प्रचण्ड के साथ सिर्फ तीन अपेक्षा

लिलानाथ गौतम, काठमांडू , २९ अगस्त |
बाहरी प्रचारबाजी का विश्वास करें तो पुष्पकमल दाहाल सिर्फ नौ महीने के लिए प्रधानमन्त्री बने हैं । उनके कार्यकाल का एक महीना तो गुजरने ही लगा है । लेकिन इस अवधि में वह अभी तक अपनी मन्त्रिपरिषद् को पूर्णता नहीं दे पा रहे हैं । जिस मुद्दा और उद्देश्य के साथ वह प्रधानमन्त्री की कुर्सी तक पहुँचे थे, उस काम में भी कोई प्रगति नहीं हो रही है । विशेषतः संविधान कार्यान्वयन का वातावरण निर्माण करने के लिए जो करना चाहिए था, वह भी नहीं हो रहा है । आगामी चैत्र महीना में स्थानीय निकाय का निर्वाचन करने का नारा भी उन्होंने ही आगे लाया था, लेकिन उसके लिए जिस काम कारवाही को तीव्रता देनी चाहिए थी, वह भी नहीं हो पा रहा है । साथ में जनता दैनिक रुप में जो समस्या झेल रही हैं, वह भी जैसी की तैसी ही है । यह सब देखने के बाद लगता है कि प्रचण्ड के नौ महीने कार्यकाल कुछ करे बिना ही गुजर जाएगा ।
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वैसे तो जनता के पक्ष में प्रचण्ड से कुछ हो पाऐगा, ऐसी अपेक्षा रखनेवाले भी शायद बहुत कम ही हैं । सिर्फ प्रचण्ड ही नहीं, नेपाल में कोई भी ऐसे नेता नहीं है, जिस के प्रति जनता आशावादी बन सके । तब जो सत्ता में  हैं, उन्हीं से कुछ अपेक्षा रख सकते हैं । शायद प्रचण्ड भी चाहते हैं कि अपना कार्यकाल सफल बने, जनता उन्हें पसन्द करें और आनेवाले निर्वाचन में उनकी पार्टी को ही बहुमत मिले । लेकिन यह सिर्फ चाहने से होनेवाला नहीं है । इसके लिए कुछ करना ही पड़ता है । प्रचण्ड के पास कुछ करने का अवसर तो हैं, लेकिन एक महीना तक अपनी मन्त्रिपरिषद् को पूर्णता करने में असफल प्रधानमन्त्री से क्या अपेक्षा रख सकते हैं ? यह प्रश्न भी खड़ा होता है ।
बड़ी–बडी बात करनेवाले नेताओं के लिए छोटी–मोटी बात ज्यादा मायने नहीं रख सकती । लेकिन वही छोटी–मोटी समस्या ही जनता की समस्या है । जो उन छोटी–मोटी समस्या को सही रुप में सम्बोधन करेंगे, जनता उन्हीं को पसन्द करेगी । और आनेवाले दिन में वही पार्टी को वोट दे सकते हैं । शायद प्रचण्ड यह भी चाहते हैं कि राजनीति के प्रति जनता में जो वितृष्णा है, उसमें मैं कुछ सुधार करुँ । यदि ऐसा है तो प्रचण्ड अपने कार्यकाल में सिर्फ तीन ही कार्य करें, जिसके चलते प्रचण्ड को अपने व्यक्तिगत राजनीतिक करियर में भी फायदा हो सकता है–
क्या हो सकता है, वह काम ?
