प्रचण्ड के सरकार में मोर्चा का बहार अब निश्चित है : कैलाश महतो

कैलाश महतो, परासी ,१६, जुलाई |

फ्रान्सिस ब्याकन का नाम अंग्रेजों के इतिहास में बडे हिफाजत के साथ रखा गया है । वे एक निबन्धकार, साहित्यकार और उलटबार राजनीतिज्ञ थे । रानी एलिजावेथ को वे प्रभावित नहीं कर सकने के बाद सन् १६०३ में शुरु हुए जेम्स प्रथम के शासन में उनका जादु चला और जेम्स प्रथम का अपने उपर भरोसा बनाकर वे शासन के दहलीज पर प्रथम बार कदम रखा । उसके बाद उनके जीवन में राजनीतिक बहार ही आ गया । वे हर हाल और हर सरकार में अपना सीट सुरक्षित रखने में कामयाब रहे । शासन चाहे राजतन्त्र का रहा हो यह फिर प्रजातन्त्र का, वे सब में सफल होते गए । उनका चिन्तन यह कतई नहीं रहा कि कौन शासक या सरकार देश के हित में थे और कौन अहित में । वे सिर्फ और सिर्फ शासन में कायम रहना ही अपने को सफल नेता मानते रहे । उनकी जीवन की मकसद ही शासन में कायम रहना होता था चाहे उसके लिए उनको अपनी जमीर और नियत ही क्यों न बेचना पडा । लेकिन जनता ने उनके सारे अपराध के पोलों को सन् १६२१ में खोल दिया जब उनके विरुद्ध २३ अलग अलग भ्रष्टाचार के प्रमाण हाजिर हुए और उनकी सारी शेखी धुल में मिल गयी ।

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एक ही मुद्दे पर दशकों से होता आ रहा मधेश आन्दोलन ने मधेशियों को दिया क्या ? कुछ विश्लेषकों का मानें तो वे कहते हैं कि मधेश आन्दोलनों ने मधेशी जनता को बहुत कुछ दिया है । यही बात मैं भी कुछ साल पहले तक समझता रहा और इसका प्रचार भी करता रहा । मगर जब मैंने गौर से आन्दोलनों को झाँका तो हिसाब निकला उल्टा ।

अगर परम्परागत मधेश आन्दोलन के पक्ष में वकालत करके मधेशी जनता को भरोसा देने का काम करने बाले उन मधेशी नेता और बुद्धिजिवियों को माने तो निःसन्देह उनका कहना भी सही दिखती है । क्यूँकि मधेशी जनता ने आवाज उठाना सिखा है, आन्दोलन करना सिखा है, भेदभावों को जाना है, मधेश ने अपना पहचान पाया है, शहादत देने की हिम्मत जुटायी है, साल साल भर तक आन्दोलन करने को सिखा है, राजनीति में भाग लेने को सिखा है, कभी मजदुरी करने बाले, फटा चप्पल में ही जिन्दगी को खुश देखने बाले अधिकतर मधेशी नेताओं ने भी अरबों के सम्पति और आराम की जिन्दगी पाया है । ये परिवर्तन और बदलाव तो निश्चित रुप में मधेश ने पाया है जिसे कोई इंकार नहीं कर सकता । मगर इसके विपरीत मधेश और मधेशी विरोधी परिणामों को कभी हमनें ध्यान दिया है ?

