के आधार पर बिना किसी पूर्व सूचना के सीमा बन्द कर देता है, वो नेपाल का साथ कितना दे सकता है ? तिब्बत से अगर नेपाल को रेल मार्ग से जोड़ भी दिया जाता है चीन के सौजन्य से, तो नेपाल को इसका कितना फायदा होगा ? हाँ अगर इसमें किसी का फायदा है तो वो चीन का है जो विश्व की महाशक्ति के रूप में खुद को स्थापित करना चाह रहा है और इसके लिए नेपाल का साथ उसे चाहिए था जिसकी वजह से भारत विरोधी भावनाओं को यहाँ की जनता में भड़का कर ही उसकी नीयत फल सकती थी । साउथ एशिया में भारत के बढते कद को रोकने के लिए भी चीन को इसकी आवश्यकता थी । फिलहाल ओली के प्रधानमंत्री पद के अवसान के साथ ही चीन के मनसूबों का भी अवसान हो चुका है ।

किन्तु नेपाल की राजनीति में आवश्यकता इस बात की है कि इसे भारत और चीन दोनों को साथ लेकर चलना होगा क्योंकि ये दोनों विकसित देश नेपाल के लिए एक अच्छा मित्र साबित हो सकते हैं अगर देश की वैदेशिक नीति सही हो । क्योंकि पिछले दिनों कमजोर विदेश नीति ही देखी गई । एक को चिढाकर दूसरे से काम लेने की मंशा देखी गई । जबकि चीन ने भी कई बार कहा कि नेपाल को भारत के साथ की अपेक्षा है । इसका एक ताजा उदाहरण है कि चीन को वेस्ट सेती प्रोजेक्ट दिया गया लेकिन चीन ने पीपीए करने के लिए भारत को ही आह्वान किया है जिसे भारत ने इंकार कर दिया है और फिलहाल यह प्रोजेक्ट ठप है । विकास को दरकिनार करते हुए फास्ट ट्रैक के प्रोजेक्ट का भी बेड़ा गर्क कर दिया गया है ।चीन के साथ किए गए समझौतों को कार्यान्वयन होने में समय भी है और कठिनाइयाँ भी ।

खैर, प्रचण्ड के रूप में नया नेतृत्व देश को मिलने वाला है और उम्मीद भी की जा रही है कि नेपाल की नियति बदले । दस वर्षों में इतनी परिपक्वता तो इनमें आ ही गई है कि वो समझ सकें कि देश के साथ साथ उनकी भलाई कहाँ है ? इस दरमियाँ उन्होंने महसूस किया कि उनके अपराधिक मुद्दों को हथियार बनाकर ओली सरकार उन्हें यूरोपीय एनजीओं नेटवर्क के तहत प्रयोग करना चाह रही है । इसी बीच काँग्रेस की असंतुष्टता और ओली का मधेश के प्रति विरोधी रवैया ने उन्हें भारत के करीब आने का अवसर दिया । वो जानते हैं कि मानव अधिकार के उल्ल्ंघन के मामले में भारत का साथ आवश्यक है । प्रचण्ड विगत के अनुभवों से आगे बढ़ना चाह रहे हैं । उन्होंने माना है कि भारत ने अगर चार बार(शांति समझौता, प्रधानमंत्री की नियुक्ति,गणतंत्र के अवसर पर और माओवादी लड़ाकु के एकीकरण के समय) उन्हें पुरस्कृत किया है तो चार बार (प्रधानमंत्री पद से निष्कासन, बाबुराम को प्रधानमंत्री पद के लिए प्रोत्साहन, २०१३ के चुनाव में और पार्टी विभाजन कर) आरोपित भी किया है । फिलहाल प्रचण्ड अपनी परिपक्वता के साथ आगे बढ़ने के मूड में नजर आ रहे हैं और भरत तथा चीन को साथ लेकर बढना चाहते हैं । हिन्दुस्तान टाइम्स में दिए पहली अन्तरवार्ता में उन्होंने कहा है कि विगत में उनसे गलतियाँ हुई हैं, क्योंकि अपने पहले प्रधानमंत्रीत्व काल में वो युद्ध के मैदान से आए थे पर अब लोकतंत्र और राजनीति की परिभाषा उन्हें समझ आ गई है । विगत की गलतियों की पुनरावृत्ति वो नहीं करना चाहेंगे । उन्हें अहसास है कि अगर इस अवसर का सही प्रयोग नहीं किया गया तो कहीं यह अंतिम अवसर साबित ना हो जाय । इसके लिए उन्हें देश के विकास के साथ साथ मधेश की समस्याओं का भी समाधान करना होगा । ओली जी ने वार्ता के नाम पर जो समय टाला है उसकी पुनरावृत्ति ना हो इसकी उम्मीद मधेशी जनता करती है ।

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