१. नेताओं के प्रति जनता का विश्वास है ही नहीं । लेकिन सरकारी कर्मचारी के प्रति भी जनता का विश्वास उठ गया है । जनता समझती है कि हर सरकारी कार्यालयों की कर्मचारी घुसखोरी और भ्रष्टाचारी में लिप्त हैं । विशेषतः मालपोत, भन्सार, वैदेशिक रोजगार, यातायात आदि ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ के सरकारी कर्मचारी बिना–घूस कुछ भी नहीं करते हैं, यह मान्यता आम जनता की है । क्या इसमें प्रचण्ड इमान्दारीपूर्वक कुछ सुधार कर सकते हैं ? राजदूत सिफारिस से लेकर सचिव को पदोन्नति तक में ‘महाभारत की युद्ध लडने’ वाले राजनीतिक दलों से यह अपेक्षा रखना मुर्खता हो सकती है । लेकिन जनता यही चाहती है कि राजनीतिक दलों के नेता और सरकारी कर्मचारी से हो रहे संस्थागत भ्रष्टाचार अन्त हो ।
२. कहने की आवश्यकता तो नहीं है । लेकिन चुप भी नहीं बैठ सकते हैं– बाजार सम्पूर्ण रुप में काला बजारियों के हाथ में हैं ।  वह काला–बजारिया राजनीतिक नेता, कार्यकर्ता और सरकारी कर्मचारी के नियन्त्रण में होते हैं । अगर कालाबजारिया चाहते हैं तो किसी भी वक्त, कोई भी बहाने में महंगाई बढ़ सकती हैं । प्रायः यही व्यापारी, राजनीतिक दलों के लिए चन्दादाता और कर्मचारी के लिए ‘एक्स्ट्रा इन्कम स्रोत’ होते हैं । इन लोगों की पहुँच नीचे से लेकर ऊपर तक होती है । ऐसे व्यापारी और राजनीतिक कार्यकर्ता सभी कानून से ऊपर होते हैं । प्रधानमन्त्री जी, क्या ऐसे लोगों को आप कानूनी दायरे में ला सकते है ? घोषित÷अघोषित रुप में यातायात में ‘सिन्डिकेट’ लगा कर सर्वसाधारणों को लूटने वाले और जान लेने वाले व्यवसायियों को तो आप अभी तक कुछ नहीं कर पा रहे हैं । तो आपकी पार्टी के लिए भी आर्थिक स्रोत बने रहने वाले व्यापारी (कालाबाजारियों) को आप कैसे नियन्त्रण में रख सकते हैं ? जनता यह देखना चाहती है ।
३. सरकारी शैक्षिक संस्था हो या अस्पताल, किसी के प्रति जनता का विश्वास नहीं है । हर नागरिक लाभ के उद्देश्य से सञ्चालित निजी क्षेत्र में ही जाना चाहते हैं । आर्थिक रुप में सिर्फ जो असमर्थ हैं, वही लोग बाध्य हो कर सरकारी स्कुल तथा अस्पताल पहुँचते हैं । निजी क्षेत्र से कहीं ज्यादा वेतन और सेवा सुविधा लेने वाले दक्ष शिक्षक और डाक्टर तो सरकारी संस्था में ही होते हैं । तब भी क्यों अपनी सारी सम्पत्ति बोर्डिङ स्कुल, निजी अस्पताल और क्लिनिक में लुटाना चाहती है जनता ? क्या इसमें कुछ सुधार कर सकते हैं आप ? ‘काठमांडू में मेडिकल कॉलेज प्रशस्त हैं, इसको विकेन्द्रीत करना चाहिए और सर्वसाधारण को मेडिकल शिक्षा में पहुँच होना चाहिए’ कहकर वर्षों से एक डाक्टर आपके सामने आमरण अनशन बैठ रहे हैं, तब भी आप चुपचाप हैं । इसमें सकारात्मक काम करने के लिए आप के हाथ–पैर किसने बाध रखे है ? जनता यह जानना चाहती है और आपके द्वारा कुछ सकारात्मक काम हो, यह अपेक्षा रखती है ।
राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सरोकार के कई और विषय भी है, उसमें भी आपको काम करना है । सबसे पहले तो संविधान संशोधन करना है और निर्वाचन की तैयारी करना है, इसमें भी अभी तक आप कुछ नहीं कर पा रहे हैं । लेकिन जनता से प्रत्यक्ष सरोकार रखने वाले उल्लेखित तीन प्रश्न ही ऐसे प्रश्न हैं, जिनके साथ आपका भविष्य भी जुड़ा हुआ है । अर्थात् इसके सही जवाब आप दे सकते हैं तो आप का कार्यकाल सफल माना जाएगा । नहीं तो आप भी वही असफल प्रधानमन्त्री और नेता माने जाएंगे, जो इससे पहले थे । आप समझते होंगे कि यह तो कोई बड़ी बात ही नहीं है । लेकिन यह बड़ी बात हो सकती है । क्योंकि असफल प्रधानमन्त्री और अराजक राजनीति जनता ने बहुत बार देखी और झेली हैं । फिर झेल लेगी । लेकिन आप चाह कर भी पुनः असफल प्रधानमन्त्री बन नहीं सकते हैं । कहने की आवश्यकता नहीं है– बार–बार विभाजित आपकी पार्टी और जनस्तर का सम्बन्ध में ही आप इसका जवाब ढूंढ़ सकते हैं ।
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