शाह, राणा, फिर शाह, प्रजातन्त्र, शाही पंचायत, प्रजातन्त्र, ज्ञानेन्द्रतन्त्र और लोकतान्त्रिक गणतन्त्र के मधेशी विरोधी रबैयों के विरुद्ध आन्दोलन करते हमें ६५ साल बित चुके हैं । हमने २००८ से लेकर आजतक के आन्दोलन, नेतृत्व, चुनाव, आन्दोलन और चुनावी मुद्दों को गँवाया है । अपनी भूमि गँवाया है, शान, शौकत, भाषा और संस्कृति गँवाया है । सैकडों मधेशी लडाकू योद्धाओं को अपमानित शहीद बनाया है । मधेशियों में चाकरी, चाप्लुसी और दलाली को बढाया है । मधेशी यूवाओं को विदेश भगाया है । अपने कृषियोग्य भूमियों को उब्जाहीन बनाया है । मधेश में पहाडियों का अतिक्रमण बढाया है । हमारे कब्जे में रहे हमारे जल, जमीन और जंगलों को बेहाथ किया है, मधेश के सारे कमाई, राजस्व और श्रोत साधनों पर नेपालियों का हुकुमत को बढाया है । मधेश और भारत सीमाओं पर नेपालियों से भंसार को कब्जा करबाया है । मधेश में शिक्षा के नाम पर अयोग्य शिक्षित यूवा जनशतिm तैयार करबाया है । मधेशियों को नेपाली भाषा, संस्कृति, गाली तथा बेइज्जत का शिकार बनाया है । मधेश के हर गाँव तथा चौक चौराहों पर नेपाली सेना, सशस्त्र तथा जनपद प्रहरियों को बैठाकर अपना असुरक्षा बढाया है । मधेश के सारे कार्यालयों को पहाडी लोगों के शासन और प्रशासन से कब्जा करबाया है । पढे लिखे मधेशी यूवाओं को बेरोजगार बनाया है । मधेश के आन्दोलन और राजनीति दोनों को पहाडी के कदमों में नंगा करके रखा है । मधेशियों के व्यापारों को चौपट करबाया है । चन्द पैसे और अल्पकालिन राजनीतिक पद और सुख सुविधाओं के लिए हम अपने आन्दोलन, राजनीति, राजनीतिक नेतृत्व और मधेशियों के अस्तित्वों को बेच डाला है । आन्दोलन के नाम पर मधेशियों को दुःख और पहाडियों को सुख और सेवा पहँुचाया है ।

तो अब हमें तुलना करना होगा कि विगत के ६५ वर्षों के संघीयतावादी आन्दोलनों से मधेश और मधेशियों को कितने लाभ हुए और कितने घाटे ? और आज भी हम उसी गोल चक्कर में फँसते जा रहे हैं । कम से कम पढे लिखे बुद्धिजिवी, प्राध्यापक, डाक्टर, इन्जिनियर, शिक्षक, वकिल, व्यापारी, यूवा और विद्यार्थी अध्ययन करें और निष्कर्ष निकाले कि आजाद मधेश उत्तम या फिर संघीयता ।

और हर बार मधेशी नेताओं ने मधेश मुद्दों पर ही सहमति करके सरकार में गए है । अब फिर से वही होने बाला है । संघीयता के ही मुद्दों को उठाकर मधेश आन्दोलन हुआ । उसी मुद्दा पर टीकापुर की विभत्स घटना घटी । हजारों मधेशी थारु लोग आज भी घरबारबिहीन और परिवारबिहीन हैं । उसी मुद्दा पर एक साल से निरन्तर मधेश आन्दोलन चल रही है । नाकाबन्दी नामक नाटक हो चुका है । सैकडों मधेशियों ने जाने दी और अब वही अमरेश और उसकी नाटक मण्डली का कहना है कि संघीयता नेपाल के लिए अभिशाप है । वही मधेशी मोर्चा अब सरकार मे जाने की तैयारी कर रही है । उसके लिए मोर्चा बाले बनने बाली सरकार के साथ मधेश और उसके मद्दों पर सहमति करेंगे, संघीयता को ताजा करेंगे और तब वे सरकार में जायेंगे । वे खुल्लमखुल्ला कह रहे हैं कि साधु बनने के लिए वे राजनीति नहीं कर रहे हैं, सत्ता में रहने के लिए ही राजनीति में लगे हैं । प्रचण्ड के सरकार में मोर्चा का बहार अब निश्चित है ।

अब तो मधेशी जनता को यह समझ ही लेना बेहतर होगा कि उनके मधेशी नेता लोग राजनीति करने, चुनाव लडने तथा सांसद और मन्त्री बनने के लिए जी रहे हैं । मधेश के अधिकार के नाम पर सभा सम्मेलन करने, तालियाँ पिटने, चाकरी करने तथा अपने सन्तानों को मलेशिया, दुबई, कतार, अरब, इजरायल आदि देशों में मजदुरी के लिए भेजने के लिए ही तो वे पैदा होते हैं । मधेश के मुद्दों के लिए तो मधेशी जनता है ही जिसे लडना होगा, मरना होगा और शहीद बनने के नाम पर अपने घर परिवार, माता पिता तथा सगे सम्बन्धियों को धोखा देना होगा ।

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